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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

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पृष्ठ 177

५. पारदारिक अधिकरण १५१
पुटापुटयोगैर्वा नष्टच्छायारूपः ॥ २४ ॥
अथवा पुट और अपुट के योग से अपनी छाया और रूप को लुप्त करके अन्तःपुर में जाया
जा सकता है ॥ २४ ॥
तत्रायं प्रयोगाः—नकुलहृदयं चोरकतुम्बीफलानि सर्पाक्षीणि चान्तर्धूमेन
पचेत् । ततोऽञ्जनेन समभागेन पेषयेत् । अनेनाभ्यक्तनयनो नष्टच्छायारूपश्चरति ।
अन्यैश्च जलब्रह्मक्षेमशिरःप्रणीतैर्बाह्यपानकैर्वा ॥ २५ ॥
पुटापुट योग—पुटापुट योग यह है—नकुल का हृदय, चोरक तूम्बी के फल, सर्प की
आँखें—इन तीनों वस्तुओं को पुटपाक विधि से अग्नि पर पका लिया जाये। इनके बराबर अंजन
मिलाकर पीस लिया जाये। इस अंजन को आँखों में लगाते ही रूप और छाया—दोनों ही
तिरोहित हो जाते हैं अर्थात् न रूप किसी को दिखायी देता है और न छाया ही। इनके अतिरिक्त
जलब्रह्म, क्षेमशिर प्रणीत बाह्यपानक भी है ॥ २५ ॥
रात्रिकौमुदीषु च दीपिकासम्बाधे सुरङ्गया वा ॥ २६ ॥
दीपावली की रात्रि को दीपक लेकर जब अनेक व्यक्ति इधर उधर दौड़ रहे हों तो वैसा
ही वेश बनाकर उनमें मिल जाये या सुरंग के मार्ग से चला जाये ॥ २६ ॥
तत्रैतद्भवति—
द्रव्याणामपि निर्हारे पानकानां प्रवेशने।
आपानकोत्सवार्थेऽपि चेटिकानां च संभ्रमे ॥
व्यत्यासे वेश्मनां चैव रक्षिणां च विपर्यये।
उद्यानयात्रागमने यात्रातश्च प्रवेशने॥
दीर्घकालोदयां यात्रां प्रोषिते चापि राजनि।
प्रवेशनं भवेत् प्रायो यूनां निष्क्रमणं तथा ॥ २७ ॥
अन्तःपुर में प्रवेश कराने और निकलने के उपाय—जब वस्तुओं को ठेला आदि में
लादकर अन्दर से बाहर या बाहर से अन्दर ले जाया जा रहा हो, जब मदिरापान की गोष्ठी या
उत्सव आदि में सम्मिलित होने के लिये व्यक्ति आ जा रहे हों, जब राजभवन की चेटियाँ कार्य
से व्यग्र होकर इधर उधर भाग दौड़ कर रही हों, जब एक भवन का सामान दूसरे भवन में रखा
जा रहा हो, जब सुरक्षाकर्मी बदले जा रहे हों, जब राजपरिवार उद्यानयात्रा के लिये प्रस्थान कर
रहा हो या वहाँ से लौट रहा हो, और जब राजा कहीं लम्बी यात्रा के लिये बाहर जा रहे हों—
ऐसे अवसरों पर तरुण नागरक अन्तःपुर में सरलता से प्रविष्ट हो सकता है और बाहर निकल
सकता है ॥ २७ ॥
परस्परस्य कार्याणि ज्ञात्वा चान्तःपुरालयाः।
एककार्यास्ततः कुर्युः शेषाणामपि वेदनम्॥
दूषयित्वा ततोऽन्योन्यमेककार्यार्पणे स्थिरः।
अभेद्यतां गतः सद्यो यथेष्टं फलमश्नुते ॥ २८ ॥
अन्तःपुर की स्त्रियाँ परस्पर एक दूसरे के रहस्य को समझकर सङ्गठित हो जायें, और