वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ४१
चुम्बनद्यूत—नायक और नायिका को एक-दूसरे के अधर-चुम्बन की बाजी (शर्त) भी
लगानी चाहिये ॥ १३ ॥
पूर्वमधरसम्पादनेन जितमिदं स्यात् ॥ १४ ॥
चुम्बनद्यूत का लक्षण—नायक-नायिका में जो पहले दूसरे का अधर चूम ले, वही
जीतेगा ॥ १४ ॥
तत्र जिता सार्धरुदितं करं विधुनुयात् प्रणोद्देशेत् परिवर्तयेद् बलादाहता
विवदेत् पुनरप्यस्तु पण इति ब्रूयात् । तत्रापि जिता द्विगुणमायस्येत् ॥ १५ ॥
द्यूतकलह—यदि नायिका चुम्बनद्यूत में पराजित हो जाये, तो हाथों को नचा नचाकर
रोने लग जाये, पति को ठेलकर एक ओर कर दे, दाँतों से उसे काट ले और दूसरी ओर मुख कर
ले। यदि पति अनुनय विनय करे, तो उससे वाग्युद्ध प्रारम्भ कर दे, और पुनः बाजी लगाने को
कहे। यदि दोबारा भी पराजित हो जाये, तो पहले से दुगुना कलह और कोलाहल करे ॥ १५ ॥
विश्रब्धस्य प्रमत्तस्य चाधरमवगृह्य दशनान्तर्गतमनिर्गमं कृत्वा हसेदुत्क्रोशेत्
तर्जयेद्गलोदाहयेन्नृत्येत्प्रनर्तितभ्रूणा च विचलनयनेन मुखेन विहसन्ती तानि तानि च
ब्रूयात्। इति चुम्बनद्यूतकलहः ॥ १६ ॥
कपटद्यूत—निष्कपट चुम्बनद्यूत में पराजित नायिका, विश्वस्त या असावधान नायक के
अधर को दाँतों के मध्य इस प्रकार पकड़े कि नायक द्वारा अधर स्वतः न निकाला जा सके।
अपनी इस अप्रत्याशित जीत पर खुलकर हँसे, अपनी जीत की घोषणा करे, अधर को दाँतों से
काटने की धमकी दे, विलासपूर्वक शरीर को मटकाये, अधर छुड़ाने का नायक को आह्वान दे,
प्रसन्नतापूर्वक नृत्य करे और भौंहे नचाये, आँखें चलाती और हँसती हुई राग को बढ़ाने वाली
बातें कहें। इस प्रकार चुम्बनद्यूत सम्बन्धी प्रणयकलह समाप्त हुआ ॥ १६ ॥
एतेन नखदशनच्छेद्यप्रहणनद्यूतकलहा व्याख्याताः ॥ १७ ॥
नखक्षतादि का कलह—चुम्बन के कलह से नखक्षत, दन्तक्षत और प्रहणन के द्यूतों
को भी कह दिया गया है, अर्थात् नखक्षत, दन्तक्षत और प्रहणन के द्यूतों और उनमें सन्निहित
कलहों की भी यही रीति है ॥ १७ ॥
चण्डवेगयोरेव त्वेषां प्रयोगः । तत्सात्म्यात् ॥ १८ ॥
नखक्षत आदि के द्यूत और कलह का प्रयोग चण्डवेग वाले नायक नायिकाओं में ही होता
है, क्योंकि यह उन की प्रकृति के अनुकूल पड़ता है ॥ १८ ॥
तस्यां चुम्बन्त्यामयमप्युत्तरं गृह्णीयात् । इत्युत्तरचुम्बितम् ॥ १९ ॥
उत्तर-ओष्ठ-चुम्बन—जब नायिका नायक का अधरपान कर रही हो, तो अवसर पाकर
नायक भी उसके ऊपर के ओष्ठ को पकड़ ले और उसका चुम्बन करे—इस प्रकार के चुम्बन को
उत्तर चुम्बन कहते हैं ॥ १९ ॥
ओष्ठसंदंशेनावगृह्यौष्ठद्वयमपि चुम्बेत् । इति सम्पुटकं स्त्रियाः, पुंसो वाऽजात-
व्यञ्जनस्य ॥ २० ॥
दोनों ओष्ठों के चुम्बन की विधि—अपने दोनों ओष्ठों से नायिका के दोनों ओष्ठों का