सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 183, कुल 248 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 183

६. वैशिक अधिकरण १५७
विवाद से दूर रहना, देश और काल को समझना, नागरक के गुणों से युक्त होना एवं दीनता,
अतिहास-परिहास, चुगलखोरी, परनिन्दा, क्रोध, लोभ, अभिमान और चपलता आदि दोषों से
रहित होना, बिना पूछे न बोलना, कामकलानिपुणता और उसकी अंगभूत गायन, वादन, नृत्य
आदि विद्याओं में अभिज्ञता—ये नायक और नायिका, दोनों के सामान्य गुण हैं ॥ १४ ॥
गुणविपर्यये दोषाः ॥ १५ ॥
नायक-नायिका के दोष—उपर्युक्त गुणों के विरुद्ध जो बातें हैं, ये दोष मानी
जाती हैं ॥ १५ ॥
क्षयी रोगी कृमिशकृद्वायसास्यः प्रियकलत्रः परुषवाक्कदर्यो निर्गुणो
गुरुजनपरित्यक्तः स्तेनो दम्भशीलो मूलकर्मणि प्रसक्तो मानापमानयोरनपेक्षी द्वेष्यै-
रप्यर्थहार्यो विलज्ज इत्यगम्याः ॥ १६ ॥
अगम्य नायक—जो क्षयरोगी, कोढ़ी, कृमिरोगी हो, जिसके मुख से दुर्गन्ध आती हो,
जिसे अपनी पत्नी प्रिय हो, जो कटुभाषी हो, दुराचारी हो, निर्दयी हो, माता पिता द्वारा बहिष्कृत
हो, जो चोर, कपटी, जादू टोने वाला, मानापमान की चिन्ता न करने वाला, लोभवश शत्रुओं से
भी मिल जाने वाला और निर्लज्ज हो—ऐसे पुरुष के साथ वेश्या को समागम नहीं करना
चाहिये ॥ १६ ॥
रागो भयमर्थः सङ्घर्षो वैरनिर्यातनं जिज्ञासा पक्षः खेदो धर्मो यशोऽनुकम्पा
सुहृद्वाक्यं ह्रीः प्रियसादृश्यं धन्यता रागापनयः साजात्यं साहवेश्यं सातत्यमायतिश्च
गमनकारणानि भवन्तीत्याचार्याः ॥ १७ ॥
मिलन के कारण—अनुराग, भय, धन, सङ्घर्ष, वैर निकालना, जानने की इच्छा,
पक्षपात, खेद (परिश्रम), धर्म, यश, अनुकम्पा, प्रियवाक्य, लज्जा, प्रियतम से समानता, दीनता,
राग की शान्ति, सजातीयता, साथ रहना और प्रभाव—ये वेश्या के गमन के कारण हैं, ऐसा
कामशास्त्र के आचार्यों का मत है ॥ १७ ॥
अर्थोऽनर्थप्रतीघातः प्रीतिश्चेति वात्स्यायनः ॥ १८ ॥
अर्थ (धन), अनर्थ की हानि (अनिष्ट का निवारण) और प्रीति—ये गमन के कारण हैं—
ऐसा आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ १८ ॥
अर्थस्तु प्रीत्या न बाधितः । अस्य प्राधान्यात् ॥ १९ ॥
अर्थ तो प्रीति से बाधित नहीं होता, क्योंकि वेश्या के लिये अर्थ ही प्रधान होता है ॥ १९ ॥
भयादिषु तु गुरुलाघवं परीक्ष्यमिति सहायगम्यागम्यगमनकारण-
चिन्ता ॥ २० ॥
भय आदि जो गमन के कारण बताये गये हैं, उनमें गुरुता और लघुता की परीक्षा कर ले।
इस प्रकार सहाय, गम्य, अगम्य और गमन के कारणों का विचार पूर्ण हुआ ॥ २० ॥
उपमन्त्रितापि गम्येन सहसा न प्रतिजानीयात्। पुरुषाणां सुलभावमानि-
त्वात् ॥ २१ ॥
गम्योपावर्तन प्रकरण—यदि समागमयोग्य पुरुष भी समागमहेतु आमन्त्रित करें, तो भी