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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

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६. वैशिक अधिकरण १५५
हो, उसे भी स्वाभाविक के समान ही दिखायें, कृत्रिमता न प्रतीत होने दें, यही उसकी कला-
कुशलता है ॥ ३ ॥
कामपरासु हि पुंसां विश्वासयोगात् ॥ ४ ॥
इसका कारण—पुरुष अनुरक्त स्त्री में ही कामासक्त हुआ करते हैं ॥ ४ ॥
अलुब्धतां च ख्यापयेत् तस्य निदर्शनार्थम् ॥ ५ ॥
प्रेम के समय निर्लोभता दिखाये—केवल नायक को दिखाने के लिये वेश्या निर्लोभ
बन जाये ॥ ९ ॥
न चानुपायेनाथान् साधयेदायतिसंरक्षणार्थम् ॥ ६ ॥
उपाय से ही धनप्राप्ति—अपना प्रभाव अक्षुण्ण रखने के लिये वेश्या को चाहिये कि
विना उपाय के धन प्राप्त न करे ॥ ६ ॥
नित्यमलङ्कारयोगिनी राजमार्गविलोकिनी दृश्यमाना न चातिविवृता तिष्ठेत्।
पण्यसधर्मत्वात् ॥ ७॥
रहन-सहन—वेश्या को चाहिये कि सदैव सजी-सँवरी रहे, सड़क की ओर देखती रहे,
ऐसे स्थान पर बैठे कि सबको सरलता में दिखती रहे, लेकिन अत्यधिक खुली होकर न बैठे,
क्योंकि वह बाजार में बिकने वाली वस्तु जैसी ही है ॥ ७ ॥
यैर्नायकमावर्जयेदन्याभ्यश्चावच्छिन्द्यादात्मनश्चानर्थं प्रतिकुर्यादर्थं च साधयेन्न
च गम्यैः परिभूयेत तान् सहायान् कुर्यात् ॥ ८ ॥
वेश्याओं के सहायक—वेश्याओं को अपना सहायक उन लोगों को बनाना चाहिये जो
नायक को अपनी ओर आकृष्ट कर सकें, दूसरी वेश्या से नायकों को विरक्त कर दें, वेश्याओं पर
आये अनर्थों को दूर कर दें, उसका प्रयोजन सिद्ध कर दें और जिन्हें वेश्यानायक दबा न
सकें ॥ ८ ॥
ते त्वारक्षकपुरुषा धर्माधिकरणस्था दैवज्ञा विक्रान्ताः शूराः समानविद्याः
कलाग्राहिणः पीठमर्दविटविदूषकमालाकारगान्धिकशौण्डिकरंजकनापितभिक्षु-
कास्ते च ते च कार्ययोगात् ॥ ९ ॥
वेश्या की रक्षा करने वाला शासकीय अधिकारी, वकील, ज्योतिषी, साहसी, शूरवीर,
वेश्या के समान ही कलाकुशल, कला सीखने वाला, पीठमर्द, विदूषक, मालाकार, गन्धी,
मदिरा-विक्रेता, धोबी, नाई, भिखारी और ऐसे ही अन्य पुरुष, जो उसे सहायता दे सकें, उसके
सहायक बन सकते हैं ॥ ९ ॥
केवलार्यास्त्वमी गम्याः—स्वतन्त्रः पूर्वे वयसि वर्तमानो वित्तवानपरोक्ष-
वृत्तिरधिकरणवानकृच्छाधिगतवित्तः। सङ्घर्षवान् सन्ततायः सुभगमानी श्लाघनकः
षण्डकश्च पुंशब्दार्थी। समानस्पर्धी स्वभावतस्त्यागी। राजनि महामात्रे वा सिद्धो
दैवप्रमाणो वित्तावमानी गुरूणां शासनातिगः सजातानां लक्ष्यभूतः सवित्त एकपुत्रो
लिङ्गी प्रच्छन्नकामः शूरो वैद्यश्चेति ॥ १० ॥
धन के लिये मिलने योग्य पुरुष—वेश्या इन व्यक्तियों से धन के लिये सम्बन्ध स्थापित
काम० १२