सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 248 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 185

६. वैशिक अधिकरण १५९
सपीठमर्दायाश्च कारणापदेशेन स्वयं गमनमिति गम्योपावर्तनम् ॥ ३० ॥
स्वयं दर्शन—किसी बहाने से वेश्या पीठमर्द (सम्भोग की आयोजना करने वाला और
परामर्शदाता) को साथ लेकर स्वयं नायक के घर जाये। नायक को अपनी ओर आकर्षित
करने का प्रकरण पूर्ण हुआ ॥ ३० ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
ताम्बूलानि स्रजश्चैव संस्कृतं चानुलेपनम्।
आगतस्याहरेत् प्रीत्या कलागोष्ठीश्च योजयेत् ॥ ३१ ॥
उपसंहार—इस विषय में तीन आनुवंश्य श्लोक उद्धृत करते हैं—
संस्कृत पान, संस्कृत माला, संस्कृत चन्दन और संस्कृत इत्र आये हुए नायक को
प्रेमपूर्वक दे और कलागोष्ठियों का आयोजन करे ॥ ३१ ॥
द्रव्याणि प्रणये दद्यात् कुर्याच्च परिवर्तनम्।
सम्प्रयोगस्य चाकूतं निजेनैव प्रयोजयेत् ॥ ३२ ॥
आदान-प्रदान—प्रेम बढ़ाने के लिये प्रेमोपहार दे और ले। सम्भोग के गुप्त संकेतों को
वेश्या स्वयं ही प्रकट करे ॥ ३२ ॥
प्रीतिदायैरुपन्यासैरुपचारैश्च केवलैः।
गम्येन सह संसृष्टा रञ्जयेत्तं ततः परम्॥ ३३ ॥
प्रीतिपूर्वक दिये जाने वाले उपहारों से, पीठमर्द आदि की बातों से और सम्भोगसूचक
भावों से पहले नायक को अनुरक्त करे, तत्पश्चात् सम्भोग करे ॥ ३३ ॥
सहायगम्यागम्यगमन कारणचिन्ता प्रकरण
नामक प्रथम अध्याय सम्पन्न ॥
द्वितीय अध्याय
कान्तानुवृत्तप्रकरण
संयुक्ता नायकेन तद्रञ्जनार्थमेकचारिणीवृत्तमनुतिष्ठेत् ॥ १ ॥
एकचारिणी व्रत—नायक के साथ संयुक्त होने पर उसको अनुरक्त करने के लिये
एकचारिणीवृत्त का अनुकरण करना चाहिये ॥ १ ॥
रञ्जयेन्न तु सज्जैत सक्तवच्च विचेष्टेतेति संक्षेपोक्तिः ॥ २ ॥
कान्तानुवृत्त—वेश्या को चाहिये कि उस नायक को पूर्णतः अनुरक्त कर ले और स्वयं
भी आसक्त के समान चेष्टाएँ करे, किन्तु आसक्त न हो। यह वेश्या के अधीन होने वाला चरित्र
संक्षेप में कह दिया गया है ॥ २ ॥
मातरि च क्रूरशीलायामर्थपरायां चायत्ता स्यात् ॥ ३ ॥