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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 298, कुल 530 में से

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१९६ वरिवस्यारहस्ये

  • पिण्डस्थ चक्र श्री चक्र एवं अधिष्ठात्री देवी *
    | चक्र | स्थान | दल | श्रीचक्र | अधिष्ठात्रीशक्ति |
    | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- |
    | अकुल (अरुण सहस्रदल कमल) | सुषम्नामूल | १००० दल | त्रैलोक्यमोहन चक्र | त्रिपुरा |
    | मूलाधार चक्र | वह्निआधार | चतुर्दल ४ दल | सर्वाशा परिपूरक चक्र | त्रिपुरेशी |
    | स्वाधिष्ठान चक्र | शक्ति | छ दल | सर्वसंक्षोभण चक्र | त्रिपुरसुन्दरी |
    | मणिपूरक चक्र | नाभि | १० दल | सर्वसौभाग्य दायक | त्रिपुर वासिनी |
    | अनाहत चक्र | हृदय | १२ दल | सर्वार्थसाधकचक्र | त्रिपुराश्री |
    | विशुद्ध चक्र | — | १६ दल | सर्वरसाकरचक्र | त्रिपुरमालिनी |
    | — | लम्बिकाग्र | ८ दल | सर्वरोगहरचक्र | त्रिपुरासिद्धि |
    | आज्ञा चक्र | भ्रूमध्य | २ दल | सर्वसिद्धिप्रदचक्र | त्रिपुराम्बिका |
    | (इन्दु में ललाट के बिन्दु में स्थित चक्र | — | — | सर्वानन्दमय चक्र | महात्रिपुरसुन्दरी |

“अकुलादिषु पूर्वोक्त स्थानेषु परिचिन्तयेत् । चक्रेश्वरी समायुक्तं नवचक्रं
पुरोदितम् ॥”¹
‘सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद’ के तृतीयखण्ड में (१) आधारचक्र (२) स्वाधिष्ठानचक्र
(३) नाभिचक्र (४) हृदयचक्र (५) कण्ठचक्र (६) तालुचक्र (७) भ्रूचक्र
(८) ब्रह्मरंध्रचक्र (९) आकाशचक्र—९ चक्र बताए गए हैं ।
आधार-स्वाधिष्ठान-मणिपूर-अनाहत-विशुद्धि-आज्ञाचक्र से ‘श्रीचक्र’ युक्त है—
‘आधार स्वाधिष्ठान मणिपूरानाहतविशुद्ध्याज्ञाचक्रात्मकं श्रीचक्रं त्रिखण्डं सोमसूर्य
नलात्मकम् ॥’ ‘श्रीचक्र’ त्रिखण्डात्मक है—(क) ‘सोमखण्ड’ (ख) ‘सूर्यखण्ड’
(ग) ‘अनलखण्ड’
(१) प्रथमखण्ड — मूलाधार-स्वाधिष्ठान : २ चक्र ।
(२) द्वितीयखण्ड — मणिपूर-अनाहत : २ चक्र ।
(३) तृतीयखण्ड — विशुद्धि-आज्ञा : २ चक्र ।


१. योगीअमृतानन्द—योगिनीहृदयदीपिका