वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५४ वात्स्यायन-कामसूत्र
सन्दृश्य शास्त्रतो योगान् पारदारिकलक्षितान्।
न याति छलनां कश्चित् स्वदारान् प्रति शास्त्रवित्॥ ४६ ॥
उपसंहार—परकीया स्त्रियों को दुष्ट व्यक्ति जिस तरह से फँसाया करते हैं, उन सबको
इस पारदारिक अधिकरण में पढ़कर, कोई भी मर्मज्ञ व्यक्ति अपनी स्त्री के विषय में धोखा नहीं
खा सकता॥ ४६॥
पाक्षिकत्वात् प्रयोगाणामपायानां च दर्शनात्।
धर्मार्थयोश्च वैलोम्यान्नाचरेत् पारदारिकम्॥ ४७॥
शास्त्र में परकीयागमन जीवन को बचाने के अन्तिम उपाय के रूप में ही अनुमत है,
परकीया के पीछे लोग मरते भी देखे जाते हैं, इससे धर्म और अर्थ—दोनों का ही विनाश होता
है, इसलिये परकीयागमन नहीं करना चाहिये॥ ४७॥
तदेतद्दारगुप्त्यर्थमारब्धं श्रेयसे नृणाम्।
प्रजानां दूषणायैव न विज्ञेयोऽस्य संविधिः॥ ४८॥
पुरुषों के कल्याण और स्त्रियों के सतीत्व की रक्षा के लिये यह अधिकरण कहा गया है।
अतएव इसमें कहे गये प्रयोगों का उपयोग किसी को दूषित करने के लिये कदापि न किया
जाये॥ ४८॥
ईश्वरकामित प्रकरण नामक पञ्चम अध्याय सम्पन्न॥
•
६.
वैशिक षष्ठ अधिकरण
प्रथम अध्याय
सहायगम्यागम्यगमनकारणचिन्ताप्रकरण
वेश्यानां पुरुषाधिगमे रतिर्वृत्तिश्च सर्गात्॥ १॥
वेश्याओं का काम और प्रयोजन—प्रारम्भ से ही पुरुष की प्राप्ति होने पर वेश्याओं को
रतिसुख और जीविका की प्राप्ति होती है॥ १॥
रतितः प्रवर्तनं स्वाभाविकं कृत्रिममर्थार्थम्॥ २॥
स्वाभाविक और कृत्रिम प्रवृत्ति—जब वेश्या रतिसुख के लिये प्रवृत्त होती है तो
उसकी प्रवृत्ति स्वाभाविक होती है और जब धन के लिये प्रवृत्त होती है तो उसकी प्रवृत्ति
कृत्रिम होती है॥ २॥
तदपि स्वाभाविकवद् रूपयेत्॥ ३॥
कृत्रिम राग को स्वाभाविक दिखाना—वेश्याओं को चाहिये कि जहाँ कृत्रिम राग भी