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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

१८० वरिवस्यारहस्ये
शक्ति की दो भूमियाँ
विकास भूमि सङ्कोचभूमि (ऊर्ध्व कुण्डलिनी)
(अधः कुण्डलिनी) —(प्रत्यभिज्ञाहृदयम्)
(विकास) (सङ्कोच)
अथावस्थापञ्चकं शून्यषट्कं विषुवत्सप्तकं च जपकाले विभागव्यमाह—
इन्द्रियदशकेत्यादिना, एवमवस्थेत्यन्तेन श्लोकषोडशकेन ।
इन्द्रियदशकव्यवहृतिरूपा या जागरावस्था ।
तत्र प्रकाशरूपो हेतुर्भाव्यस्तृतीये रेफे ॥ ३७ ॥
(जागृतावस्था और रेफस्थ प्रकाश के अंतर्संबन्ध का प्रतिपादन)
जिसमें दस इन्द्रियाँ व्यवहार (जागतिक क्रियाओं का निष्पादन) करती हैं
उसके स्वरूपवाली जो जागृतावस्था है उसमें, तृतीयकूट के रेकस्थान में होने वाले,
उस प्रकाश की कल्पना करनी चाहिए जो कि जागृतावस्था का कारण है ॥ ३७ ॥

  • प्रकाश *
    कर्मेन्द्रियाणि पञ्च वाक्पाणिपादपायूपस्थानि; ज्ञानेन्द्रियाण्यपि पञ्च

प्रथमोऽशः १८१
(३) आन्तरवृत्तेर्लवतो, लीनप्रायस्य जीवस्य । वेदनमेव सुषुप्तिः ॥ ३९ ॥
(४) तुर्यावस्थाचिदभि व्यञ्जकनादस्य वेदनं प्रोक्तम् ॥ ३९ ॥
(५) आनन्दैकघनत्वं यद्वाचामपि न गोचरो नृणाम् । तुरीयातीतावस्था ॥ ४१ ॥
शब्द की भी (१) जागर (२) स्वप्न (३) सुषुप्ति (४) तुरीय—चार अवस्थायें
बतायी गई हैं । 'तुरीय' शब्द ही 'शब्दब्रह्म' है । इसका अतिक्रम करके अतितुर्य
या पर ब्रह्मपद की प्राप्ति होती है । यह परब्रह्म ही 'परमशिव' है । आचार्य शङ्कर
ने 'प्रपञ्चसार तन्त्र' के टीकाकार पद्मपादाचार्य ने चेतन तत्त्व को इन पाँच स्तरों पर
स्थित देखा है—(१) स्थूल, (२) सूक्ष्म, (३) कारण, (४) सामान्य, (५) साक्षी ।१
ग्रन्थान्तर में यह भी कहा गया है कि शब्द का सघोष एवं अघोष बाह्य व्यवहार
उसकी 'जागरावस्था' है । समष्टिरूप से हम इसे 'विराटशब्द' कह सकते हैं । पर
श्रूयमाण शब्द सघोष शब्द या वाचिक शब्द हैं । अघोष (उपांशु = स्वयं मात्र को
श्रुत) अघोष है । जाग्रत दशा में सर्वत्र सघोष एवं अघोषात्मक वाग्व्यवहार रूप
शब्दानुविद्धता ही प्रधानतः दृष्टिगोचर होती है । यह स्थूल शब्द वैखरी वाक् कहा
जाता है । कर्मेन्द्रियों एवं ज्ञानेन्द्रियों का व्यवहार ही जागृतावस्था है ।२
अन्तःकरणचतुष्कव्यवहारः स्वाप्निकावस्था ।
सा तार्तीयैकाराद्बध्यापि गलस्थले चिन्त्या ॥ ३८ ॥
(स्वप्नावस्था एवं मन्त्राक्षर 'ई' में स्थित प्रकाश के अंतर्संबंध का विवेचन)
अन्तःकरणचतुष्टय का व्यवहारस्वरूप (जागतिक क्रियानिष्पादनरूप) जो
स्वप्नावस्था है (उसका कारणरूप जो प्रकाश है) उसे तृतीय कूट की हृल्लेखा में
स्थित ईकार रूप कामकला के द्वारा (उस स्वप्नावस्था में विद्यमान) समझना
चाहिए । द्वितीय कूट के लकार को भी वैसे ही समझना चाहिए ॥ ३८ ॥

  • प्रकाश *
    मनो बुद्धिरहङ्कारश्चित्तं चेत्यन्तःकरणानि चत्वारि । तैरेवं व्यवहारः स्वप्नः ।
    तज्जनकः प्रकाशस्तृतीयहृल्लेखास्थकामकलया१ बोध्यः । अथापि गलस्थले द्वैतीयी-
    कलकारे चिन्त्यः । गलस्थश्चासौ लश्चेति विग्रहः ॥ ३८ ॥
  • सरोजिनी *
    प्रस्तुत श्लोक में स्वप्नावस्था एवं उससे पञ्चदशी मन्त्र का सम्बंध क्या
    है?—इसका निरूपण किया गया है । उनका कथन है कि—अन्तःकरण चतुष्टय
    के व्यवहार का अपर पर्याय है 'स्वप्न' । इस स्वप्नावस्था का मूलभूत (केन्द्रीय)
    कारण कौन हैं? इसका कारण है वह अचिन्त्य दिव्य प्रकाश जो कि तृतीय कूट
    की हृल्लेखा में स्थित ईकार रूप कामकला । भास्कराचार्य कहते हैं—'मनो
    १. पद्मपादाचार्य—प्रपञ्चसार की टीका २. भास्करराय—प्रकाश

१८२ वरिवस्यारहस्ये
• बुद्धिरहङ्कारश्चितं चेत्यन्तः करणानि चत्वारि । तैरेव व्यवहारः “स्वप्नः” । तज्जनकः
प्रकाश स्तुतीय हृल्लेखास्थकामकलया बोध्यः ॥'
द्वितीय कूट के लकार को भी वैसा ही समझना चाहिए । 'स्वप्नावस्था' की
केन्द्रीय शक्ति है 'ह्रीं' में स्थित ईकार स्वरूप 'कामकला' ॥ ३८ ॥
आन्तरवृत्तेर्लयतो लीनप्रायस्य जीवस्य ।
वेदनमेव सुषुप्तिश्चिन्त्या तार्तीयबिन्दौ सा ॥ ३९ ॥
(सुषुप्ति का स्वरूप)
तृतीयकूट के बिन्दु में उस सुषुप्ति की भावना करनी चाहिए जो कि सुषुप्ति
का कारण है और जिसमें समस्त अन्तःकरण एवं जीव निद्रामग्न हैं ॥ ३९ ॥

  • प्रकाश *
    विवरणमत आत्मसुखाज्ञानविषयिकास्तिस्रोऽविद्यावृत्तयः स्वीकृता इत्यत आह—
    आन्तरवृत्तेरिति । अन्तःकरणपरिणामरूपवृत्तेरित्यर्थः । वार्त्तिकमते वृत्तिसामान्याभाव
    एव सुषुप्तिः । तार्तीयबिन्दौ ललाटस्थाने ॥ ३९ ॥
  • सरोजिनी *
    'सुषुप्ति'—जिस समय अपने व्यापार-सहित बुद्धि अपने कारण अज्ञान में
    विलीन हो जाती है उसी को विज्ञ पुरुषों ने 'निद्रा' कहा है ।१ सुषुप्ति-काल में घोर
    निद्रा में सकल इन्द्रियाँ एवं मन, बुद्धि इत्यादि तथा इनकी वृत्तियाँ अपने उपादान
    कारण अविद्या में विलीन हो जाती हैं और उस समय आत्मा की जाग्रत-स्वप्न
    अवस्थाओं के अभाव होने के कारण विश्व तैजस आदि संज्ञा नहीं रहती, उस समय
    तो वह तमावृत अपने स्वरूप सुख का बिना किसी साधन की सहायता के ही
    स्वयं भोग करता है ।२
    वृत्तियाँ एवं सुषुप्ति—
    (१) विवरणकार का मत—आत्मसुख के अज्ञानविषयिक तीन अविद्या वृत्तियाँ
    हैं । अन्तःकरण का परिणाम रूप ही वृत्तियाँ हुआ करती हैं ।
    (२) वार्तिककार का मत—वृत्ति सामान्य का अभाव ही सुषुप्ति है ।
    तुर्यावस्था चिदभिव्यञ्जकनादस्य वेदनं प्रोक्तम् ।
    तद्भावनार्धचन्द्रादिकं त्रयं व्याप्त कर्त्तव्यः ॥ ४० ॥
    (तुरीयावस्था का स्वरूप)
    चैतन्य को अभिव्यक्त करने वाली जो नादावस्था है (वह अवस्था जिसमें
    'नाद' पूर्ण चैतन्य को अभिव्यक्त करता है) 'तुरीयावस्था' कहलाती है । उसकी
    १. वराहोपनिषद

प्रथमोऽंशः १८३
भावना अर्द्धचन्द्र एवं (उसके आगे के) वर्णत्रय तक की जानी चाहिए ॥ ४० ॥

  • प्रकाश *
    अर्धचन्द्ररोधिनीनादेषु व्याप्तस्तुर्यावस्थाप्रकाशो भाव्यः ॥ ४० ॥
  • सरोजिनी *
    ज्ञान की सात भूमिकायें
    |
    ┌─────┬─────┬─────┬─────┬─────┬─────┐
    शुभेच्छा विचारणा तनुमानसा सत्वापत्ति असंसक्ति पदार्थ भावना तुरीयगा
    ज्ञान की सात भूमिकायें हैं । उनमें अन्तिम भूमिका है 'तुरीयगा' । 'शुभेच्छा
    प्रथमा भूमिका भवति । विचारणा द्वितीया तनुमानसी तृतीया । सत्वापत्तिस्तुरीया ।
    असंसक्तिः पञ्चमी । पदार्थ भावना षष्ठी । तुरीयगा सप्तमी ॥'
    (१) अकार, उकार, मकार एवं अर्धमात्रा वाली प्रणवात्मिका भूमिका होती हैं ।
    (२) उन अकार, उकारादि चार मात्राओं के प्रत्येक के स्थूल, सूक्ष्म कारण
    एवं साक्षी भेद से चार-चार प्रकार के होते हैं । उसमें भी अकारादि के जो स्थूलादि
    चार भेद हैं उनके प्रत्येक के जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति एवं तुरीय—ये चार भेद से
    अवस्थायें होती हैं । आत्मा के भी चार भेद हैं—विश्व, तैजस, प्राज्ञ, तुरीय ।
    'तदवस्था जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ति तुरीयाः ।'
    अकार का स्थूल अंश में—जाग्रत-विश्व, उनके सूक्ष्म अंश में जाग्रत तैजस,
    उसके बीज अंश में जागृत-प्राज्ञ एवं उसके साक्षी अंश में जागृत-तुरीय है ।
    उकार के स्थूल अंश में स्वप्न-विश्व, उसके सूक्ष्म अंश में स्वप्न-तैजस, उसके
    बीजांश में स्वप्न-प्राज्ञ एवं उसके साक्षी अंश में स्वप्न-तुरीय है । प्रणव की तृतीय
    मात्रा मकार के स्थूल अंश में सुषुप्ति-विश्व, उसके सूक्ष्म अंश में सुषुप्ति-तैजस
    उसके बीजांश में सुषुप्ति-प्राज्ञ एवं उसके साक्षी अंश में सुषुप्ति-प्राज्ञ और उसके
    साक्षी अंश में सुषुप्ति-तुरीय हैं । प्रणव की चौथी अर्धमात्रा के स्थूल अंश में
    तुरीय-विश्व उसके सूक्ष्म अंश में तुरीय तैजस, उसके बीज अंश में तुरीय-प्राज्ञ एवं
    उसके साक्षी अंश में तुरीय-तुरीय है ।
    (३) अकार के स्थूलांश से तुरीयांश तक जो चार अवस्थायें हैं, उनमें तीन
    भूमिकायें हैं—प्रथमा—'शुभेच्छा', द्वितीया—'विचारणा', तृतीया—'तनुमानसा' ।
    उकार के स्थूलांश से लेकर तुरीय तक—चौथी 'सत्त्वापत्ति' भूमिका होती है ।
    मकार के स्थूलांश से लेकर तुरीयांश तक पाँचवी असंसक्ति नामक भूमिका होती
    है । अर्धमात्रा के स्थूलांश से लेकर उसके तुरीयांश तक छठवीं 'पदार्थभावना'
    नामक 'भूमिका' होती है । इन समस्त भूमिकाओं के अनन्तर जो अवस्था होती
    है । वही सप्तमी 'तुरीयगा' भूमिका है ।

१८४ वरिवस्यारहस्ये
'ज्ञानभूमिः शुभेच्छास्यात्प्रथमा समुदीरिता ।
विचारणा द्वितीया तु, तृतीया तनुमानसा ।
सत्त्वापत्तिश्चतुर्थी स्यात्ततोऽसंसक्तिनामिका ।
पदार्थभावना षष्ठी सप्तमी तुर्यगास्मृता ॥'
'तुरीयगा' का स्वरूप क्या है?
यत्र नासन्त सद्गूपो, नाहं नाप्य न हंकृतिः ।
केवलं क्षीणमनन आस्तेऽद्वैतेडित निर्भयः ॥
अन्तः शून्यो बहिः शून्यः शून्य कुंभइवाम्बरे ।
अन्तः पूर्णो बहिः पूर्णः पूर्ण कुंभ इवार्णवे ॥ १८ ॥
मा भव ग्राह्यभावात्मा ग्राहकात्मा च मा भव !
भावना मखिलां त्यक्त्वा यच्छिष्टं तन्मयो भव !
द्रष्टृदर्शनदृश्यानि त्यक्त्वा वासनया सह ।
दर्शन प्रथमाभासमात्मानं केवल भज ॥१
बिन्दु कुण्डलिनी
┌───────────┼───────────┐
वह्नि सूर्य सोम
कुण्डलिनी कुण्डलिनी कुण्डलिनी
┌ ○ महाबिन्दु ┌ ई ┐ स्वप्न महाबिन्दु
│ ० ◡ उन्मनी │ रं ┘ जागर ↓
│ ० समना ┌ ह ┐ उन्मनी
│ । │ ल │ भूमि ↓
तुर्यातीतावस्था │ ▽ ◡ व्यापिका │ क │ विष्णु समना
│ ० │ स ┘ भारती ↓
│ ०० शक्ति └ ह्रीं व्यापिका
│ ०|◡ नादान्त ┌ ल ┐ ब्रह्मा ↓
│ ┌ ह │ भूमि ┐ शक्ति
│ ०|० नाद │ क │ विष्णु │ स्वप्न तुर्यातीतावस्था ↓
तुर्यावस्था │ ▽ ◡ रोधिनी │ स │ भारती │ नादान्त
│ │ ह ┘ ब्रह्मा │ ↓
│ ◡ अर्धचन्द्र └ मिथुनम् │ नाद
┌─┴─ ⸗ ◡ बिन्दु ┌ ह्रीं रुद्राणी │ ↓
सुषुप्ति └─┬─ │ रुद्र ┘ तुर्यावस्था रोधिनी
│ ल ┐ विष्णु ↓
│ ई │ भूमि अर्धचन्द्र
│ ए │ भारती सुषुप्ति ┌─ ↓
└ क ┘ ब्रह्मा └─ बिन्दु
१. वराहोपनिषद

प्रथमोऽंशः १८५
चक्र
'वाग्भवकूट' 'कामराजकूट' 'शक्तिकूट'
१) त्रैलोक्यमोहन १) सर्वसौभाग्यदायक १) सर्वरोगहर
२) सर्वाशापरिपूरकम् २) सर्वार्थसाधक २) सर्वसिद्धिप्रद
३) सर्वसंक्षोभण भूपुर ३) सर्वरक्षाकर ३) सर्वानन्दमय
षोडशदल, अष्टदल ४) चतुर्दशार, बहिर्दशार, सर्वानन्दमय
अन्तर्दशार ४) अष्टार, त्र्यश्र,
बिन्दु
वाक्चतुष्टय (मातृका)
'परा' 'पश्यन्ती' 'मध्यमा' 'वैखरी'
(मूला) (नाभि) (हृदय) (कण्ठ)
(धार चक्र) (मणिपूरक चक्र) (अनाहत चक्र) (विशुद्ध चक्र)
आनन्दैकघनत्वं यद्वाचामपि न गोचरो नृणाम् ।
तुर्यातीतावस्था सा नादान्तादिपञ्चके भाव्या ॥ ४१ ॥
(तुर्यातीतावस्था का स्वरूप)
(वह) आनन्दैकघन अवस्था जो मनुष्यों की वाणी से परे है 'तुर्यातीतावस्था'
(कहलाती) है । उसकी 'नादान्त' आदि पञ्चवर्णों में भावना करनी चाहिए ॥ ४१ ॥

  • सरोजिनी *
    इस श्लोक में 'तुर्यातीतावस्था' के स्वरूप पर प्रकाश डाला गया है ।
    (१) 'तुर्यातीतावस्था' आनन्दैकघन, अवाङ्मनसगोचर अवस्था है ।
    (२) 'तुर्यातीतावस्था' नादान्त आदि पाँच वर्णों में स्थित है ।
    अवस्थापञ्चकं निरूप्य शून्यषट्कं निरूपयति—
    तार्तीयीके रेफस्थाने बिन्दौ च रोधिन्याम् ।
    नादान्तव्यापिकयोश्चन्द्रकतुल्यानि पञ्च शून्यानि ॥ ४२ ॥
    उन्मन्यां नीरूपं षष्ठं चिन्त्यं महाशून्यम् ।
    क्रमात् प्राप्तानि सप्त विषुवन्त्याह—
    प्राणात्ममानसानां संयोगः प्राणविषुवाख्यः ॥ ४३ ॥

१८६ वरिवस्यारहस्ये
(बिन्दु एवं पञ्चशून्य-अन्तस्संबन्ध)
तृतीयकूट के रेफ, बिन्दु, रोधिनी, नादान्त एवं व्यापिका स्थानों में पञ्च शून्यों
की, मयूर के पङ्ख में स्थित चन्द्र के रूप में, भावना करनी चाहिए ॥ ४२ ॥
(महाशून्य की भावना एवं 'प्राणविषुव' का स्वरूप)
'उन्मनी' में रूप शून्य छठे (शून्य) महाशून्य की भावना करनी चाहिए ।
प्राण, आत्मा एवं मन के संयोग का नाम 'प्राणविषुव' है ॥ ४३ ॥
* प्रकाश *
चन्द्रको मयूरपिच्छाग्रगतं चन्द्राकारं शून्यम् । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—
'शिखिपक्षचित्ररूपैर्मण्डलैः शून्यपञ्चकम् ।
ध्यायतो ऽनुत्तरे शून्यं परं व्योम तनुर्भवेत् ॥'
इति । यद्यपि
'अग्न्यादिद्वादशान्तेषु त्रींस्त्रींस्त्यक्त्वा वरानने ।
शून्यत्रयं विजानीयादेकैकान्तरितं प्रिये ।
शून्यत्रयात् परे स्थाने महाशून्यं विभावयेत् ॥'
इति पूजासङ्केते रेफादिमहाबिन्द्वन्तेषु द्वादशसु स्थानेषु मध्ये त्रयं त्रयं त्यक्त्वा,
एकैकमन्तरितं मध्यस्थितं शून्यत्रयं विजानीयादित्यर्थादर्धचन्द्रशक्तिमहाबिन्दुषु शून्यत्रयं
तदूर्ध्वं चतुर्थमित्यर्थः; अथ वा, आदावन्ते च त्रयं त्रयं त्यक्त्वा मध्यस्थे ऽर्धचन्द्रादि-
व्यापिकान्तषट्क एकैकव्यवधानेन शून्यत्रयं तत्परे चतुर्थमित्यर्थचन्द्रनादशक्तिषु त्रीणि
शून्यानि व्यापिकायां महाशून्यमिति वार्थः स्पष्टं प्रतीयते; तथापि
'शून्यषट्कं सुरेशानि अवस्थापञ्चकं पुनः ।
विषुवत्सप्तरूपं च भावयन्मनसा जपेत् ॥'
इत्युपक्रमविरोधादन्यथार्थः । तथा हि—अग्न्यादीति भिन्नं पदं शून्यत्रये ऽन्वेति ।
अन्तशब्दश्चरमावयववाची । अर्थाच्चरमहृल्लेखासंबन्धिषु द्वादशस्ववयवेषु हकारा-
द्युन्मनान्तेषु, अग्न्यादि रेफमारभ्य शून्ययोस्त्रयं शून्यषट्कं विजानीयात् । तच्च न
रेफादिसान्तत्येन, किं त्वेकैकव्यवधानेनेति । अत आह—एकैकान्तरितमिति । प्रथम-
शून्यस्य रेफस्थानीयत्वे कथिते व्यवधानमर्थाद्धकारेकारार्धचन्द्रनादशक्तिसमनाभिः
षड्भिरिति सिध्यति । तदेवाह—त्रींस्त्रीनिति । द्विगुणतांस्त्रींस्त्यक्त्वेत्यर्थः । शून्यत्रयात्
शून्ययोस्त्रयस्य, तत्षट्कस्येत्यर्थः । 'सुपां सु—' इति सुपो डस आदादेशः । निर्धारणे
षष्ठी । तेषां मध्ये परे चरम उन्मन्यां महाशून्यमिति । एतद्विभावनस्य परमरहस्यत्वादित्थं
क्लेशेनोक्ति- रित्यन्वयितव्यम् ॥ ४२ ॥
क्रमात् प्राप्तानि सप्त विषुवन्त्याह—
ककारात्मकवायुः प्राणः । आत्मा प्राण मनश्चेत्येतेषामैक्यं प्राणविषुवसंज्ञमिति
केचित् । यथाश्रुतमन्ये ॥ ४३ ॥

प्रथमोऽशः १८७

  • सरोजिनी *
    पञ्चदशाक्षरी मन्त्र के तृतीय कूट—'स क ल ह्रीं' के रेफ, बिन्दु, रोधिनी,
    नादान्त एवं व्यापिका में पाँच शून्य अवस्थित हैं । ये उसी प्रकार स्थित हैं जैसे
    कि मोर के पङ्खों में चन्द्राकार आकृति ॥
    'स क ल ह्रीं' के 'रेफ', 'बिन्दु', 'रोधिनी', 'नादान्त' एवं 'व्यापिका' में ५
    शून्यों की अवस्थिति ।
    महानाद या नादान्त—ये ब्रह्म का प्रथम क्रियात्मक विकास कहा जा सकता
    है । 'नाद' वह स्वरूप है जो सारे विश्व को नादान्त से भरे हुए हैं । यह नादान्त
    की पूर्णावस्था है । निरोधिनी नाद की वह अवस्था है जिसमें बिन्दु को विकसित
    करने की क्षमता रहती है । नाद की सूक्ष्मावस्थायें भी हैं—इनमें निष्कल उन्मनी
    अन्तिम है—
    नाद की अवस्थायें
    | प्रथमा-वस्था | द्वितीया-वस्था | तृतीया-वस्था | चतुर्थ अवस्था | पञ्चम अवस्था | छठवीं अवस्था | सातवीं अवस्था | आठवीं अवस्था | नवीं अवस्था |
    | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: |
    | 'बिन्दु' | 'अर्धचन्द्र' | 'रोधिनी' | 'नाद' | 'नादान्त' | 'शक्ति' | 'व्यापिका' | 'समना' | 'उन्मना' |
    बिन्दु के बाद शक्तियाँ सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूप धारण करती चली जाती हैं और
    अन्त में उन्मनी अवस्था (अनुत्पन्न निस्पंद वाक्) आ जाती है । 'उन्मनी' =
    कारणरूपा शक्ति की अवस्था है । इस अवस्था में—काल, कला, देवता आदि
    किसी का भी आभास नहीं रह जाता । यह 'स्वनिर्वाणपद' है—निर्विकल्प निरञ्जन
    शिवशक्ति है । १ "Unmani is Nirākār and Nirucchār soundless and
    without ulterance defined by any adjective, being beyond mind and
    speech and universe" २ यह अवाङ्मनसगोचरा, निराकार, निरुच्चार, निरूप
    अवस्था है ।
    कुछ तांत्रिकों ने बिन्दु से भी ३ नादों की उत्पत्ति बतायी है—ये निम्न हैं—
    (१) 'सूक्ष्मवाद' (२) 'अक्षरनाद' (३) 'वर्णनाद' । (क) 'सूक्ष्मनाद' = अचिन्त्य,
    अभिधेय बुद्धिका कारण एवं बिन्दु का प्रथम प्रसार है । (ख) 'अक्षरनाद' = यह
    सूक्ष्मनाद का कार्य है और परामर्श ज्ञान समन्वित है । (ग) 'वर्णनाद' = इसकी
    उत्पत्ति आकाश एवं वायु से होती है । कुण्डलिनी भी नादरूपा है । नाद-बिन्दु ।
    बिन्दु = वेदान्त का ईश्वर । 'नाद' शक्ति का एक रूप है । बिन्दु भी शक्ति का
    एक रूप है । नाद-बिन्दु में क्रिया शक्ति है ।

१-२. गारलैण्ड ऑफ लेटर्स (आर्थर एवेलॉन)

१८८ वरिवस्यारहस्ये
नाद-बिन्दु—जगत् की सृष्टि ।१
नाद, बिन्दु और कला—'बिन्दु' शिवात्मक है और 'बीज' शक्त्यात्मक है
तथा 'नाद' दोनों (बिन्दु एवं बीज) के समवाय से उत्पन्न होने के कारण उभयात्मक
हैं। नादोत्पत्ति—बिन्दु + बीज—'नाद'
'सच्चिदानन्द विभवात् सकलात् परमेश्वरात्'—(१) आसीच्छक्तिः (२) ततो
नादो (३) नादाद् बिन्दुसमुद्भवः ।। सच्चिदानन्द सकल परमेश्वर—शक्ति—नाद—
बिन्दु ।।
'शक्ति' क्या है? परमेश्वर का 'स्पन्द' ही 'शक्ति' है । इसी 'बिन्दु' से (१)
बिन्दु (२) बीज (३) नाद उत्पन्न होते हैं । 'बिन्दु' का फटना—बिन्दु, बीज एवं
नाद ।। 'बिन्दु'—रौद्री । 'नाद'—ज्येष्ठा । 'बीज'—वामा ।। 'बिन्दु नाद कला ब्रह्मन्
विष्णु महेश देवताः ।।'' (योगशिखोपनिषद ६-७०) । विष्णु = 'बिन्दु' । ब्रह्मा =
'नाद' । रुद्र (ईश) = 'कला' ।।
'श्रीचक्र' = भगवती का स्थूल शरीर । पञ्चदशाक्षरी मन्त्र' = भगवती का
सूक्ष्मशरीर 'बीज' = शक्त्यात्मिका कला ।।
शिव (पर बिन्दु)—शक्ति—सदाख्यशिव (नाद)—ईश्वर (बिन्दु)—शुद्धविद्या
बिन्दु) ।।
┌ नाद-ज्येष्ठा ।। ब्रह्मा-इच्छा ।। ब्राह्मी-क्रिया ।। सूर्य-प्राण ।।
शुद्धविद्या ┤ बीज-वामा ।। विष्णु-क्रिया ।। वैष्णवी-ज्ञान ।। अग्नि-चिति ।।
└ बिन्दु-रौद्री ।। रुद्र-ज्ञान ।। गौरी-इच्छा ।। चन्द्र-मन ।।
बिन्दु—रौद्री । नाद—ज्येष्ठा । बीज—वामा । बिन्दु—ज्ञान । बीज—क्रिया ।
नाद—इच्छा ।। नाद = सूर्य । बीज = अग्नि ।। बिन्दु = चन्द्रमा ।। इच्छा, क्रिया
एवं ज्ञान = गौरी, ब्राह्मी वैष्णवी ।। बीज = शक्त्यात्मिका कला ।।
हल्लेखा के उच्चारण होने पर अनुनासिक ध्वनि उक्त ९ स्तरों से होती हुई
उन्मनी में समाप्त हो जाती है । नौ स्तर निम्न हैं—
शिव (पर बिन्दु)
↓
शक्ति
↓
सदाख्यशिव (नाद)
↓
―――――――――――――――――――――――――――――――――――――――――――――――――
१. गारलैण्ड ऑफ लेटर्स (राघव भट्ट : 'शारदातिलक')—नाद-बिन्दु शक्ति की वे
अवस्थाएँ हैं जो सृष्टि को जन्म देने के लिए उत्सुक रहती हैं । 'बिन्दु' एक घनावस्था
है । बिन्दु में शून्यता + गुण दोनों की प्रतिष्ठा है । (कालीचरण : ष.च.नि. की टीका)

प्रथमोऽंशः १८९
ईश्वर (बिन्दु)
↓
शुद्ध विद्या (बिन्दु)
┌─────────────────┬─────────────────┐
नाद-ज्येष्ठा बीज-वामा बिन्दु-रौद्री
↓ ↓ ↓
ब्रह्मा-इच्छा विष्णु-क्रिया रुद्र-ज्ञान
↓ ↓ ↓
ब्राह्मी-क्रिया वैष्णवी-ज्ञान गौरी-इच्छा
↓ ↓ ↓
सूर्य-प्राण अग्नि-चिति चन्द्र-मन
(१) ब्रह्म को बिन्दु, शक्ति को कला एवं जीव को नाद समझकर ५ प्रकार
का ऐक्य भी स्थापित किया जाता है।
(क) जीव—ब्रह्मैक्य भाव । (ख) ब्रह्म—सृष्टि-प्रभव ।
(ग) तृतीय—देहाध्यास । (घ) चतुर्थ—प्रलय ।
(ङ) पञ्चम—जीवोत्पत्ति ।
बिन्दु से नाद का सम्बंध न बताने का अभिप्राय यह है कि ब्रह्म कभी जीव
नहीं बनता, आत्मा सदा ब्रह्मस्वरूप है, जीवभाव एक मिथ्या प्रतीति मात्र है ।
(१) हृल्लेखा के उच्चारण होने पर जो अनुनासिक ध्वनि उक्त ९ स्तरों से
होती हुई उन्मनी में समाप्त हो जाती है । उसके उच्चारण काल की मात्रा उत्तरोत्तर
आधी होती जाती है ।
(२) सभी के योग का काल १/२ मात्रा होता है जो बिन्दु की आधी मात्रा
सहित पूरी एक मात्रा बनती है अर्थात्—
१/२ + १/४ + १/४ + १/१६ + १/३२ + १/६४ + १/१२८ + १/२५६ + १/२५६ = १ मात्रा
(३) पञ्चदशी के ३ अनुस्वार ३ बिन्दु हैं ।
(४) हृल्लेखा, नाद एवं १५ अक्षर १५ कलायें हैं ।
(५) नाद, बिन्दु, कला = ‘त्रिबिन्दु’
(६) श्रीचक्र त्रिधा विभक्त—नाद । बिन्दु । कला ।
(७) बिन्दु को शिवशक्ति भेद से दो प्रकार का माना जाय तो शक्त्यात्म
बिन्दु ही ‘बीजि’ है । दोनों से शब्दब्रह्म, नादोत्पत्ति एवं शब्द से कला (अर्थात्मक
सृष्टि) की उत्पत्ति होती है ॥ ४२ ॥

१९० वरिवस्यारहस्ये
‘प्राणविषुवाख्यः’—प्राणविषुव नामक ।। ‘प्राणविषुव’ क्या है?
प्राण, आत्मा एवं मन के पारस्परिक योग को ‘प्राणविषुव’ कहते हैं । ‘योगः
प्राणात्ममनसां विषुव प्राणसंज्ञितम् ।।१’
अमृतानन्दनाथ इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं—‘प्राणस्य हकारात्मनो
वाटवात्मनो यष्ठर्मनसश्च संयोगः प्राणविषुवमित्युच्यते ।।२ ‘शैवतन्त्र’ में कहा गया है—
‘शिष्यात्म प्राणमनसां संयोगं प्राणकं बिन्दुः ।।’ आचार्य भास्कर इसकी व्याख्या करते
हुए कहते हैं—‘वस्तुतस्तुमूलाधारे ब्रह्मेति प्रसिद्धस्य खस्य वायु कुण्डली
संयोगात्तद्व्युत्पत्तिः स एव खो नाभिपर्यन्तमागत्य पवनेन मनसा च युज्यते । स एव
हृदयमागतः पवनेन बुद्ध्या च संयुज्यते । अतः स एव स्थानत्रये परा-पश्यन्ती-
मध्यमेति नामत्रयं क्रमेण मजत इति सौभाग्यभास्करे कर्णितमस्माभिः । इदमेव प्राण-
विषुवपद वाच्यमिति स्थानत्रये मिलित्वैका भावनेति ज्ञेयम् ।।'
‘उन्मन्यां नीरूपं षष्ठं चिन्त्यं महाशून्यम्’३—उन्मनी षष्ठ शून्य है । यह
‘महाशून्य’ कही जाती है ।
स्वच्छन्दागम के मतानुसार शून्यों की स्थिति इस प्रकार है—(१) ‘ऊर्ध्व
शून्य’—शक्तिप्रद जहाँ नादान्त तक निःशेष पाश प्रशान्त हो गए हैं । (२) ‘अधः
शून्य’ = हृदयक्षेत्र; जहाँ अभी तक प्रपञ्चोल्लास नहीं हुआ है । (३) ‘मध्यशून्य’
= कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य, ललाट एवं ब्रह्मरंध्र ही शक्तिस्थान है । व्यापिनी चतुर्थ
शून्य है । तीन शून्य चल एवं हेय है । ‘समना’ में पञ्चम शून्य एवं ‘उन्मना’ में
षष्ठ शून्य है । ये भी चल एवं हेय हैं । उन्मना में भी यत्किंचित चलत्व है ।
परमशिवाधिष्ठित होने से सभी शून्य सिद्धिप्रद है । स्वच्छन्द शास्त्र के अनुसार ६
शून्यों का त्याग करके सातवें में प्रवेश आवश्यक है । वही वास्तविक परमपद है ।
६ शून्य अवस्थायें हैं—सातवाँ ही योगियों का लक्ष्य है—‘अशून्यं शून्यमित्युक्तं
शून्यं चाभाव उच्यते । अभावः स समुद्दिष्टः यत्र भावाः परं गताः ।।' यह सप्तम
शून्य ही अखण्ड महासत्ता महाशून्य है ।
मन्त्रविषुवमाह—
प्राथमिककूटनादे त्वनाहताद् ब्रह्मरन्ध्रान्ते ।
व्यष्टिसमष्टिविभेदाद् बीजचतुष्कस्य च स्वस्य ।। ४४ ।।
ऐक्येन नादमयताविभावनं मन्त्रविषुवाख्यम् ।
(‘मन्त्रविषुव’ का स्वरूप)
प्रथम कूट के नाद एवं व्यष्टि-समष्टि के भेद से अनाहत से आरंभ करके
ब्रह्मरंध्र तक उत्पन्न होने वाला नाद एवं चारों बीज तथा आत्मा के नादमय
विभावना की ‘मन्त्रविषुव’ संज्ञा है ।। ४४, ४४- ।।'
१. योगिनीहृदय (१८२) २. दीपिका
३. सेतुबन्ध (श्लो० १८५)

प्रथमोऽंशः १९१

  • प्रकाश *
    प्राथमिककूटनादे बीजचतुष्कस्यैक्यम्, स्वस्यात्मनस्वाधारोत्थितनादेन सहैक्यं न
    प्राथमिकेनानाहतादारब्धेन सह,
    'आधारोत्थितनादे तु लीनं बुद्ध्वात्मरूपकम् ।
    संयोगेन वियोगेन मन्त्राणां महेश्वरि ॥
    अनाहताद्याधारान्तं नादात्मत्वविचिन्तनम् ।
    विषुवम् .............................. ॥'
    इति कादिमतीयवचनात् । संयोगेन समष्ट्या । वियोगेन व्यष्ट्या । चतुर्विधानामिति
    शेषः । आधाराणामन्तो ब्रह्मरन्ध्रम् । आधारान्तान्तमिति तन्त्रेणान्तपदद्वयसत्त्वाद्-
    ब्रह्मरन्ध्रान्तमित्यर्थकत्वेन व्याचक्षते । आ आधारान्तादित्यर्थक आङ्प्रश्लेषे तु सर्वं
    सुस्थम् ॥ ४४, ४४- ॥
  • सरोजिनी *
    मन्त्र सङ्केत एवं मन्त्र के विविध अर्थ—'योगिनीहृदय' के 'मन्त्र-सङ्केत' नामक
    द्वितीय पटल में 'मन्त्रसङ्केत' के नाम से मन्त्रार्थों का निरूपण किया गया है।
    'मन्त्रसङ्केत' के ६ प्रकार हैं—
    (१) मन्त्रसङ्केतस्तस्य नानाकारो व्यवस्थितः ।
    (२) षड्विधस्तं तु देवेशि कथयामि तवानघे ।
    (३) (क) भावार्थ (ख) सम्प्रदायार्थ (ग) निगर्मार्थ (घ) कौलिकार्थ (ङ)
    सर्वरहस्यार्थ (च) महातत्त्वार्थ ॥ योगिनीहृदय (मन्त्रसङ्केत निरूपणम्)
    मन्त्रविषुव का तात्पर्य है अभिव्यज्यमान नाद को जापक की अपनी आत्मा
    मानकर भावना करना ॥
    'योगिनीहृदय दीपिकाकार' कहते हैं—मूलाधारस्थित वाग्भव शिखरवर्तिनं नादं
    हृदयपर्यन्तमुच्चार्य तत्र स्वयं लीनो भूत्वा स्वात्मनस्तन्मयतानुसंधानं मन्त्रविषुव-
    मित्यर्थः ॥'१ मूलाधारस्थित वाग्भवशिखरवर्ती नाद को हृदयपर्यन्त उच्चारित करके
    वहीं स्वयं लीन होकर अपनी आत्मा की उसके साथ की गई तन्मयता का
    अनुसन्धान करना 'मन्त्रविषुव' है ।२ 'शैवतन्त्र' में कहा भी गया है—
    आत्मना नादमध्ये तु लयं सञ्चार्य तत्त्वतः ।
    अकारोकार वर्णादिसंयोगेन वियोगतः ।
    हृदयादि बिलान्तं च विषुवमन्त्र संशकम् ॥३
    हृदय से ब्रह्मरंध्रपर्यन्त इसकी व्याप्ति है—‘‘हृदयाद ब्रह्मरंध्रान्तं विषुवमन्त्र
    संज्ञकम् ॥’’ भास्कराचार्य कहते हैं—'नादं वाग्भवान्त्यस्थानमारभ्य हृदयस्थं कामराज-
    १-२. अमृतानन्द योगी—'दीपिका' ३. शैवतन्त्र

१९२ वरिवस्यारहस्ये
कूटान्त्याक्षरपर्यन्त मुद्गतं विभाव्य तस्मिन् स्वजीवात्मनो लयं विचिन्त्य ततः कवलित
जीवात्मानं नादमूर्ध्वमुद्गमय्य ब्रह्मरन्ध्रान्तं प्राप्तं विचिन्तयेत् । तदिदं मन्त्र विषुव-
मुच्यते ॥'१
नाडीविषुवमाह—
आधारोत्थितनादस्योच्चाराद् ब्रह्मरन्ध्रान्तम् ॥ ४५ ॥
षट्चक्राणां ग्रन्थीन् द्वादश भिन्दन् सुषुम्णयैव पथा ।
नाडीनादार्णानां संयोगो नाडिकाविषुवम् ॥ ४६ ॥
(नाडिकाविषुव' का स्वस्वरूप)
मूलाधार चक्र से उठने वाले नाद के उच्चारण से ब्रह्मरंध्रपर्यन्त षट्चक्रों की
द्वादश ग्रन्थियों को सुषुम्णा के पथ से ही ग्रन्थि उद्भेदन करता हुआ नाड़ी नाद
एवं वर्णों के संयोग की 'नाड़िका विषुव' कहते हैं ॥ -४५, ४६ ॥

  • प्रकाश *
    मूलाधारादिचक्रषट्कस्याप्यध ऊर्ध्वं चैकैको ग्रन्थिरिति द्वादश ग्रन्थयः । तद्-
    भेदनमार्गेणैव सुषुम्णानाडी मूलाधाराद् ब्रह्मरन्ध्रं व्याप्नोति । तेनैव मार्गेण नादस्य
    वर्णपङ्क्तेश्च नाडीसंयुक्तत्वेन भावनयोच्चारणं नाडीविषुवमित्यर्थः ॥ -४५, ४६ ॥
  • सरोजिनी *
    'नाड़ीविषुव' किसे कहते हैं? 'मूलाधारोत्पन्न' नाद का सुषुम्णा नाड़ी में प्रवेश
    करके द्वादशग्रन्थियों का भेदन करते हुए मन्त्र के वर्णों के साथ संयोग होना ही
    'नाड़ी-विषुव' कहलाता है । मूलाधार से ब्रह्मरंध्र तक बीज शिखरवर्ती नाद के
    उच्चारित होने से नाड़ीविषुव स्पर्श उद्भूत होता है । 'योगिनीहृदय' में इसका
    स्वरूप इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है—'आधारोत्थित नादे तु लीनं
    बुद्ध्यात्मरूपकम् । संयोगेन वियोगेन मन्त्रार्णानां महेश्वरि ॥ १८३ ॥ अनहताद्या-
    धारान्त नादात्मत्वविचिनम् । नादसंस्पर्शना-तस्यनाड़ी विषुवमुच्यते । द्वादशग्रन्थिभेदने
    वर्णानमन्तरे प्रिये ॥२
    शैवतन्त्र में कहा गया है—'मूल मन्त्रत्रिशूलेन भित्वा ग्रन्थीननुक्रमात् ।
    नादनाड़ीसमायोगात्राड़ीविषुव भावनम् ॥ (१८३-८५) अमृतानन्दयोगी इसकी व्याख्या
    करते हुए कहते हैं—'वर्णादि बीजत्रयशिखरवर्तिनो नादस्य कामकलाक्षराद् द्वादशग्रन्थि
    भेदेन मूलादिषट्चक्र द्वादश ग्रन्थीन् भित्वा तेन नाड्यन्तरे सुषुम्ना मध्यमार्गे नाद
    संस्पर्शात् त्रिबीजशिखरवर्तिनो नादस्य मूलादि ब्रह्मरंध्रान्तमुच्चारतः 'संस्पर्शोन्नाडी-
    विषुवमुच्यते ॥'
    श्रीभास्कराचार्य कहते हैं कि इस प्रकार के नाद का द्वादशग्रन्थिभेदन पूर्वक जो
    १. सेतुबन्ध (श्लो० १८४) २. योगिनीहृदयदीपिका (श्लो० १८४)

:
In L30: "भ्रमट" or "भ्रमर"?
The sounds in Hatha Yoga Pradipika are:
"मर्दलशङ्खघण्टाकाहलसंभवाः"
"किङ्किणीवेणुवीणाक्वणद् भ्रमरनिःस्वनाः" (b भ्रमर / bhramara!)
Look at the character in the image:
भ्र म र!
Wait, look at the last letter of that word:
Is it ट or र?
It is र! Look at र in वीणा, भ्रमर के:
The bottom goes down straight with a slight curve, exactly like र in समान (no, in भेरी, मर्दल, शङ्ख, etc.).
Wait, compare it with ट in घण्टा:
In घण्टा, ट has a distinct round belly.
Here, in भ्रमर, it has the stroke of a र!
Wait, let's look at भ्रमर: yes, "भ्रमर" (bee/black bee, bhramara-nada)! That's the classic tenth/final nada: भ्रमर-गुंजन!
So it is definitely भ्रमर!

Let's check line 28:
ब्रह्मरंध्र or ब्रह्मरन्ध्र?
Look at ब्रह्मरंध्र: it

१९४ वरिवस्यारहस्ये
नाद तत्व → शिव (प्रकाश)
सामरस्य
प्रकाश + विमर्श
प्रकाशांश
अम्बिका वामा ज्येष्ठा रौद्री
विमर्शांश
शान्ता इच्छा ज्ञान क्रिया
प्रकाशांश : अम्बिका
विमर्शांश : शान्ता
↓
→ परावाक्
प्रकाशांश और विमर्शांश का सामरस्य ──> वाणी
प्रकाशांश : वामा
विमर्शांश : इच्छाशक्ति
→ पश्यन्तीवाक्
[परब्रह्म]
प्रकाशांश : ज्येष्ठा
विमर्शांश : ज्ञानशक्ति
→ मध्यमावाक्
[शब्दब्रह्म ॐ]
[परावाक्]
प्रकाशांश : रौद्री
विमर्शांश : क्रियाशक्ति
→ वैखरीवाक्
[पश्यन्ती]
[मध्यमा]
[वैखरी]
[↓ जगत्]
शिव
निःशब्द परब्रह्म
→ वैखरी
→ मध्यमा
→ पश्यन्ती
→ परा
→ शब्दब्रह्म
निःशब्द → परा → पश्यन्ती → मध्यमा → वैखरी
प्रकाशांश विमर्शांश
(१) अम्बिका और (१) शान्ता का सामरस्य → 'परावाक्'
(२) वामा और (२) इच्छाशक्ति का सामरस्य → 'पश्यन्तीवाक्'
(३) ज्येष्ठा और (३) ज्ञानशक्ति का सामरस्य → 'मध्यमावाक्'
(४) रौद्री और (४) क्रियाशक्ति का सामरस्य → 'वैखरीवाक्'

प्रथमोऽंशः १९५
षट्चक्रमूर्तिः
(THE NATURE OF THE SIX PLEXUS)
सहस्रदलपद्म शून्यचक्र
द्विदलपद्म आज्ञाख्यचक्र
षोडशदलपद्म विशुद्धाख्यचक्र
द्वादशदलपद्म अनाहतचक्र
दशदलपद्म मणिपूरकचक्र
षट्दलपद्म स्वाधिष्ठानचक्र
चतुर्दलपद्म आधारचक्र
कुण्डलिनी
१२ ग्रन्थियाँ : 'ग्रन्थीन् द्वादश' - माया, पाशव, ब्रह्म, विष्णु रुद्र, ईश्वर,
सदाशिव, इन्धिका, दीपिका, बैन्दव, नाद, शक्ति—(ये पाश भी हैं)—(नेत्रतन्त्र)
“मूलाधारादिचक्रषट्कस्याप्यध ऊर्ध्व चैकैको ग्रन्थिरिति द्वादश ग्रन्थयः ।
तद्भेदन्मार्गेणैव सुषुम्णानाड़ी मूलाधाराद् ब्रह्मरन्ध्र व्यापनोति । तेनैव मार्गेण
नादस्यवर्ण पंक्तेश्च नाडीसंयुक्तत्वेन भावनयोच्चारणं नाड़ी विषुवमित्यर्थः ।।”
(भास्कराचार्य—'प्रकाश') ।।
'ब्रह्मरंध्र'—सुषुम्ण के मध्य-वज्रा, वज्रा के मध्य चित्रिणी, चित्रिणी के मध्य
ब्रह्मनाड़ी, ब्रह्मनाड़ी का मुख द्वार 'ब्रह्मद्वार' । सहस्रार में ब्रह्मरंध्र है—महावायुं ततो
ध्यायेत ब्रह्मरंध्रन्ततः परम् ।।

१९६ वरिवस्यारहस्ये

  • पिण्डस्थ चक्र श्री चक्र एवं अधिष्ठात्री देवी *
    | चक्र | स्थान | दल | श्रीचक्र | अधिष्ठात्रीशक्ति |
    | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- |
    | अकुल (अरुण सहस्रदल कमल) | सुषम्नामूल | १००० दल | त्रैलोक्यमोहन चक्र | त्रिपुरा |
    | मूलाधार चक्र | वह्निआधार | चतुर्दल ४ दल | सर्वाशा परिपूरक चक्र | त्रिपुरेशी |
    | स्वाधिष्ठान चक्र | शक्ति | छ दल | सर्वसंक्षोभण चक्र | त्रिपुरसुन्दरी |
    | मणिपूरक चक्र | नाभि | १० दल | सर्वसौभाग्य दायक | त्रिपुर वासिनी |
    | अनाहत चक्र | हृदय | १२ दल | सर्वार्थसाधकचक्र | त्रिपुराश्री |
    | विशुद्ध चक्र | — | १६ दल | सर्वरसाकरचक्र | त्रिपुरमालिनी |
    | — | लम्बिकाग्र | ८ दल | सर्वरोगहरचक्र | त्रिपुरासिद्धि |
    | आज्ञा चक्र | भ्रूमध्य | २ दल | सर्वसिद्धिप्रदचक्र | त्रिपुराम्बिका |
    | (इन्दु में ललाट के बिन्दु में स्थित चक्र | — | — | सर्वानन्दमय चक्र | महात्रिपुरसुन्दरी |

“अकुलादिषु पूर्वोक्त स्थानेषु परिचिन्तयेत् । चक्रेश्वरी समायुक्तं नवचक्रं
पुरोदितम् ॥”¹
‘सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद’ के तृतीयखण्ड में (१) आधारचक्र (२) स्वाधिष्ठानचक्र
(३) नाभिचक्र (४) हृदयचक्र (५) कण्ठचक्र (६) तालुचक्र (७) भ्रूचक्र
(८) ब्रह्मरंध्रचक्र (९) आकाशचक्र—९ चक्र बताए गए हैं ।
आधार-स्वाधिष्ठान-मणिपूर-अनाहत-विशुद्धि-आज्ञाचक्र से ‘श्रीचक्र’ युक्त है—
‘आधार स्वाधिष्ठान मणिपूरानाहतविशुद्ध्याज्ञाचक्रात्मकं श्रीचक्रं त्रिखण्डं सोमसूर्य
नलात्मकम् ॥’ ‘श्रीचक्र’ त्रिखण्डात्मक है—(क) ‘सोमखण्ड’ (ख) ‘सूर्यखण्ड’
(ग) ‘अनलखण्ड’
(१) प्रथमखण्ड — मूलाधार-स्वाधिष्ठान : २ चक्र ।
(२) द्वितीयखण्ड — मणिपूर-अनाहत : २ चक्र ।
(३) तृतीयखण्ड — विशुद्धि-आज्ञा : २ चक्र ।


१. योगीअमृतानन्द—योगिनीहृदयदीपिका

प्रथमोऽंशः १९७
प्रथमखण्ड के ऊपर — अग्निस्थान : 'रुद्रग्रन्थि'
द्वितीयखण्ड के ऊपर — सूर्यस्थान : 'विष्णुग्रन्थि'
तृतीयखण्ड के ऊपर — चन्द्रस्थान : 'ब्रह्मग्रन्थि'
प्रथम खण्ड के ऊपर—वह्नि अपनी ज्वालाओं से प्रथम खण्ड को ढके
हुए हैं ।
द्वितीय खण्ड के ऊपर—स्थित सूर्य—अपनी किरणों से द्वितीय खण्ड को
ढके हुए है ।¹
तृतीय खण्ड के ऊपर—स्थित चन्द्रमा अपनी कलाओं से तृतीय खण्ड
को ढके हुए है ।
परा वाक् या शब्द ब्रह्म
(अव्यक्त नाद) की विभिन्न रूपा— म— अभिव्यक्ति
[घोष] [रव] [स्वन] [शब्द] [स्फोट] [ध्वनि] [झणर] [ध्वंकृति]
[चिणि नाद] [चिणि चिणि] [घण्टा नाद] [शंख नाद] [तन्त्री नाद] [ताल नाद] [वेणु नाद] [भेरी नाद] [मृदंग नाद]
स्वात्माराम मुनीन्द्र के मतानुसार नादों के अनेक स्तर हैं और उनमें
स्तरानुकूल सूक्ष्मता की कोटि बढ़ती जाती है । इसीलिए स्वात्माराम कहते हैं—'तत्र
सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं नादमेव परामृशेत् ।।' (हठयोग प्रदीपिका) ।।
प्राथमिक अवस्था में श्रूयमाण नाद—जलधि-जीमूत-भेरी-झर्झर । मध्यमावस्था में
श्रूयमाण नाद—मर्दल, शङ्ख, घण्टा काहल । अन्तिमावस्था में श्रूयमाण नाद—
किंकिणी, वंश, वीणा, भ्रमरनिःस्वनः
“आदौ जलधि भीमूत भेरी झर्झर संभवाः । मध्ये मर्दल शङ्खोत्था
घण्टाकाहलास्तथा । अन्ते तु किंकिणीवंशवीणा भ्रमरनिःस्वनाः । इति नानाविधा
नादाः श्रूयन्ते देहमध्यगाः ।।”
योग की आरंभावस्था—ब्रह्मग्रन्थि का भेदन—हृदयाकाशरूप शून्य में
'क्वणक' (आभूषणों की ध्वनि) की अनाहत ध्वनि ।।
योग की घटावस्था—विष्णु ग्रन्थि का भेदन—अतिशून्य रूप कण्ठाकाश में
विमर्द एवं भेरी की ध्वनि ।।
१. स्वच्छन्दतन्त्र

१९८ वरिवस्यारहस्ये
योग की निष्पत्ति अवस्था—वेणु के समान ध्वनि ।।१
“झिञ्झी नाद-वंशीनाद-मेघ, झर्झर, भ्रमरी, घण्टा, कांस्य नाद—तुरी, भेरी,
मृदङ्ग, आनक, दुंदुभी नाद’२
‘प्रथमं झिञ्झीनादं च वंशीनादं ततः परम् । मेघझर्झरभ्रमरीघंटाकांस्यं ततः परम् ।
तुरीभेरीमृदङ्गादिनिनादानकदुंदुभिः ।।” एवं नानाविधं नादं जायते नित्यमभ्यासात् ।।”
‘आधारोत्थित नादस्य’—मूलाधार चक्र से निःसृत नाद का ।। यहाँ ‘नाद’ का
क्या अर्थ है? भास्कराचार्य का कथन है कि ‘नाद’ ९ हैं और उनका स्वरूप
निम्नांकित है—

बिन्दुअर्द्धचन्द्ररोधिनीनादनादान्तशक्तिव्यापिकासमनाउन्मना

“बिन्द्वादीनां नवानां तु समष्टिर्नाद उच्यते”३
नादबिन्दु—तन्त्रशास्त्र में ‘नाद-बिन्दु’ शब्द अहं + इदं के अर्थों में भी गृहीत
है ।३ कुछ तन्त्रों में ‘नाद’—सृष्टि-विधायिनी विराट शक्ति कहा गया है ।४ कुछ
तांत्रिकों के अनुसार—सच्चिदानन्द विभव सकल परमेश्वर से ‘शक्ति’ एवं उससे
नाद—बिन्दु का आविर्भाव हुआ । कुछ तांत्रिकों (भेदवादी तांत्रिकों) के मतानुसार—
दो तत्त्व हैं (क) शिव (ख) शक्ति । ‘शिव’ विमर्श शक्ति में प्रवेश करता है और
बाद में बिन्दु का रूप धारण कर लेता है । बिन्दु का प्रथम विकास ही ‘नाद’
है ।५ कुछ भेदवादी तांत्रिक शिवशक्ति को समवाय रूप से परिव्याप्त एक तत्त्व
मान्ते हैं एवं बिन्दु को दूसरा तत्त्व मानते हैं ।६ बौद्ध तन्त्रों में = ‘बिन्दु’ =
अपरिवर्तनीय ज्ञान का प्रतीक है ।७ उनसे ‘बिन्दु’ = हठयौगिक ज्योति के अर्थ में
भी प्रयुक्त किया गया है ।८ शैवतन्त्रों में ‘नाद-बिन्दु’ = शिव-शक्ति के प्रतीक भी
माने गए हैं ।९ बौद्धतन्त्रों में नाद-बिन्दु = प्रज्ञा + उपाय के प्रतीक माने गए हैं ।


१. हठयोगप्रदीपिका (प्राण के ब्रहरन्ध्र में पहुँचने पर वेणु की ध्वनि श्रुतिगोचर
होती है ।)
२. घेरण्ड संहिता ३. सर्पेण्ट पावर—जान वुँडरफ
४. तन्त्राज़—देयर फिलासफी एण्ड आकल्ट सीक्रेट्स
५. कलेक्टेड वर्क्स आफ आर०जी०भण्डारकर
६. गोपीनाथ कविराज—‘तान्त्रिक दृष्टि’ : ‘साधनांक’
७-८. इन्ट्रोडक्शन टू तान्त्रिक बुद्धिज्म
९. प्रिंसिपल्स आफ तन्त्र—आर्थर ऍवेलान

प्रथमोऽंशः १९९
तन्त्रों एवं हठयौगिक ग्रन्थों में—'बिन्दु' शब्द के अर्थ में—रसना, सूर्य, रवि, प्राण,
शमन, काली, यमुना, रज, पुरुष, नाद, व्यञ्जन शब्दों का, 'नाद' शब्द के अर्थ
में—ललना, चन्द्रा, शशि, अपानु, धमन, अली, गङ्गा, शुक्रा, तमस्, अभाव,
प्रकृति, ग्राहक एवं स्वर शब्दों का प्रयोग मिलता है ।¹
'ध्यानबिन्दूपनिषद्' आदि में—'हठयोग प्रदीपिका' में नाद बिन्दु का प्रयोग—
'नाद' = परब्रह्म + अनाहत नाद ।। 'बिन्दु' = जीवात्मा + वीर्य ।।
(४।७२;४।१०५)
तन्त्र मन्त्र के अनुसार शिव-शक्ति का प्रथम विकास 'नाद' के रूप में मिलता
है ।² शिव-शक्ति का संयोग एवं उन दोनों का पारस्परिक संबंध नाद है ।³ 'नाद'
क्रिया रूप है । तात्विक क्षेत्र का सदाख्य तत्त्व ही मन्त्र क्षेत्र में—'नाद' है ।⁴
अतंरात्मा 'नाद' के रूप में प्रस्फुटित होती है वही जीवों में प्राणवायु से पैंरित
होकर अक्षरों का रूप धारण कर लेती है ।⁵
प्रशान्तविषुवमाह—
रेफे कामकलार्णे हार्दकलायां च बिन्दादौ ।
नादान्तावधि नादः सूक्ष्मतरो जायते तत्र ॥ ४७ ॥
शक्तेर्मध्ये तल्लयचिन्तनमुदितं प्रशान्तविषुवाख्यम् ।
(प्रशान्तविषुव' का स्वरूप)
रेफ में कामकला (ई) एवं बिन्द्वारब्ध तथा ह्रीं के नादान्त में समाप्त (अवयवों
में) एक सूक्ष्मतर 'नाद' उत्पन्न होता है । वहाँ इस सूक्ष्मनाद की शक्ति में लय होने
के चिन्तन का नाम 'प्रशान्तविषुव' है ।। ४७, ४७- ।।

  • प्रकाश *
    तृतीयकूटस्थरेफादिषु सप्तसु स्थानेष्वाधारादारभ्यस्य नादस्य तत्र सूक्ष्मतरता-
    दशा, अभिघातादुत्तरोत्तरक्षणेषु कांस्यतालध्वनिवत् । तस्य शक्तौ लयो भाव्य
    इत्यर्थः ॥ ४७, ४७- ॥
  • सरोजिनी *
    'प्रशान्त विषुव'—नादान्त पर्यन्त मन्त्रावयवों की शक्ति से लय भावना
    'प्रशान्तविषुव' है ।⁶

१. इन्ट्रोडक्शन टू तान्त्रिक बुद्धिज्म
२. तन्त्राज़—देयर फिलासफी एण्ड आकल्ट सीक्रेट्स
३. भास्कराचार्य—'वरिवस्यारहस्यम्'
४. गारलैण्ड्ज़ आफ लेटर्स—आर्थर एवेलॉन
५. प्रयोगसार ६. योगिनीहृदय