वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५. पारदारिक अधिकरण १५३
संहत्य नवदशेत्येकैकं युवानं प्रच्छादयन्ति प्राच्यानामिति। एवं परस्त्रियः
प्रकुर्वीत। इत्यन्तःपुरिकावृत्तम् ॥ ३८ ॥
प्राच्यों की प्रवृत्ति—नौ-दस स्त्रियाँ मिलकर एक चण्डवेग पुरुष को छिपाकर अन्तःपुर
में रख लेती हैं—यह प्राच्यों की प्रवृत्ति है। (यदि अन्तःपुर की स्त्रियों के पास जाना ही पड़े तो
इस प्रकार जाना चाहिये।) इस प्रकार अन्तःपुरिकावृत्त पूर्ण हुआ ॥ ३८ ॥
एभ्य एवं च कारणेभ्यः स्वदारान् रक्षेत् ॥ ३९ ॥
स्त्रीरक्षा का उपाय—इन्हीं कारणों से अपनी स्त्री की रक्षा करे ॥ ३९ ॥
कामोपधाशुद्धान् रक्षिणोऽन्तःपुरे स्थापयेदित्याचार्याः ॥ ४० ॥
जो व्यक्ति कामविषयक परीक्षा में सफल हुए हों, उन्हीं को अन्तःपुर का रक्षक नियुक्त
करना चाहिये—यह कामशास्त्र के आचार्यों का मत है ॥ ४० ॥
ते हि भयेन चार्थेन चान्यं प्रयोजयेयुस्तस्मात् कामभयार्थोपधाशुद्धानिति
गोणिकापुत्रः ॥ ४१ ॥
कामविषयक परीक्षा में उत्तीर्ण व्यक्ति भी भय और लोभ से दूसरों को अन्तःपुर में प्रविष्ट
करा सकते हैं, इसलिये काम, भय और धन—इन तीनों की परीक्षा में उत्तीर्ण व्यक्ति को ही
अन्तःपुर में रक्षक नियुक्त करना चाहिये—यह गोणिकापुत्र का मत है ॥ ४१ ॥
अद्रोहो धर्मस्तमपि भयाज्जह्यादतो धर्मभयोपधाशुद्धानिति वात्स्यायनः ॥ ४२ ॥
स्वामिद्रोह करना अधर्म है, लेकिन व्यक्ति भय के कारण उसे भी छोड़ सकता है, अतएव
जो निर्भीक और धर्मात्मा हों, उन्हें ही अन्तःपुर में रक्षक नियुक्त करे—यह आचार्य वात्स्यायन
का मत है ॥ ४२ ॥
परवाक्याभिधायिनीभिश्च गूढाकाराभिः प्रमदाभिरात्मदारानुपदध्याच्छौचा-
शौचपरिज्ञानार्थमिति बाभ्रवीयाः ॥ ४३ ॥
परपुरुष के कहे गये वाक्यों का बहाना करके कहने वाली और अपना अभिप्राय छिपा
लेने वाली स्त्रियों से अपनी स्त्रियों की परीक्षा करा ले कि उनमें कितनी सदाचारिणी हैं और
कितनी दुराचारिणी—ऐसा आचार्य बाभ्रव्य के अनुयायियों (शिष्यों) का मत है ॥ ४३ ॥
दुष्टानां युवतिषु सिद्धत्वान्नाकस्माददुष्टदूषणमाचरेदिति वात्स्यायनः ॥ ४४ ॥
दुष्ट व्यक्ति तो स्त्री को फँसाया ही करते हैं, इसलिये अकारण सदाचारियों को दूषित न
किया जाये—यह आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ ४४ ॥
अतिगोष्ठी निरङ्कुशत्वं भर्तुः स्वैरता पुरुषैः सहानियन्त्रणता प्रवासेऽवस्थानं
विदेशे निवासः स्ववृत्त्युपघातः स्वैरिणीसंसर्गः पत्युरीर्ष्यालुता चेति स्त्रीणां
विनाशकारणानि ॥ ४५ ॥
विनाश के कारण—अत्यधिक गप्पें मारना, निरंकुशता, स्वेच्छाचारिता, पुरुषों के साथ
खुला व्यवहार, पति के विदेशगमन पर एकाकी रहना, घर से बाहर विदेश में रहना, जीविका-
विहीन होना, कुलटा स्त्रियों का संसर्ग और पति से ईर्ष्या रखना—ये स्त्रियों के विनाश के
कारण हैं ॥ ४५ ॥