वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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कूटान्त्याक्षरपर्यन्त मुद्गतं विभाव्य तस्मिन् स्वजीवात्मनो लयं विचिन्त्य ततः कवलित
जीवात्मानं नादमूर्ध्वमुद्गमय्य ब्रह्मरन्ध्रान्तं प्राप्तं विचिन्तयेत् । तदिदं मन्त्र विषुव-
मुच्यते ॥'१
नाडीविषुवमाह—
आधारोत्थितनादस्योच्चाराद् ब्रह्मरन्ध्रान्तम् ॥ ४५ ॥
षट्चक्राणां ग्रन्थीन् द्वादश भिन्दन् सुषुम्णयैव पथा ।
नाडीनादार्णानां संयोगो नाडिकाविषुवम् ॥ ४६ ॥
(नाडिकाविषुव' का स्वस्वरूप)
मूलाधार चक्र से उठने वाले नाद के उच्चारण से ब्रह्मरंध्रपर्यन्त षट्चक्रों की
द्वादश ग्रन्थियों को सुषुम्णा के पथ से ही ग्रन्थि उद्भेदन करता हुआ नाड़ी नाद
एवं वर्णों के संयोग की 'नाड़िका विषुव' कहते हैं ॥ -४५, ४६ ॥
- प्रकाश *
मूलाधारादिचक्रषट्कस्याप्यध ऊर्ध्वं चैकैको ग्रन्थिरिति द्वादश ग्रन्थयः । तद्-
भेदनमार्गेणैव सुषुम्णानाडी मूलाधाराद् ब्रह्मरन्ध्रं व्याप्नोति । तेनैव मार्गेण नादस्य
वर्णपङ्क्तेश्च नाडीसंयुक्तत्वेन भावनयोच्चारणं नाडीविषुवमित्यर्थः ॥ -४५, ४६ ॥ - सरोजिनी *
'नाड़ीविषुव' किसे कहते हैं? 'मूलाधारोत्पन्न' नाद का सुषुम्णा नाड़ी में प्रवेश
करके द्वादशग्रन्थियों का भेदन करते हुए मन्त्र के वर्णों के साथ संयोग होना ही
'नाड़ी-विषुव' कहलाता है । मूलाधार से ब्रह्मरंध्र तक बीज शिखरवर्ती नाद के
उच्चारित होने से नाड़ीविषुव स्पर्श उद्भूत होता है । 'योगिनीहृदय' में इसका
स्वरूप इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है—'आधारोत्थित नादे तु लीनं
बुद्ध्यात्मरूपकम् । संयोगेन वियोगेन मन्त्रार्णानां महेश्वरि ॥ १८३ ॥ अनहताद्या-
धारान्त नादात्मत्वविचिनम् । नादसंस्पर्शना-तस्यनाड़ी विषुवमुच्यते । द्वादशग्रन्थिभेदने
वर्णानमन्तरे प्रिये ॥२
शैवतन्त्र में कहा गया है—'मूल मन्त्रत्रिशूलेन भित्वा ग्रन्थीननुक्रमात् ।
नादनाड़ीसमायोगात्राड़ीविषुव भावनम् ॥ (१८३-८५) अमृतानन्दयोगी इसकी व्याख्या
करते हुए कहते हैं—'वर्णादि बीजत्रयशिखरवर्तिनो नादस्य कामकलाक्षराद् द्वादशग्रन्थि
भेदेन मूलादिषट्चक्र द्वादश ग्रन्थीन् भित्वा तेन नाड्यन्तरे सुषुम्ना मध्यमार्गे नाद
संस्पर्शात् त्रिबीजशिखरवर्तिनो नादस्य मूलादि ब्रह्मरंध्रान्तमुच्चारतः 'संस्पर्शोन्नाडी-
विषुवमुच्यते ॥'
श्रीभास्कराचार्य कहते हैं कि इस प्रकार के नाद का द्वादशग्रन्थिभेदन पूर्वक जो
१. सेतुबन्ध (श्लो० १८४) २. योगिनीहृदयदीपिका (श्लो० १८४)