वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९८ वरिवस्यारहस्ये
योग की निष्पत्ति अवस्था—वेणु के समान ध्वनि ।।१
“झिञ्झी नाद-वंशीनाद-मेघ, झर्झर, भ्रमरी, घण्टा, कांस्य नाद—तुरी, भेरी,
मृदङ्ग, आनक, दुंदुभी नाद’२
‘प्रथमं झिञ्झीनादं च वंशीनादं ततः परम् । मेघझर्झरभ्रमरीघंटाकांस्यं ततः परम् ।
तुरीभेरीमृदङ्गादिनिनादानकदुंदुभिः ।।” एवं नानाविधं नादं जायते नित्यमभ्यासात् ।।”
‘आधारोत्थित नादस्य’—मूलाधार चक्र से निःसृत नाद का ।। यहाँ ‘नाद’ का
क्या अर्थ है? भास्कराचार्य का कथन है कि ‘नाद’ ९ हैं और उनका स्वरूप
निम्नांकित है—
| बिन्दु | अर्द्धचन्द्र | रोधिनी | नाद | नादान्त | शक्ति | व्यापिका | समना | उन्मना |
|---|
“बिन्द्वादीनां नवानां तु समष्टिर्नाद उच्यते”३
नादबिन्दु—तन्त्रशास्त्र में ‘नाद-बिन्दु’ शब्द अहं + इदं के अर्थों में भी गृहीत
है ।३ कुछ तन्त्रों में ‘नाद’—सृष्टि-विधायिनी विराट शक्ति कहा गया है ।४ कुछ
तांत्रिकों के अनुसार—सच्चिदानन्द विभव सकल परमेश्वर से ‘शक्ति’ एवं उससे
नाद—बिन्दु का आविर्भाव हुआ । कुछ तांत्रिकों (भेदवादी तांत्रिकों) के मतानुसार—
दो तत्त्व हैं (क) शिव (ख) शक्ति । ‘शिव’ विमर्श शक्ति में प्रवेश करता है और
बाद में बिन्दु का रूप धारण कर लेता है । बिन्दु का प्रथम विकास ही ‘नाद’
है ।५ कुछ भेदवादी तांत्रिक शिवशक्ति को समवाय रूप से परिव्याप्त एक तत्त्व
मान्ते हैं एवं बिन्दु को दूसरा तत्त्व मानते हैं ।६ बौद्ध तन्त्रों में = ‘बिन्दु’ =
अपरिवर्तनीय ज्ञान का प्रतीक है ।७ उनसे ‘बिन्दु’ = हठयौगिक ज्योति के अर्थ में
भी प्रयुक्त किया गया है ।८ शैवतन्त्रों में ‘नाद-बिन्दु’ = शिव-शक्ति के प्रतीक भी
माने गए हैं ।९ बौद्धतन्त्रों में नाद-बिन्दु = प्रज्ञा + उपाय के प्रतीक माने गए हैं ।
१. हठयोगप्रदीपिका (प्राण के ब्रहरन्ध्र में पहुँचने पर वेणु की ध्वनि श्रुतिगोचर
होती है ।)
२. घेरण्ड संहिता ३. सर्पेण्ट पावर—जान वुँडरफ
४. तन्त्राज़—देयर फिलासफी एण्ड आकल्ट सीक्रेट्स
५. कलेक्टेड वर्क्स आफ आर०जी०भण्डारकर
६. गोपीनाथ कविराज—‘तान्त्रिक दृष्टि’ : ‘साधनांक’
७-८. इन्ट्रोडक्शन टू तान्त्रिक बुद्धिज्म
९. प्रिंसिपल्स आफ तन्त्र—आर्थर ऍवेलान