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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 248 में से

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पृष्ठ 187

६. वैशिक अधिकरण १६१
मनोरथ कथन—एकान्त में नायक से अपनी इच्छाएँ कह दे ॥ १६ ॥
गुह्यानां वैकृतप्रच्छादनम् ॥ १७ ॥
दोषों को छिपाना—यदि गुह्यांगों में कोई कुरूपता, दोष या विकार हो तो उसे छिपाये
रखे ॥ १७ ॥
शयने परावृत्तस्यानुपेक्षणम् ॥ १८ ॥
शयन-विधि—यदि नायक करवट बदलकर सोये तो वेश्या को उसकी ओर मुख करके
ही सोना चाहिये ॥ १८ ॥
आनुलोम्यं गुह्यस्पर्शने ॥ १९ ॥
नायक द्वारा काँख, योनि आदि का स्पर्श करने पर उसे न रोके ॥ १९ ॥
सुप्तस्य चुम्बनमालिङ्गनं च ॥ २० ॥
सोते हुए नायक का चुम्बन और आलिङ्गन करे ॥ २० ॥
प्रेक्षणमन्यमनस्कस्य। राजमार्गे च प्रासादस्थायास्तत्र विदिताया व्रीडा
शाठ्यनाशः ॥ २१ ॥
देखने की विधि—सड़क पर जाते हुए अन्यमनस्क नायक को निर्निमेष दृष्टि से देखे,
दूर निकल जाने पर झरोखे से देखे और यदि उसकी दृष्टि पड़ जाये तो शरमा जाये ॥ २१ ॥
तद्द्वेष्ये द्वेष्यता। तत्प्रिये प्रियता। तद्रम्ये रतिः। तमनु हर्षशोकौ। स्त्रीषु
जिज्ञासा। कोपश्चादीर्घः ॥ २२ ॥
व्यवहार की विधि—नायक के शत्रु को अपना शत्रु समझे, उसके प्रेमी से प्रेम रखे,
उसके मनोनुकूल स्थान पर समागम करे, उसके हर्ष में हर्षित और दुःख में दुःखी हो, उसकी
स्त्रियों के विषय में जानने की इच्छा रखे और क्रोध अल्पकालिक ही करे ॥ २२ ॥
स्वकृतेष्वपि नखदशनचिह्नेष्वन्याशङ्का ॥ २३ ॥
अपने द्वारा किये गये नखक्षतों एवं दन्तक्षतों को भी किसी अन्य के होने की शङ्का
करे ॥ २३ ॥
अनुरागस्यावचनम् ॥ २४ ॥
अनुराग को मुख से कदापि न कहे ॥ २४ ॥
आकारतस्तु दर्शयेत् ॥ २५ ॥
परन्तु अपनी चेष्टाओं से प्रकट कर दे, मुख से न कहे ॥ २५ ॥
मदस्वप्नव्याधिषु तु निर्वचनम् ॥ २६ ॥
मदिरापान, सोने और उन्माद आदि व्याधि के बहाने अपनी सम्भोगेच्छा स्पष्ट कर
दे ॥ २६ ॥
श्लाघ्यानां नायककर्मणां च ॥ २७ ॥
नायक के सत्कर्मों को भी इसी अवस्था में कह दे ॥ २७ ॥
तस्मिन् ब्रुवाणे वाक्यार्थग्रहणम्। तदवधार्य प्रशंसाविषये भाषणम्।
तद्वाक्यस्य चोत्तरेण योजनम्। भक्तिमांश्चेत् ॥ २८ ॥