वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० वात्स्यायन-कामसूत्र
माँ के संरक्षण में कार्य—वेश्या को क्रूर स्वभाव वाली और धनलोलुप माँ के अधीन
ही रहना चाहिये ॥ ३ ॥
तदभावे मातृकायाम् ॥ ४ ॥
यदि माँ न हो तो बनायी हुई माँ या मौसी के अधीन रहे ॥ ४ ॥
सा तु गम्येन नातिप्रीयेत ॥ ५ ॥
सगी माँ हो या मौसी, ये वेश्याएँ नायकों पर अतिस्नेह नहीं दिखातीं ॥ ५ ॥
प्रसह्य च दुहितरमानयेत् ॥ ६ ॥
नायकों के साथ देर तक बैठने पर लड़की को बलपूर्वक ले जाये ॥ ६ ॥
तत्र तु नायिकायाः सन्ततमरतिर्निर्वेदो व्रीडा भयं च ॥ ७ ॥
बेटी का शिष्टता-प्रदर्शन—माँ द्वारा ऐसा व्यवहार करने पर वेश्या अपने नायक के
समक्ष जाने में अरुचि, लज्जा और भय दिखाये ॥ ७ ॥
न त्वेव शासनातिवृत्तिः ॥ ८ ॥
माँ का आज्ञापालन—कभी भी ऐसा न हो कि माँ की आज्ञा न माने ॥ ८ ॥
व्याधिं चैकमनिमित्तमजुगुप्सितमचक्षुर्ग्राह्यमनित्यं च ख्यापयेत् ॥ ९ ॥
व्याधि का बहाना—नायक के पास से जाने के लिये वेश्या को चाहिये कि किसी ऐसी
व्याधि का बहाना बनाये जो अकारण, अनिन्दित, आँखों से न दिखने वाली और सदैव न रहने
वाली हो ॥ ९ ॥
सति कारणे तदपदेशं च नायकानभिगमनम् ॥ १० ॥
बहाने का फल—मिलन का कारण उपस्थित होने पर व्याधि का बहाना करना न
मिलना ही है ॥ १० ॥
निर्माल्यस्य तु नायिका चेटिकां प्रेष्येत्ताम्बूलस्य च ॥ ११ ॥
इसकी विधि—स्वागत सत्कार में प्रयुक्त होने वाली वस्तु पान, इलायची आदि नौकरानी
के हाथों भिजवा दे ॥ ११ ॥
व्यवाये तदुपचारेषु विस्मयः ॥ १२ ॥
मिलनविषयक बातें—सम्भोग काल में नायक द्वारा प्रयुक्त उपचारों पर विस्मय प्रदर्शित
करे ॥ १२ ॥
चतुःषष्ट्यां शिष्यत्वम् ॥ १३ ॥
सम्भोग की अङ्गभूत आलिङ्गन आदि चौंसठ कामकलाओं में नायक की शिष्यता
स्वीकारे ॥ १३ ॥
तदुपदिष्टानां च योगानामाभीक्ष्ण्येनअनुयोगः ॥ १४ ॥
नायक जिन जिन योगों को बताये, उस पर केवल उन्हीं योगों का प्रयोग करे ॥ १४ ॥
तत्सात्म्याद् रहसि वृत्तिः ॥ १५ ॥
एकान्त में नायक के अनुकूल ही व्यवहार करे ॥ १५ ॥
मनोरथानामाख्यानम् ॥ १६ ॥