सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 297, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 297

प्रथमोऽंशः १९५
षट्चक्रमूर्तिः
(THE NATURE OF THE SIX PLEXUS)
सहस्रदलपद्म शून्यचक्र
द्विदलपद्म आज्ञाख्यचक्र
षोडशदलपद्म विशुद्धाख्यचक्र
द्वादशदलपद्म अनाहतचक्र
दशदलपद्म मणिपूरकचक्र
षट्दलपद्म स्वाधिष्ठानचक्र
चतुर्दलपद्म आधारचक्र
कुण्डलिनी
१२ ग्रन्थियाँ : 'ग्रन्थीन् द्वादश' - माया, पाशव, ब्रह्म, विष्णु रुद्र, ईश्वर,
सदाशिव, इन्धिका, दीपिका, बैन्दव, नाद, शक्ति—(ये पाश भी हैं)—(नेत्रतन्त्र)
“मूलाधारादिचक्रषट्कस्याप्यध ऊर्ध्व चैकैको ग्रन्थिरिति द्वादश ग्रन्थयः ।
तद्भेदन्मार्गेणैव सुषुम्णानाड़ी मूलाधाराद् ब्रह्मरन्ध्र व्यापनोति । तेनैव मार्गेण
नादस्यवर्ण पंक्तेश्च नाडीसंयुक्तत्वेन भावनयोच्चारणं नाड़ी विषुवमित्यर्थः ।।”
(भास्कराचार्य—'प्रकाश') ।।
'ब्रह्मरंध्र'—सुषुम्ण के मध्य-वज्रा, वज्रा के मध्य चित्रिणी, चित्रिणी के मध्य
ब्रह्मनाड़ी, ब्रह्मनाड़ी का मुख द्वार 'ब्रह्मद्वार' । सहस्रार में ब्रह्मरंध्र है—महावायुं ततो
ध्यायेत ब्रह्मरंध्रन्ततः परम् ।।