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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

५. पारदारिक अधिकरण १४५
मणिकुट्टिम फर्श, वृक्षवाटिकाएँ, अंगूर की लताओं से बना मण्डप, समुद्रगृह
(अण्डरग्राउण्ड भवन) जिसमें गुप्त मार्गों से पानी आता-जाता हो, चित्रशाला, क्रीड़ामृग,
यन्त्रचालित कौतुक जो निर्जीव होते हुए भी सजीव से लगते हों, विभिन्न प्रकार के पक्षी, पिंजड़ों
में बद्ध शेर, चीते आदि, जो भी पहले कह रखा हो, सभी दिखाये ॥ १६ ॥
एकान्ते च तद्गतमीश्वरानुरागं श्रावयेत् ॥ १७ ॥
राजा के प्रेम का प्रकटीकरण—तत्पश्चात् एकान्त में, अवसर देखकर, उसमें राजा के
अनुराग को प्रकट करना चाहिये ॥ १७ ॥
सम्प्रयोगे चातुर्यं चाभिवर्णयेत् ॥ १८ ॥
और सम्प्रयोग में राजा के कलाकौशल का भी वर्णन करे अर्थात् राजदासी उस स्त्री को
यह अवश्य बताये कि राजा चौंसठ कामकलाओं में निपुण है जिससे उसका हृदय समागम हेतु
उत्कण्ठित हो जाये ॥ १८ ॥
अमन्त्रभावं च प्रतिपन्नां योजयेत् ॥ १९ ॥
जब वह राजा के साथ समागम कर ले, तो उसे यह समझा दे कि इस बात को किसी से
न कहे ॥ १९ ॥
अप्रतिपद्यमानां स्वयमेवेश्वर आगत्योपचारैः सान्त्वितां रञ्जयित्वा सम्भूय च
सानुरागं विसृजेत् ॥ २० ॥
राजदासी की असफलता पर राजा का कर्त्तव्य—यदि वह स्त्री राजदूती की बात न
माने और समागम हेतु तैयार न हो, तो राजा स्वयं आकर उपचारों द्वारा उसे शान्त करे एवं
अनुरक्त करे। तत्पश्चात् समागम करके उसे प्रेमपूर्वक विदा कर दे ॥ २० ॥
प्रयोज्यायाश्च पत्युरनुग्रहोचितस्य दारान्नित्यमन्तःपुरमौचित्यात्प्रवेशयेत्। तत्र
प्रणिहिता राजदासीति समानं पूर्वेण ॥ २१ ॥
सद्भावप्रदर्शन—यदि उस स्त्री का पति राजकृपा के योग्य हो, तो राजदासी को चाहिये
कि उसके घर की अन्य स्त्रियों को भी यथोचित रीति से राजभवन में ले आये। यह कार्य भी
राजदासी को ही करना चाहिये ॥ २१ ॥
अन्तःपुरिका वाप्रयोज्यया सह स्वचेटिकासंप्रेषणेन प्रीतिं कुर्यात्। प्रसृतप्रीतिं
च सापदेशं दर्शने नियोजयेत्। प्रविष्टां पूजितां पीतवर्तीं प्रणिहिता राजदासीति
समानं पूर्वेण ॥ २२ ॥
रानी द्वारा सहयोग—राजा जिस स्त्री पर आसक्त हो, उसके पास अपनी चेरी भेजकर
रानी प्रेमसम्बन्ध स्थापित कर ले। जब सम्बन्ध बन जाये, तो देखने के बहाने राजभवन में
बुलाये। राजभवन में आने पर रानी उसका स्वागत-सत्कार करे और मदिरा पिलाकरं प्रमत्त कर
दे। तत्पश्चात् राजदासी पूर्वोक्त रीति से कार्य करे ॥ २२ ॥
यस्मिन् वा विज्ञाने प्रयोज्या विख्याता स्यात्तद्दर्शनार्थमन्तःपुरिका सोपचारं
तामाह्वयेत्। प्रविष्टां प्रणिहिता राजदासीति समान पूर्वेण ॥ २३ ॥
कलाकौशल के बहाने बुलाना—राजा जिस स्त्री पर आसक्त हो, यदि वह नृत्यादि

१४६ वात्स्यायन-कामसूत्र
में निपुण हो, तो उस कला का प्रदर्शन करने के लिये रानी उसे राजभवन बुला ले। जब वह
राजभवन में प्रवेश कर जाये तो राजदासी पूर्वोक्त रीति से उसे राजा से मिलवा दे ॥ २३ ॥
उद्भूतानर्थस्य भीतस्य वा भार्यां भिक्षुकी ब्रूयात् असावन्तःपुरिका
राजनि सिद्धा गृहीतवाक्या मम वचनं शृणोति। स्वभावतश्च कृपाशीला तामनेनो-
पायेनाधिगमिष्यामि। अहमेव ते प्रवेशं कारयिष्यामि। सा च ते भर्तुर्महान्तमनर्थं
निवर्तयिष्यतीति प्रतिपन्नां द्विस्त्रिरिति प्रवेशयेत्। अन्तःपुरिका चास्या अभयं दद्यात्।
अभयश्रवणाच्च संप्रहृष्टां प्रणिहिता राजदासीति समानं पूर्वेण ॥ २४ ॥
पीड़ित एवं स्वार्थयों की पत्नियों को बुलाने की रीति—जिसका राजपरिवार से कुछ
अनर्थ होना हो या जो उससे भयभीत हो, उसकी पत्नी से भिक्षुणी जाकर कह दे—‘राजा इस
रानी का कहना मानता है और यह मेरा कहा मानती है। वह तो स्वभाव से ही कृपालु है।

५. पारदारिक अधिकरण १४७
परगृहप्रवेश में दोष—समर्थ लोगों को इस प्रकार कदापि दूसरे के घर में प्रवेश नहीं
करना चाहिये। राजा छिपकर भी कभी किसी के घर में न जाये ॥ २८ ॥
आभीरं हि कोट्टराजं परभवनगतं भ्रातृप्रयुक्तो रजको जघान। काशिराजं
जयसेनमश्वाध्यक्ष इति ॥ २९ ॥
कोट्टराज और जयसेन के उदाहरण—परगृह में प्रविष्ट कोट्टराज आभीर को भाई
द्वारा भेजे गये धोबी ने मार डाला था। इसी प्रकार काशिराज जयसेन को अश्वाध्यक्ष ने मार
डाला था ॥ २९ ॥
प्रकाशकामितानि तु देशप्रवृत्तियोगात् ॥ ३० ॥
सार्वजनिक प्रयोग—राजाओं को तो प्रायः सार्वजनिक प्रयोग ही देखने चाहिये। अब
उन्हें कहते हैं—सार्वजनिक भोग तो देशाचार के अनुरूप ही होता है ॥ ३० ॥
प्रत्ता जनपदकन्या दशमेऽहनि किञ्चिद्दौपायनिकमुपगृह्य प्रविशन्त्यन्तः-
पुरमुपभुक्ता एव विसृज्यन्त इत्यान्ध्राणाम् ॥ ३१ ॥
आन्ध्र की प्रथा— आन्ध्र देश की प्रथा है कि नवविवाहित कन्या को दसवें दिन कुछ
उपहार देकर राजभवन में भेज दिया जाता है और उपभोग करके ही छोड़ते हैं ॥ ३१ ॥
महामात्रेश्वराणामन्तःपुराणि निशि सेवार्थ राजानमुपगच्छन्ति वात्सगुल-
मकानाम् ॥ ३२ ॥
वत्सगुल्म की प्रथा—दक्षिण के वत्सगुल्म देश में, राज्य के महामन्त्री, सेनापति
आदि की स्त्रियाँ रात को सेवा के लिये राजा के पास जाती हैं ॥ ३२ ॥
रूपवतीर्जनपदयोषितः प्रीत्यपदेशेन मासं मासार्धं वातिवासयन्त्यन्तःपुरिका
वैदर्भाणाम् ॥ ३३ ॥
विदर्भ की प्रथा—विदर्भ देश की यह प्रथा है कि वहाँ राजरानियाँ प्रजावर्ग की सुन्दर
स्त्रियों को प्रेम के बहाने महीना महीना, पन्द्रह-पन्द्रह दिन अपने पास रख लेती हैं ॥ ३३ ॥
दर्शनीयाः स्वभार्याः प्रीतिदायमेव महामात्रराजभ्यो ददत्यपरान्तका-
नाम् ॥ ३४ ॥
अपरान्त की प्रथा—अपरान्त देश की यह प्रथा है कि वे अपनी सुन्दर पत्नी को
महामन्त्री और राजा को उपहार रूप में दे देते हैं ॥ ३४ ॥
राजक्रीडार्थं नगरस्त्रियो जनपदस्त्रियश्च सङ्घश एकशश्च राजकुलं प्रविशन्ति
सौराष्ट्रकाणामिति ॥ ३५ ॥
सौराष्ट्र की प्रथा— सौराष्ट्र देश की यह प्रथा है कि राजधानी और बाहर की स्त्रियाँ
समूह के रूप में और एक एक करके राजक्रीड़ा के लिये राजभवन जाती हैं ॥ ३५ ॥
श्लोकावत्र भवतः—
एते चान्ये च बहवः प्रयोगाः पारदारिकाः ।
देशे देशे प्रवर्त्तन्ते राजभिः संप्रवर्तिताः ॥ ३६ ॥

१४८ वात्स्यायन-कामसूत्र
अन्य योग—इस विषय में दो आनुवंश्य श्लोक उद्धृत करते हैं—
राजाओं द्वारा प्रवर्तित परकीयागमन के ये तथा अन्य भी बहुत से प्रयोग विभिन्न
देशों में प्रचलित हैं ॥ ३६ ॥
न त्वेवैतान् प्रयुञ्जीत राजा लोकहिते रतः।
निगृहीतारीषड्वर्गस्तथा विजयते महीम् ॥ ३७ ॥
राजा के लिये प्रशस्त मार्ग—लोककल्याण में लगे राजाओं को इन योगों का प्रयोग
नहीं करना चाहिये। जो राजा काम, क्रोध, लोभ, मान, मद और हर्ष—इन छह शत्रुओं को जीत
लेता है, वही विजयी होकर राज्य करता है ॥ ३७ ॥
'ईश्वराकामित' प्रकरण नामक पञ्चम अध्याय सम्पन्न ॥
षष्ठ अध्याय
अन्तःपुरिकावृत्तप्रकरण
नान्तःपुराणां रक्षणयोगात् पुरुषसंदर्शनं विद्यते पत्युश्चैकत्वादनेकसाधारण-
त्वाच्चातृप्तिः। तस्मात्तानि प्रयोगत एव परस्परं रञ्जयेयुः ॥ १ ॥
अन्तःपुर की लीलाएँ— राजभवन में कड़ी सुरक्षा के कारण पुरुष का दर्शन ही सम्भव
नहीं हो पाता। पति (राजा) तो एक होता है और रानियाँ अनेक, अतएव उनकी सम्भोगेच्छा तृप्त
नहीं हो पाती। इसी कारण वे आपस में ही तृप्त होने का प्रयास करती हैं ॥ १ ॥
धात्रेयिकां सखीं दासीं वा पुरुषवदलंकृत्याकृतिसंयुक्तैः कन्दमूलफलाव-
यवैरपद्रव्यैरात्माभिप्रायं निवर्तयेयुः ॥ २ ॥
प्रयोग-विधि—धाय की पुत्री, सखी या दासी को पुरुषों के समान वस्त्रालङ्कार धारण
करा कर समान आकृति वाले कन्द, मूल और फलों के अवयव वाले कृत्रिम शिश्न बनाकर
कृत्रिम सम्भोग से तृप्ति प्राप्त करें ॥ २ ॥
पुरुषप्रतिमा अव्यक्तलिङ्गाश्चाधिशयीरन् ॥ ३ ॥
जिनके दाढ़ी-मूँछें न हो, ऐसे पुरुषों के साथ शयन करें ॥ ३ ॥
राजानश्च कृपाशीला विनापि भावयोगादायोजितापद्रव्या यावदर्थमेकया
रात्र्या बह्वीभिरपि गच्छन्ति । यस्यां तु प्रीतिर्वासक ऋर्तुर्वा तत्राभिप्रायतः प्रवर्तन्त इति
प्राच्योपचाराः ॥ ४ ॥
प्राच्यों के उपचार—कृपालु राजा बिना भावयोग के कृत्रिम शिश्न लगाकर एक ही रात्रि
में अनेक रानियों के साथ तृप्तिपर्यन्त सम्भोग करते हैं; किन्तु जिस पर प्रेम हो, जिसका वासक
(दिन) हो या ऋतुकाल हो, वहाँ प्रेमपूर्वक सम्भोग करते हैं—यह प्राच्यों का उपचार (परम्परा)
है ॥ ४ ॥

५. पारदारिक अधिकरण १४९
स्त्रीयोगेनेव पुरुषाणामप्यलब्धवृत्तीनां वियोनिषु विजातिषु स्त्रीप्रतिमासु
केवलोपमर्दनाच्चाभिप्रायनिवृत्तिर्व्याख्याता ॥ ५॥
पुरुष भी स्त्री न मिलने पर अपने भाव की निवृत्ति योनिरहित क्रियाओं में, भेड़ बकरी
आदि विजातियों में, स्त्रियों की प्रतिमाओं में और केवल उपमर्दन से करें ॥ ५ ॥
योषावेषांश्च नागरकान् प्रायेणान्तःपुरिकाः परिचारिकाभिः सह प्रवेश-
यन्ति ॥ ६॥
नागरकों का प्रवेश—अन्तःपुर में रहने वाली रानियाँ दासियाँ के साथ प्रायः नागरकों
को स्त्रीवेश में प्रवेश करा लेती हैं ॥ ६ ॥
तेषामुपावर्तने धात्रेयिकाश्चाभ्यन्तरसंसृष्टा आयतिं दर्शयन्त्यः प्रयतेरन् ॥ ७ ॥
उन नागरकों को तैयार करने के लिये रानियों की अन्तरंग धाय की पुत्रियों को चाहिये कि
वे नागरकों को अन्तःपुर-प्रवेश के लाभों को समझायें ॥ ७ ॥
सुखप्रवेशितामपसारभूमिं विशालतां वेश्मनः प्रमादं रक्षिणामनित्यतां
परिजनस्य वर्णयेयुः ॥ ८॥
वे नागरकों को तैयार करते समय अन्तःपुर में सरल प्रवेश और निकलने के सुगम मार्ग,
अन्तःपुर की विशालता, सुरक्षाकर्मियों के प्रमाद तथा राजा एवं राजकुमारों के सदैव न रहने को
बतायें ॥ ८ ॥
न चासद्भूतेनार्थेन प्रवेशयितुं जनमावर्तयेयुर्दोषात् ॥ ९ ॥
प्रबन्ध के अभाव में प्रवेश न करे—यदि आने-जाने का सुगम और निरापद मार्ग न हो
तो अन्तःपुर में किसी को प्रवेश नहीं कराना चाहिये, क्योंकि इससे हानि की आशंका है ॥ ९ ॥
नागरकस्तु सुप्रापमप्यन्तःपुरमपायभूयिष्ठत्वान्न प्रविशेदिति वात्स्या-
यनः ॥ १० ॥
अन्तःपुर में प्रवेश के विषय में महर्षि वात्स्यायन कहते हैं—अन्तःपुर में प्रवेश का मार्ग
कितना भी सुगम क्यों न हो, किन्तु नागरक को उसमें कदापि प्रवेश नहीं करना चाहिये; क्योंकि
इसमें महान् हानि की सम्भावना है ॥ १० ॥
सापसारं तु प्रमदवनावगाढं विभक्तदीर्घकक्ष्यमल्पप्रमत्तरक्षकं प्रोषितराजकं
कारणानि समीक्ष्य बहुश आहूयमानोऽर्थबुद्ध्या कक्ष्याप्रवेशं च दृष्ट्वा ताभिरेव
विहितोपायः प्रविशेत् ॥ ११ ॥
विशेष बातें—नागरक अन्तःपुर में प्रवेश करने का विचार तभी बनाये जब निकलने का
मार्ग हो, अन्तःपुर से लगा हुआ सघन प्रमदवन हो, रानियों के अलग अलग और बड़े-बड़े कक्ष
हों, सुरक्षाकर्मी कम और असावधान हों, राजा बाहर गये हुए हों, सम्भोग हेतु रानी कई बार
बुला चुकी हो, अर्थ की प्राप्ति सुनिश्चित हो और बताने वाली से सारे उपाय जान लिये हों ॥ ११ ॥
शक्तिविषये च प्रतिदिनं निष्क्रामेत् ॥ १२ ॥
यदि अन्तःपुर में आवागमन की सुगम सुविधा हो तो वहाँ से प्रतिदिन ही निकल आना
चाहिये अर्थात् वहाँ ठहरना नहीं चाहिये ॥ १२ ॥

१५० वात्स्यायन-कामसूत्र
बहिश्च रक्षिभिरन्यदेव कारणमपदिश्य संसृज्येत ॥ १३ ॥
स्वेच्छा से प्रवेश की विधि—किसी काम के बहाने बाहर के सुरक्षाकर्मियों से मेलजोल
कर ले ॥ १३ ॥
अन्तश्चारिण्यां च परिचारिकायां विदितार्थायां सक्तमात्मानं रूपयेत्। तद-
लाभाच्च शोकमन्तःप्रवेशिनीभिश्च दूतीकल्पं सकलमाचरेत् ॥ १४ ॥
परिचारिका से कृत्रिम प्रेम—अन्तःपुर में आने जाने वाली किसी परिचारिका को
नागरक जब यह जान ले कि यह मुझ पर आसक्त है तो बाह्य रूप से उसे अपनी अत्यधिक
आसक्ति दिखाये। यदि वह किसी दिन न दिखे तो अपनी अत्यधिक व्याकुलता प्रकट करे।
उससे (पूर्वोक्त) दूतीकल्प में बताये गये सारे काम ले ॥ १४ ॥
राजप्रणिधींश्च बुध्येत ॥ १५ ॥
गुप्तचरों से सावधान—राजा के गुप्तचरों को अवश्य पहचान ले ॥ १५ ॥
दूत्यास्त्वसञ्चारे यत्र गृहीताकारायाः प्रयोज्याया दर्शनयोगस्तत्राव-
स्थानम् ॥ १६ ॥
गतिविधियाँ—यदि दूती न आ सके और अनुकूल चेष्टाएँ कर दी गयी हों तो ऐसे स्थान
पर खड़ा हो जाये, जहाँ से नायिका का दर्शन दूर से हो सके ॥ १६ ॥
तस्मिन्रपि तु रक्षिषु परिचारिकाव्यपदेशः ॥ १७ ॥
खड़े होकर भी परिचित सुरक्षाकर्मियों को उसी परिचारिका के दर्शन का बहाना करना
चाहिये ॥ १७ ॥
चक्षुरनुबध्नन्त्यामिङ्गिताकारनिवेदनम् ॥ १८ ॥
यदि नायिका बार बार उस पर दृष्टि डाले तो नायक को भी संकेत और चेष्टाएँ दिखानी
चाहिये ॥ १८ ॥
यत्र सम्पातोऽस्यास्तत्र चित्रकर्मणस्तद्युक्तस्य द्व्यर्थानां गीतवस्तुकानां
क्रीडनकानां कृतचिह्नानामापीनकस्याङ्गुलीयकस्य च निधानम् ॥ १९ ॥
चित्र का प्रयोग—जहाँ नायिका की दृष्टि जाती हो, वहाँ दीवार पर या चित्रफलक पर
उसके साथ प्रेमपूर्वक अपना चित्र बनावे, श्लिष्ट भाषा में प्रेमव्यञ्जक शब्द या छन्द लिखे,
नखक्षतों एवं दन्तक्षतों से चिह्नित गेंद, गुड़िया आदि रख दे और अपने नाम वाली अँगूठी रख
दे ॥ १९ ॥
प्रत्युत्तरं तया दत्तं प्रपश्येत्। ततः प्रवेशने यतेत ॥ २० ॥
उसके द्वारा दिये गये उत्तर को देखे और तत्पश्चात् ही प्रवेश करे ॥ २० ॥
यत्र चास्या नियतं गमनमिति विद्यात्तत्र प्रच्छन्नस्य प्रागेवावस्थानम् ॥ २१ ॥
जिस स्थान पर नायिका का निश्चित गमन होता हो, वहाँ पहले ही छिपकर बैठ
जाये ॥ २१ ॥
आस्तरणप्रावरणवेष्टितस्य वा प्रवेशनिर्हारौ ॥ २३ ॥
अथवा उसे ओढ़ने बिछाने के कपड़ों में लपेटकर लाया और भेजा जा सकता है ॥ २३ ॥

५. पारदारिक अधिकरण १५१
पुटापुटयोगैर्वा नष्टच्छायारूपः ॥ २४ ॥
अथवा पुट और अपुट के योग से अपनी छाया और रूप को लुप्त करके अन्तःपुर में जाया
जा सकता है ॥ २४ ॥
तत्रायं प्रयोगाः—नकुलहृदयं चोरकतुम्बीफलानि सर्पाक्षीणि चान्तर्धूमेन
पचेत् । ततोऽञ्जनेन समभागेन पेषयेत् । अनेनाभ्यक्तनयनो नष्टच्छायारूपश्चरति ।
अन्यैश्च जलब्रह्मक्षेमशिरःप्रणीतैर्बाह्यपानकैर्वा ॥ २५ ॥
पुटापुट योग—पुटापुट योग यह है—नकुल का हृदय, चोरक तूम्बी के फल, सर्प की
आँखें—इन तीनों वस्तुओं को पुटपाक विधि से अग्नि पर पका लिया जाये। इनके बराबर अंजन
मिलाकर पीस लिया जाये। इस अंजन को आँखों में लगाते ही रूप और छाया—दोनों ही
तिरोहित हो जाते हैं अर्थात् न रूप किसी को दिखायी देता है और न छाया ही। इनके अतिरिक्त
जलब्रह्म, क्षेमशिर प्रणीत बाह्यपानक भी है ॥ २५ ॥
रात्रिकौमुदीषु च दीपिकासम्बाधे सुरङ्गया वा ॥ २६ ॥
दीपावली की रात्रि को दीपक लेकर जब अनेक व्यक्ति इधर उधर दौड़ रहे हों तो वैसा
ही वेश बनाकर उनमें मिल जाये या सुरंग के मार्ग से चला जाये ॥ २६ ॥
तत्रैतद्भवति—
द्रव्याणामपि निर्हारे पानकानां प्रवेशने।
आपानकोत्सवार्थेऽपि चेटिकानां च संभ्रमे ॥
व्यत्यासे वेश्मनां चैव रक्षिणां च विपर्यये।
उद्यानयात्रागमने यात्रातश्च प्रवेशने॥
दीर्घकालोदयां यात्रां प्रोषिते चापि राजनि।
प्रवेशनं भवेत् प्रायो यूनां निष्क्रमणं तथा ॥ २७ ॥
अन्तःपुर में प्रवेश कराने और निकलने के उपाय—जब वस्तुओं को ठेला आदि में
लादकर अन्दर से बाहर या बाहर से अन्दर ले जाया जा रहा हो, जब मदिरापान की गोष्ठी या
उत्सव आदि में सम्मिलित होने के लिये व्यक्ति आ जा रहे हों, जब राजभवन की चेटियाँ कार्य
से व्यग्र होकर इधर उधर भाग दौड़ कर रही हों, जब एक भवन का सामान दूसरे भवन में रखा
जा रहा हो, जब सुरक्षाकर्मी बदले जा रहे हों, जब राजपरिवार उद्यानयात्रा के लिये प्रस्थान कर
रहा हो या वहाँ से लौट रहा हो, और जब राजा कहीं लम्बी यात्रा के लिये बाहर जा रहे हों—
ऐसे अवसरों पर तरुण नागरक अन्तःपुर में सरलता से प्रविष्ट हो सकता है और बाहर निकल
सकता है ॥ २७ ॥
परस्परस्य कार्याणि ज्ञात्वा चान्तःपुरालयाः।
एककार्यास्ततः कुर्युः शेषाणामपि वेदनम्॥
दूषयित्वा ततोऽन्योन्यमेककार्यार्पणे स्थिरः।
अभेद्यतां गतः सद्यो यथेष्टं फलमश्नुते ॥ २८ ॥
अन्तःपुर की स्त्रियाँ परस्पर एक दूसरे के रहस्य को समझकर सङ्गठित हो जायें, और

१५२ वात्स्यायन-कामसूत्र
एक लक्ष्य बनाकर शेष स्त्रियों को भी अपनी ओर तोड़ लें। एक दूसरे को दूषित कर जब सबके
ही चरित्र एक से हो जायें, तो कोई किसी का रहस्योद्घाटन नहीं करती और सभी अभीष्ट फल
प्राप्त करती हैं ॥ २८ ॥
तत्र राजकुलचारिण्य एव लक्षण्यान् पुरुषानन्तःपुरं प्रवेशयन्ति, नातिसुरक्ष-
त्वादापरान्तिकानाम् ॥ २९ ॥
रानियों के भोगविलास : अपरान्त देश की प्रवृत्ति—अपरान्त देश में राजकुलों में
आने वाली स्त्रियाँ ही सुन्दर और चण्डवेग पुरुषों को अन्तःपुर में प्रविष्ट करा देती हैं; क्योंकि
वहाँ के अन्तःपुर अत्यधिक सुरक्षित नहीं होते ॥ २९ ॥
क्षत्रियसंज्ञकैरन्तःपुररक्षिभिरेवार्थं साधयन्त्याभीरकाणाम् ॥ ३० ॥
आभीर की प्रवृत्ति—आभीर राजा के अन्तःपुर में रानियाँ वहाँ के क्षत्रिय-रक्षकों को ही
फँसाकर अपना प्रयोजन सिद्ध कर लेती हैं ॥ ३० ॥
प्रेष्याभिः सह तद्वेषान्नागरकपुत्रान् प्रवेशयन्ति वात्सगुल्मकानाम् ॥ ३१ ॥
वत्सगुल्म की प्रवृत्ति—वत्सगुल्म देश के राजकुल में दासियों के साथ दासीवेश में रानी
तरुण नागरकों को प्रवेश करा लेती हैं ॥ ३१ ॥
स्वैरेव पुत्रैरन्तःपुराणि कामचारैर्जननीवर्जमुपयुज्यन्ते वैदर्भकाणाम् ॥ ३२ ॥
विदर्भ की प्रवृत्ति—विदर्भ के राजवंश में तो अपने औरस पुत्रों की छोड़कर रानियाँ
सभी राजकुमारों से सम्भोग करा लेती हैं ॥ ३२ ॥
तथा प्रवेशिभिरेव ज्ञातिसम्बन्धिभिर्नान्यैरुपयुज्यन्ते स्त्रैराजकानाम् ॥ ३३ ॥
स्त्रीराज्य की प्रवृत्ति—स्त्रीराज्य की रानियाँ केवल सजातीय सम्बन्धियों से ही
सम्भोगकर्म कराती हैं, अन्यों से नहीं ॥ ३३ ॥
ब्राह्मणेर्मित्रैर्भृत्यैर्दासचेटैश्च गौडानाम् ॥ ३४ ॥
गौड़ देश की प्रवृत्ति—गौड़ देश की रानियाँ ब्राह्मण, मित्र, भृत्य, दास और चेटों से भी
सम्भोग कर लेती हैं ॥ ३४ ॥
परिस्पन्दाः कर्मकराश्चान्तःपुरेष्वनिषिद्धा अन्येऽपि तद्रूपाश्च सैन्धवानाम् ॥ ३५ ॥
सिन्ध देश की प्रवृत्ति—सिन्ध देश में जिन नौकरों और नागरिकों का राजभवन में
प्रवेश निषिद्ध नहीं है, उन सबके साथ रानियाँ सम्भोग कर लेती हैं ॥ ३५ ॥
अर्थेन रक्षिणमुपगृह्य साहसिकाः संहताः प्रविशन्ति हैमवतानाम् ॥ ३६ ॥
हैमवतों की प्रवृत्ति—हैमवतों में साहसी एवं तरुण व्यक्ति सुरक्षाकर्मियों को धन से
अनुकूल बनाकर, एकत्र होकर, राजभवन में प्रवेश कर जाते हैं ॥ ३६ ॥
पुष्पदाननियोगात्नगरब्राह्मणा राजविदितमन्तःपुराणि गच्छन्ति। पटान्तरित-
श्चैषामालापः। तेन प्रसङ्गेन व्यतिकरो भवति वङ्गाङ्गकलिङ्गकानाम् ॥ ३७ ॥
अंग-वंग और कलिङ्ग—अंग, वंग और कलिङ्ग देशों में नगर के ब्राह्मण पूजा के फूल
देने राजभवनों में आते हैं। रानियाँ उनसे परदे के पीछे से बातें करती हैं और इसी प्रसंग में अवैध
सम्बन्ध भी हो जाते हैं ॥ ३७ ॥

५. पारदारिक अधिकरण १५३
संहत्य नवदशेत्येकैकं युवानं प्रच्छादयन्ति प्राच्यानामिति। एवं परस्त्रियः
प्रकुर्वीत। इत्यन्तःपुरिकावृत्तम् ॥ ३८ ॥
प्राच्यों की प्रवृत्ति—नौ-दस स्त्रियाँ मिलकर एक चण्डवेग पुरुष को छिपाकर अन्तःपुर
में रख लेती हैं—यह प्राच्यों की प्रवृत्ति है। (यदि अन्तःपुर की स्त्रियों के पास जाना ही पड़े तो
इस प्रकार जाना चाहिये।) इस प्रकार अन्तःपुरिकावृत्त पूर्ण हुआ ॥ ३८ ॥
एभ्य एवं च कारणेभ्यः स्वदारान् रक्षेत् ॥ ३९ ॥
स्त्रीरक्षा का उपाय—इन्हीं कारणों से अपनी स्त्री की रक्षा करे ॥ ३९ ॥
कामोपधाशुद्धान् रक्षिणोऽन्तःपुरे स्थापयेदित्याचार्याः ॥ ४० ॥
जो व्यक्ति कामविषयक परीक्षा में सफल हुए हों, उन्हीं को अन्तःपुर का रक्षक नियुक्त
करना चाहिये—यह कामशास्त्र के आचार्यों का मत है ॥ ४० ॥
ते हि भयेन चार्थेन चान्यं प्रयोजयेयुस्तस्मात् कामभयार्थोपधाशुद्धानिति
गोणिकापुत्रः ॥ ४१ ॥
कामविषयक परीक्षा में उत्तीर्ण व्यक्ति भी भय और लोभ से दूसरों को अन्तःपुर में प्रविष्ट
करा सकते हैं, इसलिये काम, भय और धन—इन तीनों की परीक्षा में उत्तीर्ण व्यक्ति को ही
अन्तःपुर में रक्षक नियुक्त करना चाहिये—यह गोणिकापुत्र का मत है ॥ ४१ ॥
अद्रोहो धर्मस्तमपि भयाज्जह्यादतो धर्मभयोपधाशुद्धानिति वात्स्यायनः ॥ ४२ ॥
स्वामिद्रोह करना अधर्म है, लेकिन व्यक्ति भय के कारण उसे भी छोड़ सकता है, अतएव
जो निर्भीक और धर्मात्मा हों, उन्हें ही अन्तःपुर में रक्षक नियुक्त करे—यह आचार्य वात्स्यायन
का मत है ॥ ४२ ॥
परवाक्याभिधायिनीभिश्च गूढाकाराभिः प्रमदाभिरात्मदारानुपदध्याच्छौचा-
शौचपरिज्ञानार्थमिति बाभ्रवीयाः ॥ ४३ ॥
परपुरुष के कहे गये वाक्यों का बहाना करके कहने वाली और अपना अभिप्राय छिपा
लेने वाली स्त्रियों से अपनी स्त्रियों की परीक्षा करा ले कि उनमें कितनी सदाचारिणी हैं और
कितनी दुराचारिणी—ऐसा आचार्य बाभ्रव्य के अनुयायियों (शिष्यों) का मत है ॥ ४३ ॥
दुष्टानां युवतिषु सिद्धत्वान्नाकस्माददुष्टदूषणमाचरेदिति वात्स्यायनः ॥ ४४ ॥
दुष्ट व्यक्ति तो स्त्री को फँसाया ही करते हैं, इसलिये अकारण सदाचारियों को दूषित न
किया जाये—यह आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ ४४ ॥
अतिगोष्ठी निरङ्कुशत्वं भर्तुः स्वैरता पुरुषैः सहानियन्त्रणता प्रवासेऽवस्थानं
विदेशे निवासः स्ववृत्त्युपघातः स्वैरिणीसंसर्गः पत्युरीर्ष्यालुता चेति स्त्रीणां
विनाशकारणानि ॥ ४५ ॥
विनाश के कारण—अत्यधिक गप्पें मारना, निरंकुशता, स्वेच्छाचारिता, पुरुषों के साथ
खुला व्यवहार, पति के विदेशगमन पर एकाकी रहना, घर से बाहर विदेश में रहना, जीविका-
विहीन होना, कुलटा स्त्रियों का संसर्ग और पति से ईर्ष्या रखना—ये स्त्रियों के विनाश के
कारण हैं ॥ ४५ ॥

१५४ वात्स्यायन-कामसूत्र
सन्दृश्य शास्त्रतो योगान् पारदारिकलक्षितान्।
न याति छलनां कश्चित् स्वदारान् प्रति शास्त्रवित्॥ ४६ ॥
उपसंहार—परकीया स्त्रियों को दुष्ट व्यक्ति जिस तरह से फँसाया करते हैं, उन सबको
इस पारदारिक अधिकरण में पढ़कर, कोई भी मर्मज्ञ व्यक्ति अपनी स्त्री के विषय में धोखा नहीं
खा सकता॥ ४६॥
पाक्षिकत्वात् प्रयोगाणामपायानां च दर्शनात्।
धर्मार्थयोश्च वैलोम्यान्नाचरेत् पारदारिकम्॥ ४७॥
शास्त्र में परकीयागमन जीवन को बचाने के अन्तिम उपाय के रूप में ही अनुमत है,
परकीया के पीछे लोग मरते भी देखे जाते हैं, इससे धर्म और अर्थ—दोनों का ही विनाश होता
है, इसलिये परकीयागमन नहीं करना चाहिये॥ ४७॥
तदेतद्दारगुप्त्यर्थमारब्धं श्रेयसे नृणाम्।
प्रजानां दूषणायैव न विज्ञेयोऽस्य संविधिः॥ ४८॥
पुरुषों के कल्याण और स्त्रियों के सतीत्व की रक्षा के लिये यह अधिकरण कहा गया है।
अतएव इसमें कहे गये प्रयोगों का उपयोग किसी को दूषित करने के लिये कदापि न किया
जाये॥ ४८॥
ईश्वरकामित प्रकरण नामक पञ्चम अध्याय सम्पन्न॥
•
६.
वैशिक षष्ठ अधिकरण
प्रथम अध्याय
सहायगम्यागम्यगमनकारणचिन्ताप्रकरण
वेश्यानां पुरुषाधिगमे रतिर्वृत्तिश्च सर्गात्॥ १॥
वेश्याओं का काम और प्रयोजन—प्रारम्भ से ही पुरुष की प्राप्ति होने पर वेश्याओं को
रतिसुख और जीविका की प्राप्ति होती है॥ १॥
रतितः प्रवर्तनं स्वाभाविकं कृत्रिममर्थार्थम्॥ २॥
स्वाभाविक और कृत्रिम प्रवृत्ति—जब वेश्या रतिसुख के लिये प्रवृत्त होती है तो
उसकी प्रवृत्ति स्वाभाविक होती है और जब धन के लिये प्रवृत्त होती है तो उसकी प्रवृत्ति
कृत्रिम होती है॥ २॥
तदपि स्वाभाविकवद् रूपयेत्॥ ३॥
कृत्रिम राग को स्वाभाविक दिखाना—वेश्याओं को चाहिये कि जहाँ कृत्रिम राग भी

६. वैशिक अधिकरण १५५
हो, उसे भी स्वाभाविक के समान ही दिखायें, कृत्रिमता न प्रतीत होने दें, यही उसकी कला-
कुशलता है ॥ ३ ॥
कामपरासु हि पुंसां विश्वासयोगात् ॥ ४ ॥
इसका कारण—पुरुष अनुरक्त स्त्री में ही कामासक्त हुआ करते हैं ॥ ४ ॥
अलुब्धतां च ख्यापयेत् तस्य निदर्शनार्थम् ॥ ५ ॥
प्रेम के समय निर्लोभता दिखाये—केवल नायक को दिखाने के लिये वेश्या निर्लोभ
बन जाये ॥ ९ ॥
न चानुपायेनाथान् साधयेदायतिसंरक्षणार्थम् ॥ ६ ॥
उपाय से ही धनप्राप्ति—अपना प्रभाव अक्षुण्ण रखने के लिये वेश्या को चाहिये कि
विना उपाय के धन प्राप्त न करे ॥ ६ ॥
नित्यमलङ्कारयोगिनी राजमार्गविलोकिनी दृश्यमाना न चातिविवृता तिष्ठेत्।
पण्यसधर्मत्वात् ॥ ७॥
रहन-सहन—वेश्या को चाहिये कि सदैव सजी-सँवरी रहे, सड़क की ओर देखती रहे,
ऐसे स्थान पर बैठे कि सबको सरलता में दिखती रहे, लेकिन अत्यधिक खुली होकर न बैठे,
क्योंकि वह बाजार में बिकने वाली वस्तु जैसी ही है ॥ ७ ॥
यैर्नायकमावर्जयेदन्याभ्यश्चावच्छिन्द्यादात्मनश्चानर्थं प्रतिकुर्यादर्थं च साधयेन्न
च गम्यैः परिभूयेत तान् सहायान् कुर्यात् ॥ ८ ॥
वेश्याओं के सहायक—वेश्याओं को अपना सहायक उन लोगों को बनाना चाहिये जो
नायक को अपनी ओर आकृष्ट कर सकें, दूसरी वेश्या से नायकों को विरक्त कर दें, वेश्याओं पर
आये अनर्थों को दूर कर दें, उसका प्रयोजन सिद्ध कर दें और जिन्हें वेश्यानायक दबा न
सकें ॥ ८ ॥
ते त्वारक्षकपुरुषा धर्माधिकरणस्था दैवज्ञा विक्रान्ताः शूराः समानविद्याः
कलाग्राहिणः पीठमर्दविटविदूषकमालाकारगान्धिकशौण्डिकरंजकनापितभिक्षु-
कास्ते च ते च कार्ययोगात् ॥ ९ ॥
वेश्या की रक्षा करने वाला शासकीय अधिकारी, वकील, ज्योतिषी, साहसी, शूरवीर,
वेश्या के समान ही कलाकुशल, कला सीखने वाला, पीठमर्द, विदूषक, मालाकार, गन्धी,
मदिरा-विक्रेता, धोबी, नाई, भिखारी और ऐसे ही अन्य पुरुष, जो उसे सहायता दे सकें, उसके
सहायक बन सकते हैं ॥ ९ ॥
केवलार्यास्त्वमी गम्याः—स्वतन्त्रः पूर्वे वयसि वर्तमानो वित्तवानपरोक्ष-
वृत्तिरधिकरणवानकृच्छाधिगतवित्तः। सङ्घर्षवान् सन्ततायः सुभगमानी श्लाघनकः
षण्डकश्च पुंशब्दार्थी। समानस्पर्धी स्वभावतस्त्यागी। राजनि महामात्रे वा सिद्धो
दैवप्रमाणो वित्तावमानी गुरूणां शासनातिगः सजातानां लक्ष्यभूतः सवित्त एकपुत्रो
लिङ्गी प्रच्छन्नकामः शूरो वैद्यश्चेति ॥ १० ॥
धन के लिये मिलने योग्य पुरुष—वेश्या इन व्यक्तियों से धन के लिये सम्बन्ध स्थापित
काम० १२

१५६ वात्स्यायन-कामसूत्र
करती है-जो पारिवारिक बन्धनों से पूर्णतः मुक्त हो, जो तरुण हो, धनवान् हो और तत्काल
खर्च कर सके, जिसके पास अत्यधिक पैतृक सम्पदा हो, जो स्वयं न कमाकर दूसरों की कमाई
खर्च करता हो, जो अन्य वेश्यागामियों से प्रतिद्वन्द्विता रखता हो, जो अपने रूप, सौन्दर्य और
सम्पत्ति का अभिमान रखता हो, जो नपुंसक होकर भी अपने को समर्थ पुरुष समझता हो, जो
दानशील हो, जो राजा या उसके राजपुरुषों पर अपना प्रभाव रखता हो, जो प्रख्यात ज्योतिषी,
चरित्रहीन, माता पिता का इकलौता बेटा, प्रच्छन्नकाम संन्यासी, शूरवीर और वैद्य हो ॥ १० ॥
प्रीतियशोऽर्थास्तु गुणतोऽधिगम्याः ॥ ११ ॥
गुण के कारण मिलने योग्य पुरुष-जो वेश्याएँ विशुद्ध प्रीति और यश की इच्छा
रखती हैं, वे गुणी पुरुषों से संसर्ग करती हैं ॥ ११ ॥
महाकुलीनो विद्वान् सर्वसमयज्ञः कविराख्यानकुशलो वाग्मी प्रगल्भो
विविधशिल्पज्ञो वृद्धदर्शी स्थूललक्षो महोत्साहो दृढभक्तिरनसूयकस्त्यागी मित्र-
वत्सलो घटागोष्ठीप्रेक्षणकसमाजसमस्याक्रीडनशीलो नीरुजोऽव्यङ्गशरीरः प्राण-
वानमद्यपो वृषो मैत्रः स्त्रीणां प्रणेता लालयिता च । न चासां वशगः स्वतन्त्रवृत्तिर-
निष्ठुरोऽनीर्ष्यालुरनवशङ्की चेति नायकगुणाः ॥ १२ ॥
नायकोचित गुण-प्रतिष्ठित कुल, प्रख्यात विद्वान्, सभी प्रकार के संकेतों का ज्ञाता,
कवि या कथाकार, बोलने में निपुण, चतुर, विविध शिल्पों का ज्ञानी, विनम्र, महाशय,
उत्साहसम्पन्न, दृढ़भक्त, अनिन्दक, त्यागशील, मित्रवत्सल, घटा-गोष्ठी-नाटक-समाज-
उत्तसव-समस्याक्रीड़ा आदि में रुचि रखने वाला, नीरोग एवं स्वस्थ शरीर, शक्तिशाली,
मदिरापान से दूर, प्रचण्ड कामशक्ति वाला, दयासम्पन्न, स्त्रियों के सदाचार का समर्थक और
रक्षक, स्त्रियों के वशीभूत न होने वाला, स्वतन्त्रवृत्ति वाला, सहृदय एवं ईर्ष्यारहित और निःशंक
स्वभाव वाला-ये नायक के गुण हैं ॥ १२ ॥
नायिका पुना रूपयौवनलक्षणमाधुर्ययोगिनी गुणेष्वनुरक्ता न तथार्थेषु प्रीति-
संयोगशीला स्थिरमतिरेकजातीया विशेषार्थिनी नित्यमकदर्यवृत्तिर्गोष्ठीकलाप्रिया
चेति नायिकागुणाः ॥ १३ ॥
नायिका के गुण-यह सुन्दरी, लावण्यसम्पन्न, रूप और यौवन से युक्त, सौभाग्यसूचक
चिह्नों वाली, माधुर्यसम्पन्न, नायक के गुणों में अनुरक्त, किन्तु उसके धन में आसक्ति न रखने
वाली, प्रेमपूर्वक सम्भोग चाहने वाली, स्थिर बुद्धि वाली, माया-मोह में न पड़ने वाली, नायक
की विशेषताओं पर रीझने वाली, पवित्रतापूर्वक जीवनयापन करने वाली तथा गोष्ठी एवं कलाओं
से प्रेम करने वाली हो ॥ १३ ॥
नायक-नायिकयो पुनर्बुद्धिशीलाचार आर्जवं कृतज्ञता दीर्घदूरदर्शित्वं अवि-
संवादिता देशकालज्ञता नागरकता दैन्यातिहासपैशुन्यपरिवादक्रोधलोभस्तम्भ-
चापलवर्जनं पूर्वाभिभाषिता कामसूत्रकौशलं तदङ्गविद्यासु चेति साधारण-
गुणाः ॥ १४ ॥
दोनों के सामान्य गुण-बुद्धि, शील, आचार, निश्छलता, कृतज्ञता, दूरदर्शिता, वाद-

६. वैशिक अधिकरण १५७
विवाद से दूर रहना, देश और काल को समझना, नागरक के गुणों से युक्त होना एवं दीनता,
अतिहास-परिहास, चुगलखोरी, परनिन्दा, क्रोध, लोभ, अभिमान और चपलता आदि दोषों से
रहित होना, बिना पूछे न बोलना, कामकलानिपुणता और उसकी अंगभूत गायन, वादन, नृत्य
आदि विद्याओं में अभिज्ञता—ये नायक और नायिका, दोनों के सामान्य गुण हैं ॥ १४ ॥
गुणविपर्यये दोषाः ॥ १५ ॥
नायक-नायिका के दोष—उपर्युक्त गुणों के विरुद्ध जो बातें हैं, ये दोष मानी
जाती हैं ॥ १५ ॥
क्षयी रोगी कृमिशकृद्वायसास्यः प्रियकलत्रः परुषवाक्कदर्यो निर्गुणो
गुरुजनपरित्यक्तः स्तेनो दम्भशीलो मूलकर्मणि प्रसक्तो मानापमानयोरनपेक्षी द्वेष्यै-
रप्यर्थहार्यो विलज्ज इत्यगम्याः ॥ १६ ॥
अगम्य नायक—जो क्षयरोगी, कोढ़ी, कृमिरोगी हो, जिसके मुख से दुर्गन्ध आती हो,
जिसे अपनी पत्नी प्रिय हो, जो कटुभाषी हो, दुराचारी हो, निर्दयी हो, माता पिता द्वारा बहिष्कृत
हो, जो चोर, कपटी, जादू टोने वाला, मानापमान की चिन्ता न करने वाला, लोभवश शत्रुओं से
भी मिल जाने वाला और निर्लज्ज हो—ऐसे पुरुष के साथ वेश्या को समागम नहीं करना
चाहिये ॥ १६ ॥
रागो भयमर्थः सङ्घर्षो वैरनिर्यातनं जिज्ञासा पक्षः खेदो धर्मो यशोऽनुकम्पा
सुहृद्वाक्यं ह्रीः प्रियसादृश्यं धन्यता रागापनयः साजात्यं साहवेश्यं सातत्यमायतिश्च
गमनकारणानि भवन्तीत्याचार्याः ॥ १७ ॥
मिलन के कारण—अनुराग, भय, धन, सङ्घर्ष, वैर निकालना, जानने की इच्छा,
पक्षपात, खेद (परिश्रम), धर्म, यश, अनुकम्पा, प्रियवाक्य, लज्जा, प्रियतम से समानता, दीनता,
राग की शान्ति, सजातीयता, साथ रहना और प्रभाव—ये वेश्या के गमन के कारण हैं, ऐसा
कामशास्त्र के आचार्यों का मत है ॥ १७ ॥
अर्थोऽनर्थप्रतीघातः प्रीतिश्चेति वात्स्यायनः ॥ १८ ॥
अर्थ (धन), अनर्थ की हानि (अनिष्ट का निवारण) और प्रीति—ये गमन के कारण हैं—
ऐसा आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ १८ ॥
अर्थस्तु प्रीत्या न बाधितः । अस्य प्राधान्यात् ॥ १९ ॥
अर्थ तो प्रीति से बाधित नहीं होता, क्योंकि वेश्या के लिये अर्थ ही प्रधान होता है ॥ १९ ॥
भयादिषु तु गुरुलाघवं परीक्ष्यमिति सहायगम्यागम्यगमनकारण-
चिन्ता ॥ २० ॥
भय आदि जो गमन के कारण बताये गये हैं, उनमें गुरुता और लघुता की परीक्षा कर ले।
इस प्रकार सहाय, गम्य, अगम्य और गमन के कारणों का विचार पूर्ण हुआ ॥ २० ॥
उपमन्त्रितापि गम्येन सहसा न प्रतिजानीयात्। पुरुषाणां सुलभावमानि-
त्वात् ॥ २१ ॥
गम्योपावर्तन प्रकरण—यदि समागमयोग्य पुरुष भी समागमहेतु आमन्त्रित करें, तो भी

१५८ वात्स्यायन-कामसूत्र
वेश्या को सहसा नहीं मिलना चाहिये, क्योंकि पुरुषों की यह प्रवृत्ति होती है कि वे सुलभ वस्तु
का अपमान कर, दुर्लभ की आकांक्षा करते हैं ॥ २१ ॥
भावजिज्ञासार्थं परिचारकमुखान् संवाहकगायनवैहासिकान् गम्ये तद्भाक्तान्
वा प्रणिदध्यात् ॥ २२ ॥
भावजिज्ञासा—नायक के भावों को जानने के लिये प्रमुख नौकर, संवाहक (हाथ-पैर
दबाने वाला), गायक और विदूषक को या दूसरे जो भी उसके भक्त हों, उन्हें नियुक्त
करें ॥ २२ ॥
तदभावे पीठमर्दादीन्। तेभ्यो नायकस्य शौचाशौचं रागापरागौ सक्तासक्ततां
दानादाने च विद्यात् ॥ २३ ॥
इनके अभाव में पीठमर्द१ आदि को नियुक्त करें। इनके माध्यम से ही नायक का अपने
प्रति जो शौच-अशौच, राग-अपराग, सक्तता-असक्तता, दान-अदान का भाव हो, उन सबको
जान लें ॥ २३ ॥
सम्भावितेन च सह विटपुरोगां प्रीतिं योजयेत् ॥ २४ ॥
जिसमें अपनी इच्छा की सभी बातों की सम्भावना हो उसके पीछे प्रेमपूर्वक विट
लगा दें ॥ २४ ॥
लावककुक्कुटमेषयुद्धशुकशारिकाप्रलापनप्रेक्षणककलाव्यपदेशेन पीठ-
मर्दो नायकं तस्या उदवसितमानयेत् ॥ २५ ॥
प्रेमसूत्र जोड़ने के उपाय—पीठमर्द को चाहिये कि लवा, मुर्गा और भेड़ा की लड़ाई,
शुक-सारिका आदि की बातें, नाटक-तमाशा आदि दिखाने, गीत-संगीत आदि का कलाकौशल
दिखाने के व्याज से नायक को वेश्या के घर ले जाये ॥ २५ ॥
तां वा तस्य ॥ २६ ॥
उस वेश्या को ही उस नायक के घर ले जाये ॥ २६ ॥
आगतस्य प्रीतिकौतुकजननं किञ्चिद् द्रव्यजातं स्वयमिदमसाधारणोपभोग्य-
मिति प्रीतिदायं दद्यात् ॥ २७ ॥
आगत का स्वागत—जब नायक वेश्या के घर आ जाये, तो वेश्या उसे प्रेमोपहार स्वरूप
ऐसी बहुमूल्य एवं असाधारण वस्तु स्वयं भेंट करे जो प्रीति एवं विस्मय उत्पन्न करने
वाली हो ॥ २७ ॥
यत्र च रमते तया गोष्ठ्यैनमुपचारैश्च रञ्जयेत् ॥ २८ ॥
गोष्ठी में सम्मान—और जहाँ नायक का मन रमता हो, उसी गोष्ठी में उपयुक्त उपचारों से
वेश्या उसका मनोरंजन करे ॥ २८ ॥
गते च सपरिहासप्रलापां सोपायनां परिचारिकामभीक्ष्णं प्रेषयेत् ॥ २९ ॥
प्रेम की दृढ़ता हेतु उपाय—नायक के घर चले जाने पर वेश्या मुस्कानपूर्वक मधुर वचन
बोलने वाली परिचारिका द्वारा प्रेमोपहार बार बार भिजवाये ॥ २९ ॥
१. पीठमर्द, विदूषक और विट—ये सब नायक के दूत होते हैं।

६. वैशिक अधिकरण १५९
सपीठमर्दायाश्च कारणापदेशेन स्वयं गमनमिति गम्योपावर्तनम् ॥ ३० ॥
स्वयं दर्शन—किसी बहाने से वेश्या पीठमर्द (सम्भोग की आयोजना करने वाला और
परामर्शदाता) को साथ लेकर स्वयं नायक के घर जाये। नायक को अपनी ओर आकर्षित
करने का प्रकरण पूर्ण हुआ ॥ ३० ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
ताम्बूलानि स्रजश्चैव संस्कृतं चानुलेपनम्।
आगतस्याहरेत् प्रीत्या कलागोष्ठीश्च योजयेत् ॥ ३१ ॥
उपसंहार—इस विषय में तीन आनुवंश्य श्लोक उद्धृत करते हैं—
संस्कृत पान, संस्कृत माला, संस्कृत चन्दन और संस्कृत इत्र आये हुए नायक को
प्रेमपूर्वक दे और कलागोष्ठियों का आयोजन करे ॥ ३१ ॥
द्रव्याणि प्रणये दद्यात् कुर्याच्च परिवर्तनम्।
सम्प्रयोगस्य चाकूतं निजेनैव प्रयोजयेत् ॥ ३२ ॥
आदान-प्रदान—प्रेम बढ़ाने के लिये प्रेमोपहार दे और ले। सम्भोग के गुप्त संकेतों को
वेश्या स्वयं ही प्रकट करे ॥ ३२ ॥
प्रीतिदायैरुपन्यासैरुपचारैश्च केवलैः।
गम्येन सह संसृष्टा रञ्जयेत्तं ततः परम्॥ ३३ ॥
प्रीतिपूर्वक दिये जाने वाले उपहारों से, पीठमर्द आदि की बातों से और सम्भोगसूचक
भावों से पहले नायक को अनुरक्त करे, तत्पश्चात् सम्भोग करे ॥ ३३ ॥
सहायगम्यागम्यगमन कारणचिन्ता प्रकरण
नामक प्रथम अध्याय सम्पन्न ॥
द्वितीय अध्याय
कान्तानुवृत्तप्रकरण
संयुक्ता नायकेन तद्रञ्जनार्थमेकचारिणीवृत्तमनुतिष्ठेत् ॥ १ ॥
एकचारिणी व्रत—नायक के साथ संयुक्त होने पर उसको अनुरक्त करने के लिये
एकचारिणीवृत्त का अनुकरण करना चाहिये ॥ १ ॥
रञ्जयेन्न तु सज्जैत सक्तवच्च विचेष्टेतेति संक्षेपोक्तिः ॥ २ ॥
कान्तानुवृत्त—वेश्या को चाहिये कि उस नायक को पूर्णतः अनुरक्त कर ले और स्वयं
भी आसक्त के समान चेष्टाएँ करे, किन्तु आसक्त न हो। यह वेश्या के अधीन होने वाला चरित्र
संक्षेप में कह दिया गया है ॥ २ ॥
मातरि च क्रूरशीलायामर्थपरायां चायत्ता स्यात् ॥ ३ ॥

१६० वात्स्यायन-कामसूत्र
माँ के संरक्षण में कार्य—वेश्या को क्रूर स्वभाव वाली और धनलोलुप माँ के अधीन
ही रहना चाहिये ॥ ३ ॥
तदभावे मातृकायाम् ॥ ४ ॥
यदि माँ न हो तो बनायी हुई माँ या मौसी के अधीन रहे ॥ ४ ॥
सा तु गम्येन नातिप्रीयेत ॥ ५ ॥
सगी माँ हो या मौसी, ये वेश्याएँ नायकों पर अतिस्नेह नहीं दिखातीं ॥ ५ ॥
प्रसह्य च दुहितरमानयेत् ॥ ६ ॥
नायकों के साथ देर तक बैठने पर लड़की को बलपूर्वक ले जाये ॥ ६ ॥
तत्र तु नायिकायाः सन्ततमरतिर्निर्वेदो व्रीडा भयं च ॥ ७ ॥
बेटी का शिष्टता-प्रदर्शन—माँ द्वारा ऐसा व्यवहार करने पर वेश्या अपने नायक के
समक्ष जाने में अरुचि, लज्जा और भय दिखाये ॥ ७ ॥
न त्वेव शासनातिवृत्तिः ॥ ८ ॥
माँ का आज्ञापालन—कभी भी ऐसा न हो कि माँ की आज्ञा न माने ॥ ८ ॥
व्याधिं चैकमनिमित्तमजुगुप्सितमचक्षुर्ग्राह्यमनित्यं च ख्यापयेत् ॥ ९ ॥
व्याधि का बहाना—नायक के पास से जाने के लिये वेश्या को चाहिये कि किसी ऐसी
व्याधि का बहाना बनाये जो अकारण, अनिन्दित, आँखों से न दिखने वाली और सदैव न रहने
वाली हो ॥ ९ ॥
सति कारणे तदपदेशं च नायकानभिगमनम् ॥ १० ॥
बहाने का फल—मिलन का कारण उपस्थित होने पर व्याधि का बहाना करना न
मिलना ही है ॥ १० ॥
निर्माल्यस्य तु नायिका चेटिकां प्रेष्येत्ताम्बूलस्य च ॥ ११ ॥
इसकी विधि—स्वागत सत्कार में प्रयुक्त होने वाली वस्तु पान, इलायची आदि नौकरानी
के हाथों भिजवा दे ॥ ११ ॥
व्यवाये तदुपचारेषु विस्मयः ॥ १२ ॥
मिलनविषयक बातें—सम्भोग काल में नायक द्वारा प्रयुक्त उपचारों पर विस्मय प्रदर्शित
करे ॥ १२ ॥
चतुःषष्ट्यां शिष्यत्वम् ॥ १३ ॥
सम्भोग की अङ्गभूत आलिङ्गन आदि चौंसठ कामकलाओं में नायक की शिष्यता
स्वीकारे ॥ १३ ॥
तदुपदिष्टानां च योगानामाभीक्ष्ण्येनअनुयोगः ॥ १४ ॥
नायक जिन जिन योगों को बताये, उस पर केवल उन्हीं योगों का प्रयोग करे ॥ १४ ॥
तत्सात्म्याद् रहसि वृत्तिः ॥ १५ ॥
एकान्त में नायक के अनुकूल ही व्यवहार करे ॥ १५ ॥
मनोरथानामाख्यानम् ॥ १६ ॥

६. वैशिक अधिकरण १६१
मनोरथ कथन—एकान्त में नायक से अपनी इच्छाएँ कह दे ॥ १६ ॥
गुह्यानां वैकृतप्रच्छादनम् ॥ १७ ॥
दोषों को छिपाना—यदि गुह्यांगों में कोई कुरूपता, दोष या विकार हो तो उसे छिपाये
रखे ॥ १७ ॥
शयने परावृत्तस्यानुपेक्षणम् ॥ १८ ॥
शयन-विधि—यदि नायक करवट बदलकर सोये तो वेश्या को उसकी ओर मुख करके
ही सोना चाहिये ॥ १८ ॥
आनुलोम्यं गुह्यस्पर्शने ॥ १९ ॥
नायक द्वारा काँख, योनि आदि का स्पर्श करने पर उसे न रोके ॥ १९ ॥
सुप्तस्य चुम्बनमालिङ्गनं च ॥ २० ॥
सोते हुए नायक का चुम्बन और आलिङ्गन करे ॥ २० ॥
प्रेक्षणमन्यमनस्कस्य। राजमार्गे च प्रासादस्थायास्तत्र विदिताया व्रीडा
शाठ्यनाशः ॥ २१ ॥
देखने की विधि—सड़क पर जाते हुए अन्यमनस्क नायक को निर्निमेष दृष्टि से देखे,
दूर निकल जाने पर झरोखे से देखे और यदि उसकी दृष्टि पड़ जाये तो शरमा जाये ॥ २१ ॥
तद्द्वेष्ये द्वेष्यता। तत्प्रिये प्रियता। तद्रम्ये रतिः। तमनु हर्षशोकौ। स्त्रीषु
जिज्ञासा। कोपश्चादीर्घः ॥ २२ ॥
व्यवहार की विधि—नायक के शत्रु को अपना शत्रु समझे, उसके प्रेमी से प्रेम रखे,
उसके मनोनुकूल स्थान पर समागम करे, उसके हर्ष में हर्षित और दुःख में दुःखी हो, उसकी
स्त्रियों के विषय में जानने की इच्छा रखे और क्रोध अल्पकालिक ही करे ॥ २२ ॥
स्वकृतेष्वपि नखदशनचिह्नेष्वन्याशङ्का ॥ २३ ॥
अपने द्वारा किये गये नखक्षतों एवं दन्तक्षतों को भी किसी अन्य के होने की शङ्का
करे ॥ २३ ॥
अनुरागस्यावचनम् ॥ २४ ॥
अनुराग को मुख से कदापि न कहे ॥ २४ ॥
आकारतस्तु दर्शयेत् ॥ २५ ॥
परन्तु अपनी चेष्टाओं से प्रकट कर दे, मुख से न कहे ॥ २५ ॥
मदस्वप्नव्याधिषु तु निर्वचनम् ॥ २६ ॥
मदिरापान, सोने और उन्माद आदि व्याधि के बहाने अपनी सम्भोगेच्छा स्पष्ट कर
दे ॥ २६ ॥
श्लाघ्यानां नायककर्मणां च ॥ २७ ॥
नायक के सत्कर्मों को भी इसी अवस्था में कह दे ॥ २७ ॥
तस्मिन् ब्रुवाणे वाक्यार्थग्रहणम्। तदवधार्य प्रशंसाविषये भाषणम्।
तद्वाक्यस्य चोत्तरेण योजनम्। भक्तिमांश्चेत् ॥ २८ ॥

१६२ वात्स्यायन-कामसूत्र
बोलने की रीति—नायक के बोलने पर उसकी बातों का आशय समझे, उसकी बातों
को समझकर प्रशंसा भी करे, उससे विषयों पर वार्तालाप करे और उसकी बातों का उत्तर तभी
दे जब यह समझ ले कि यह स्नेहसम्पन्न है ॥ २८ ॥
कथास्वनुवृत्तिरन्यत्र सपत्न्याः ॥ २९ ॥
केवल सपत्नियों की प्रेमकथाओं को छोड़कर, नायक की प्रत्येक बात में 'हाँ' करनी
चाहिये ॥ २९ ॥
निःश्वासे जृम्भिते स्खलिते पतिते वा तस्य चार्तिमाशंसीत ॥ ३० ॥
सहानुभूति के अवसर—नायक के लम्बी साँसें लेने, जँभाई लेने, धन आदि भूल जाने
या गिरने पर दुःख प्रकट करे ॥ ३० ॥
क्षुतव्याहृतविस्मितेषु जीवेत्युदाहरणम् ॥ ३१ ॥
नायक के छींकने, महत्त्वपूर्ण बात कहने और आश्चर्य व्यक्त करने पर 'जीते रहो' ऐसा
कहे ॥ ३१ ॥
दौर्मनस्ये व्याधिदौर्हृदापदेशः ॥ ३२ ॥
नायक का मन मलिन देखकर उसका कारण पूछे और स्वयं भी रोग और शत्रु का बहाना
करे ॥ ३२ ॥
गुणतः परस्याकीर्तनम् ॥ ३३ ॥
नायक के समक्ष किसी अन्य के गुणों की प्रशंसा न करे ॥ ३३ ॥
न निन्दा समानदोषस्य ॥ ३४ ॥
जिसमें नायक के समान ही दोष हों, उसकी निन्दा कदापि न करे ॥ ३४ ॥
दत्तस्य धारणम् ॥ ३५ ॥
नायक द्वारा दी गयी वस्तु को उसके सामने सदैव धारण करना चाहिये ॥ ३५ ॥
वृथापराधे तद्व्यसने वालङ्कारस्याग्रहणभोजनं च ॥ ३६ ॥
मिथ्या आरोप लगाने या नायक पर सङ्कट आने पर उसे भोजन एवं शृंगार का परित्याग
कर देना चाहिये ॥ ३६ ॥
तद्युक्ताश्च विलापाः ॥ ३७ ॥
उसके लिये शोकाकुल होकर विलाप करे ॥ ३७ ॥
तेन सह देशमोक्षं रोचयेद्राजनि निष्क्रयं च ॥ ३८ ॥
नायक के साथ सहजीवन को प्राथमिकता—नायक के साथ देश छोड़कर भाग जाने
की इच्छा व्यक्त करे अथवा राजकीय व्यवस्था के अनुरूप खरीद डालने की बात कहे ॥ ३८ ॥
सामर्थ्यमायुषस्तदवाप्तौ ॥ ३९ ॥
जीवनसार्थक मानना—वेश्या नायक के मिलन से ही अपना जीवन सार्थक होना
कहे ॥ ३९ ॥
तस्यार्थाधिगमेऽभिप्रेतसिद्धौ शरीरोपचये वा पूर्वसम्भाषित इष्टदेवतोप-
हारः ॥ ४० ॥

६. वैशिक अधिकरण १६३
देवपूजा—नायक को धन मिलने, मनोवाञ्छित कार्य पूरा होने और शारीरिक रोग के
नष्ट हो जाने पर पहले बोली गयी देवभेंट चढ़ाये ॥ ४० ॥
नित्यमलङ्कारयोगः। परिमितोऽभ्यवहारः ॥ ४१ ॥
भोजन और अलंकार की रीति—सदैव सजी-सँवरी रहना चाहिये और सन्तुलित
भोजन करना चाहिये ॥ ४१ ॥
गीते च नामगोत्रयोग्रहणम्। ग्लान्यामुरसि ललाटे च करं कुर्वीत। तत्सुखमुप-
लभ्य निद्रालाभः ॥ ४२ ॥
वेश्या जब गाये तो उसमें नायक का नाम और कुल रखे। अस्वस्थ होने पर उसका हाथ
अपने मस्तक और वक्ष पर रख ले। उसके हाथ के स्पर्श के बहाने सो जाये ॥ ४२ ॥
उत्सङ्गे चास्योपवेशनं स्वपनं च। गमनं वियोगे ॥ ४३ ॥
नायक की गोद में बैठना और सोना चाहिये और जब वह जाये तो उसके पीछे पीछे भी
चले ॥ ४३ ॥
तस्मात् पुत्रार्थिनी स्यात्। आयुषो नाधिक्यमिच्छेत् ॥ ४४ ॥
नायक से सन्तान की इच्छा—उस नायक से पुत्रप्राप्ति की कामना करे और आयु में
उससे अधिक न जीना चाहे ॥ ४४ ॥
एतस्याविज्ञातमर्थं रहसि न ब्रूयात् ॥ ४५ ॥
आवश्यक बातें—जिस धन का नायक को पता न हो, उस धन को कभी एकान्त में भी
नहीं बताना चाहिये ॥ ४५ ॥
व्रतमुपवासं चास्य निवर्तयेत् मयि दोष इति। अशक्ये स्वयमपि तद्रूपा
स्यात् ॥ ४६ ॥
मुझे दोष लगेगा, यह कहकर नायक को व्रत और उपवास करने से रोक दे। यदि वह
कहने से भी न रुके तो उसके साथ स्वयं भी व्रत और उपवास करे ॥ ४६ ॥
विवादे तेनाप्यशक्यमित्यर्थनिर्देशः ॥ ४७ ॥
यदि किसी के साथ विवाद हो जाये तो कह दे कि इसे तो वही निपटा सकता है, दूसरा
कोई नहीं ॥ ४७ ॥
तदीयमात्मीयं वा स्वयमविशेषेण पश्येत् ॥ ४८ ॥
नायक की सम्पत्ति को अपनी ही समझे ॥ ४८ ॥
तेन विना गोष्ठ्यादीनामगमनमिति ॥ ४९ ॥
उसके बिना गोष्ठी या उत्सव में न जाये ॥ ४९ ॥
निर्माल्यधारणे श्लाघ्या उच्छिष्टभोजने च ॥ ५० ॥
नायक की उतारी हुई वस्तुएँ धारण करने और उसका उच्छिष्ट (जूठन) खाने में गौरव का
अनुभव करे ॥ ५० ॥
कुलशीलशिल्पजातिविद्यावर्णवित्तदेशमित्रगुणवयोमाधुर्यपूजा ॥ ५१ ॥

१६४ वात्स्यायन-कामसूत्र
नायक के कुल, शील, शिल्प, जाति, विद्या, वर्ण, धन, देश, मित्र, गुण, अवस्था और
मधुरता की सदैव प्रशंसा करे ॥ ५१ ॥
गीतादिषु चोदनमभिज्ञस्य ॥ ५२ ॥
यदि नायक गाना बजाना जानता हो तो उसे इस कार्य में लगाये ॥ ५२ ॥
भयशीतोष्णवर्षाण्यनपेक्ष्य तदभिगमनम् ॥ ५३ ॥
प्रतिकूल ऋतु में भी अभिसार—यदि नायक के साथ समागम का समय निश्चित हो
गया है तो भय, शीत, और वर्षा की ओर ध्यान नहीं देना चाहिये ॥ ५३ ॥
स एव च मे स्यादित्यौर्ध्वदेहिकेषु वचनम् ॥ ५४ ॥
जन्मान्तर सम्बन्धों की कामना—'मरने के पश्चात् दूसरे जन्म में मुझे आप ही प्रियतम
के रूप में प्राप्त हों'—ऐसा कहे ॥ ५४ ॥
तदिष्टरसभावशीलानुवर्तनम् ॥ ५५ ॥
नायक को जो रस, भाव और शील प्रिय लगता हो, उसका ही अनुकरण करे ॥ ५५ ॥
मूलकर्माभिशङ्का ॥ ५६ ॥
वशीकरण की शंका—नायक के ऊपर जादू-टोने की शङ्का करे ॥ ५६ ॥
तदभिगमने च जनन्या सह नित्यं विवादः ॥ ५७ ॥
माँ से विवाद—नायक से मिलने के लिये माँ से नित्य विवाद करे ॥ ५७ ॥
बलात्कारेण च यद्यन्यत्र तया नीयेत तदा विषमनशनं शस्त्रं रज्जुमिति
कामयेत ॥ ५८ ॥
माँ को भयभीत करना—यदि माँ उसे बलपूर्वक किसी अन्य के साथ सम्भोग के लिये
कहे तो यह कह दे—'जहर खा लूँगी, खाना नहीं खाऊँगी, चाकू मारकर आत्महत्या कर लूँगी,
फाँसी लगाकर मर जाऊँगी' ॥ ५८ ॥
प्रत्यायनं च प्रणिधिभिर्नायकस्य । स्वयं वात्मनो वृत्तिग्रहणम् ॥ ५९ ॥
रहस्योद्घाटन पर प्रयास—यदि नायक को यह पता लग जाये कि यह अन्य से भी
सम्बन्ध रखती है तो अपने आदमियों द्वारा नायक को विश्वास दिलवा दे। यदि अपने आदमियों
से यह सम्भव न हो पाये तो स्वयं जाकर इस वृत्ति (वेश्यावृत्ति) की निन्दा करे ॥ ५९ ॥
न त्वेवार्थेषु विवादः ॥ ६० ॥
धन के विषय में विवाद नहीं—धन के विषय में विवाद न करें ॥ ६० ॥
मात्रा बिना किञ्चिन्न चेष्टेत ॥ ६१ ॥
सभी कार्यों में माता की सहमति—माँ से बिना पूछे कोई कार्य न करे अर्थात् सब काम
माँ से पूछकर ही करे ॥ ६१ ॥
प्रवासे शीघ्रागमनाय शापदानम् ॥ ६२ ॥
नायक के विदेशगमन पर शपथ—यदि नायक किसी कार्य से विदेश जा रहा हो तो
उसे शीघ्र लौटने की शपथ अवश्य दिलाये ॥ ६२ ॥