वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
१९४ वरिवस्यारहस्ये
नाद तत्व → शिव (प्रकाश)
सामरस्य
प्रकाश + विमर्श
प्रकाशांश
अम्बिका वामा ज्येष्ठा रौद्री
विमर्शांश
शान्ता इच्छा ज्ञान क्रिया
प्रकाशांश : अम्बिका
विमर्शांश : शान्ता
↓
→ परावाक्
प्रकाशांश और विमर्शांश का सामरस्य ──> वाणी
प्रकाशांश : वामा
विमर्शांश : इच्छाशक्ति
→ पश्यन्तीवाक्
[परब्रह्म]
प्रकाशांश : ज्येष्ठा
विमर्शांश : ज्ञानशक्ति
→ मध्यमावाक्
[शब्दब्रह्म ॐ]
[परावाक्]
प्रकाशांश : रौद्री
विमर्शांश : क्रियाशक्ति
→ वैखरीवाक्
[पश्यन्ती]
[मध्यमा]
[वैखरी]
[↓ जगत्]
शिव
निःशब्द परब्रह्म
→ वैखरी
→ मध्यमा
→ पश्यन्ती
→ परा
→ शब्दब्रह्म
निःशब्द → परा → पश्यन्ती → मध्यमा → वैखरी
प्रकाशांश विमर्शांश
(१) अम्बिका और (१) शान्ता का सामरस्य → 'परावाक्'
(२) वामा और (२) इच्छाशक्ति का सामरस्य → 'पश्यन्तीवाक्'
(३) ज्येष्ठा और (३) ज्ञानशक्ति का सामरस्य → 'मध्यमावाक्'
(४) रौद्री और (४) क्रियाशक्ति का सामरस्य → 'वैखरीवाक्'
प्रथमोऽंशः १९५
षट्चक्रमूर्तिः
(THE NATURE OF THE SIX PLEXUS)
सहस्रदलपद्म शून्यचक्र
द्विदलपद्म आज्ञाख्यचक्र
षोडशदलपद्म विशुद्धाख्यचक्र
द्वादशदलपद्म अनाहतचक्र
दशदलपद्म मणिपूरकचक्र
षट्दलपद्म स्वाधिष्ठानचक्र
चतुर्दलपद्म आधारचक्र
कुण्डलिनी
१२ ग्रन्थियाँ : 'ग्रन्थीन् द्वादश' - माया, पाशव, ब्रह्म, विष्णु रुद्र, ईश्वर,
सदाशिव, इन्धिका, दीपिका, बैन्दव, नाद, शक्ति—(ये पाश भी हैं)—(नेत्रतन्त्र)
“मूलाधारादिचक्रषट्कस्याप्यध ऊर्ध्व चैकैको ग्रन्थिरिति द्वादश ग्रन्थयः ।
तद्भेदन्मार्गेणैव सुषुम्णानाड़ी मूलाधाराद् ब्रह्मरन्ध्र व्यापनोति । तेनैव मार्गेण
नादस्यवर्ण पंक्तेश्च नाडीसंयुक्तत्वेन भावनयोच्चारणं नाड़ी विषुवमित्यर्थः ।।”
(भास्कराचार्य—'प्रकाश') ।।
'ब्रह्मरंध्र'—सुषुम्ण के मध्य-वज्रा, वज्रा के मध्य चित्रिणी, चित्रिणी के मध्य
ब्रह्मनाड़ी, ब्रह्मनाड़ी का मुख द्वार 'ब्रह्मद्वार' । सहस्रार में ब्रह्मरंध्र है—महावायुं ततो
ध्यायेत ब्रह्मरंध्रन्ततः परम् ।।
१९६ वरिवस्यारहस्ये
- पिण्डस्थ चक्र श्री चक्र एवं अधिष्ठात्री देवी *
| चक्र | स्थान | दल | श्रीचक्र | अधिष्ठात्रीशक्ति |
| :--- | :--- | :--- | :--- | :--- |
| अकुल (अरुण सहस्रदल कमल) | सुषम्नामूल | १००० दल | त्रैलोक्यमोहन चक्र | त्रिपुरा |
| मूलाधार चक्र | वह्निआधार | चतुर्दल ४ दल | सर्वाशा परिपूरक चक्र | त्रिपुरेशी |
| स्वाधिष्ठान चक्र | शक्ति | छ दल | सर्वसंक्षोभण चक्र | त्रिपुरसुन्दरी |
| मणिपूरक चक्र | नाभि | १० दल | सर्वसौभाग्य दायक | त्रिपुर वासिनी |
| अनाहत चक्र | हृदय | १२ दल | सर्वार्थसाधकचक्र | त्रिपुराश्री |
| विशुद्ध चक्र | — | १६ दल | सर्वरसाकरचक्र | त्रिपुरमालिनी |
| — | लम्बिकाग्र | ८ दल | सर्वरोगहरचक्र | त्रिपुरासिद्धि |
| आज्ञा चक्र | भ्रूमध्य | २ दल | सर्वसिद्धिप्रदचक्र | त्रिपुराम्बिका |
| (इन्दु में ललाट के बिन्दु में स्थित चक्र | — | — | सर्वानन्दमय चक्र | महात्रिपुरसुन्दरी |
“अकुलादिषु पूर्वोक्त स्थानेषु परिचिन्तयेत् । चक्रेश्वरी समायुक्तं नवचक्रं
पुरोदितम् ॥”¹
‘सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद’ के तृतीयखण्ड में (१) आधारचक्र (२) स्वाधिष्ठानचक्र
(३) नाभिचक्र (४) हृदयचक्र (५) कण्ठचक्र (६) तालुचक्र (७) भ्रूचक्र
(८) ब्रह्मरंध्रचक्र (९) आकाशचक्र—९ चक्र बताए गए हैं ।
आधार-स्वाधिष्ठान-मणिपूर-अनाहत-विशुद्धि-आज्ञाचक्र से ‘श्रीचक्र’ युक्त है—
‘आधार स्वाधिष्ठान मणिपूरानाहतविशुद्ध्याज्ञाचक्रात्मकं श्रीचक्रं त्रिखण्डं सोमसूर्य
नलात्मकम् ॥’ ‘श्रीचक्र’ त्रिखण्डात्मक है—(क) ‘सोमखण्ड’ (ख) ‘सूर्यखण्ड’
(ग) ‘अनलखण्ड’
(१) प्रथमखण्ड — मूलाधार-स्वाधिष्ठान : २ चक्र ।
(२) द्वितीयखण्ड — मणिपूर-अनाहत : २ चक्र ।
(३) तृतीयखण्ड — विशुद्धि-आज्ञा : २ चक्र ।
१. योगीअमृतानन्द—योगिनीहृदयदीपिका
प्रथमोऽंशः १९७
प्रथमखण्ड के ऊपर — अग्निस्थान : 'रुद्रग्रन्थि'
द्वितीयखण्ड के ऊपर — सूर्यस्थान : 'विष्णुग्रन्थि'
तृतीयखण्ड के ऊपर — चन्द्रस्थान : 'ब्रह्मग्रन्थि'
प्रथम खण्ड के ऊपर—वह्नि अपनी ज्वालाओं से प्रथम खण्ड को ढके
हुए हैं ।
द्वितीय खण्ड के ऊपर—स्थित सूर्य—अपनी किरणों से द्वितीय खण्ड को
ढके हुए है ।¹
तृतीय खण्ड के ऊपर—स्थित चन्द्रमा अपनी कलाओं से तृतीय खण्ड
को ढके हुए है ।
परा वाक् या शब्द ब्रह्म
(अव्यक्त नाद) की विभिन्न रूपा— म— अभिव्यक्ति
[घोष] [रव] [स्वन] [शब्द] [स्फोट] [ध्वनि] [झणर] [ध्वंकृति]
[चिणि नाद] [चिणि चिणि] [घण्टा नाद] [शंख नाद] [तन्त्री नाद] [ताल नाद] [वेणु नाद] [भेरी नाद] [मृदंग नाद]
स्वात्माराम मुनीन्द्र के मतानुसार नादों के अनेक स्तर हैं और उनमें
स्तरानुकूल सूक्ष्मता की कोटि बढ़ती जाती है । इसीलिए स्वात्माराम कहते हैं—'तत्र
सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं नादमेव परामृशेत् ।।' (हठयोग प्रदीपिका) ।।
प्राथमिक अवस्था में श्रूयमाण नाद—जलधि-जीमूत-भेरी-झर्झर । मध्यमावस्था में
श्रूयमाण नाद—मर्दल, शङ्ख, घण्टा काहल । अन्तिमावस्था में श्रूयमाण नाद—
किंकिणी, वंश, वीणा, भ्रमरनिःस्वनः
“आदौ जलधि भीमूत भेरी झर्झर संभवाः । मध्ये मर्दल शङ्खोत्था
घण्टाकाहलास्तथा । अन्ते तु किंकिणीवंशवीणा भ्रमरनिःस्वनाः । इति नानाविधा
नादाः श्रूयन्ते देहमध्यगाः ।।”
योग की आरंभावस्था—ब्रह्मग्रन्थि का भेदन—हृदयाकाशरूप शून्य में
'क्वणक' (आभूषणों की ध्वनि) की अनाहत ध्वनि ।।
योग की घटावस्था—विष्णु ग्रन्थि का भेदन—अतिशून्य रूप कण्ठाकाश में
विमर्द एवं भेरी की ध्वनि ।।
१. स्वच्छन्दतन्त्र
१९८ वरिवस्यारहस्ये
योग की निष्पत्ति अवस्था—वेणु के समान ध्वनि ।।१
“झिञ्झी नाद-वंशीनाद-मेघ, झर्झर, भ्रमरी, घण्टा, कांस्य नाद—तुरी, भेरी,
मृदङ्ग, आनक, दुंदुभी नाद’२
‘प्रथमं झिञ्झीनादं च वंशीनादं ततः परम् । मेघझर्झरभ्रमरीघंटाकांस्यं ततः परम् ।
तुरीभेरीमृदङ्गादिनिनादानकदुंदुभिः ।।” एवं नानाविधं नादं जायते नित्यमभ्यासात् ।।”
‘आधारोत्थित नादस्य’—मूलाधार चक्र से निःसृत नाद का ।। यहाँ ‘नाद’ का
क्या अर्थ है? भास्कराचार्य का कथन है कि ‘नाद’ ९ हैं और उनका स्वरूप
निम्नांकित है—
| बिन्दु | अर्द्धचन्द्र | रोधिनी | नाद | नादान्त | शक्ति | व्यापिका | समना | उन्मना |
|---|
“बिन्द्वादीनां नवानां तु समष्टिर्नाद उच्यते”३
नादबिन्दु—तन्त्रशास्त्र में ‘नाद-बिन्दु’ शब्द अहं + इदं के अर्थों में भी गृहीत
है ।३ कुछ तन्त्रों में ‘नाद’—सृष्टि-विधायिनी विराट शक्ति कहा गया है ।४ कुछ
तांत्रिकों के अनुसार—सच्चिदानन्द विभव सकल परमेश्वर से ‘शक्ति’ एवं उससे
नाद—बिन्दु का आविर्भाव हुआ । कुछ तांत्रिकों (भेदवादी तांत्रिकों) के मतानुसार—
दो तत्त्व हैं (क) शिव (ख) शक्ति । ‘शिव’ विमर्श शक्ति में प्रवेश करता है और
बाद में बिन्दु का रूप धारण कर लेता है । बिन्दु का प्रथम विकास ही ‘नाद’
है ।५ कुछ भेदवादी तांत्रिक शिवशक्ति को समवाय रूप से परिव्याप्त एक तत्त्व
मान्ते हैं एवं बिन्दु को दूसरा तत्त्व मानते हैं ।६ बौद्ध तन्त्रों में = ‘बिन्दु’ =
अपरिवर्तनीय ज्ञान का प्रतीक है ।७ उनसे ‘बिन्दु’ = हठयौगिक ज्योति के अर्थ में
भी प्रयुक्त किया गया है ।८ शैवतन्त्रों में ‘नाद-बिन्दु’ = शिव-शक्ति के प्रतीक भी
माने गए हैं ।९ बौद्धतन्त्रों में नाद-बिन्दु = प्रज्ञा + उपाय के प्रतीक माने गए हैं ।
१. हठयोगप्रदीपिका (प्राण के ब्रहरन्ध्र में पहुँचने पर वेणु की ध्वनि श्रुतिगोचर
होती है ।)
२. घेरण्ड संहिता ३. सर्पेण्ट पावर—जान वुँडरफ
४. तन्त्राज़—देयर फिलासफी एण्ड आकल्ट सीक्रेट्स
५. कलेक्टेड वर्क्स आफ आर०जी०भण्डारकर
६. गोपीनाथ कविराज—‘तान्त्रिक दृष्टि’ : ‘साधनांक’
७-८. इन्ट्रोडक्शन टू तान्त्रिक बुद्धिज्म
९. प्रिंसिपल्स आफ तन्त्र—आर्थर ऍवेलान
प्रथमोऽंशः १९९
तन्त्रों एवं हठयौगिक ग्रन्थों में—'बिन्दु' शब्द के अर्थ में—रसना, सूर्य, रवि, प्राण,
शमन, काली, यमुना, रज, पुरुष, नाद, व्यञ्जन शब्दों का, 'नाद' शब्द के अर्थ
में—ललना, चन्द्रा, शशि, अपानु, धमन, अली, गङ्गा, शुक्रा, तमस्, अभाव,
प्रकृति, ग्राहक एवं स्वर शब्दों का प्रयोग मिलता है ।¹
'ध्यानबिन्दूपनिषद्' आदि में—'हठयोग प्रदीपिका' में नाद बिन्दु का प्रयोग—
'नाद' = परब्रह्म + अनाहत नाद ।। 'बिन्दु' = जीवात्मा + वीर्य ।।
(४।७२;४।१०५)
तन्त्र मन्त्र के अनुसार शिव-शक्ति का प्रथम विकास 'नाद' के रूप में मिलता
है ।² शिव-शक्ति का संयोग एवं उन दोनों का पारस्परिक संबंध नाद है ।³ 'नाद'
क्रिया रूप है । तात्विक क्षेत्र का सदाख्य तत्त्व ही मन्त्र क्षेत्र में—'नाद' है ।⁴
अतंरात्मा 'नाद' के रूप में प्रस्फुटित होती है वही जीवों में प्राणवायु से पैंरित
होकर अक्षरों का रूप धारण कर लेती है ।⁵
प्रशान्तविषुवमाह—
रेफे कामकलार्णे हार्दकलायां च बिन्दादौ ।
नादान्तावधि नादः सूक्ष्मतरो जायते तत्र ॥ ४७ ॥
शक्तेर्मध्ये तल्लयचिन्तनमुदितं प्रशान्तविषुवाख्यम् ।
(प्रशान्तविषुव' का स्वरूप)
रेफ में कामकला (ई) एवं बिन्द्वारब्ध तथा ह्रीं के नादान्त में समाप्त (अवयवों
में) एक सूक्ष्मतर 'नाद' उत्पन्न होता है । वहाँ इस सूक्ष्मनाद की शक्ति में लय होने
के चिन्तन का नाम 'प्रशान्तविषुव' है ।। ४७, ४७- ।।
- प्रकाश *
तृतीयकूटस्थरेफादिषु सप्तसु स्थानेष्वाधारादारभ्यस्य नादस्य तत्र सूक्ष्मतरता-
दशा, अभिघातादुत्तरोत्तरक्षणेषु कांस्यतालध्वनिवत् । तस्य शक्तौ लयो भाव्य
इत्यर्थः ॥ ४७, ४७- ॥ - सरोजिनी *
'प्रशान्त विषुव'—नादान्त पर्यन्त मन्त्रावयवों की शक्ति से लय भावना
'प्रशान्तविषुव' है ।⁶
१. इन्ट्रोडक्शन टू तान्त्रिक बुद्धिज्म
२. तन्त्राज़—देयर फिलासफी एण्ड आकल्ट सीक्रेट्स
३. भास्कराचार्य—'वरिवस्यारहस्यम्'
४. गारलैण्ड्ज़ आफ लेटर्स—आर्थर एवेलॉन
५. प्रयोगसार ६. योगिनीहृदय
कारोकारवर्णौ च मकारो बिन्दुरेव च । ... प्रशान्तेन्द्रियगोचरम् ॥Wait, why does footnote 1 say JUST१. शैवतन्त्र? Wait! If line 11 says 'शैवतन्त्र' में भी..., why would there be a footnote saying १. शैवतन्त्र? Ah! Look at line 16-17: 'शक्ति' के मध्य सञ्चरित नाद 'समना' तक सञ्चार करता है—'शक्तिमध्यगतो नादः समनान्तं प्रसर्पति ।'Where does that quote come from? Wait! Where does the quote in line 16-17 come from? Wait, is there a footnote marker somewhere? Wait, look at line 10: Wait, could footnote 2 be for line 10? Wait, look at footnote 2:२. सेतुबन्ध (श्लो० १८५)In line 8:'योगिनीहृदय' में 'प्रशान्तविषुव' का स्वरूप इस प्रकार निरूपित किया गया है—Wait! Isनादयोगः प्रशान्तं तु...` from Yoginihridaya?
Wait, Yoginihridaya verse:
"नादयोगः प्रशान्तं तु प्रशान्तेन्द्रियगोचरम् ।
वह्निं मायां कलां चैव चेतनामर्धचन्द्रकम् ।
रोधिनीं ना
प्रथमोऽंशः २०१
विस्तार और व्यापकता की दृष्टि से शब्द-स्तर (नाद-स्तर)
सृष्ट्युन्मुखीशब्द
धारा—
जीव और मन का शब्द ———————
वैराट पुरुष का शब्द ——————
माया और ब्रह्म शब्द —————
ब्रह्म शब्द ————
पारब्रह्म का शब्द ———
सोहं पुरुष का शब्द ——
सत्त पुरुष का शब्द —
(केन्द्र से बाहर की ओर प्रवाहित)
अननुमेय, अत्यन्त गुप्तशब्द —
बन्धन क्रम
भीतर से बाहर की ओर प्रवाहित
→ → → → →
सूक्ष्मता और अन्तर्मुखता की दृष्टि से शब्द-स्तर (नाद-स्तर)
जीव और मन का शब्द ———————
वैराट पुरुष का शब्द ——————
माया और ब्रह्म शब्द —————
ब्रह्म शब्द ————
पारब्रह्म का शब्द ———
प्रलयोन्मुखीशब्द धारा—
सोहं पुरुष का शब्द ——
(केन्द्र की ओर प्रवाहित)
सत्त पुरुष का शब्द —
अननुमेय, अत्यन्त गुप्तशब्द —
मुक्ति-क्रम
बाहर से भीतर की ओर प्रवाहित
← ← ← ← ←
२०२ वरिवस्यारहस्ये
- प्रकाश *
शक्तिस्थानादूर्ध्वं पुनरुज्जीवितस्य नादस्य सूक्ष्मतमस्य व्यापिकामुलङ्घ्य
समनायां लयः शक्तिविषुवमित्यर्थः ॥ ४८ ॥ - सरोजिनी *
शक्तिविषुव काल विषुव—प्राण, आत्मा एवं मन के परस्पर योग की
'प्राणविषुव' एवं नाद को अपनी निजी आत्मा समझकर भावना करना 'मन्त्रविषुव'
कहलाता है । शक्तिमध्यगत नाद के समना पर्यन्त चिन्तन की 'शक्तिविषुव' कहते
हैं । शक्ति में नादान्त पर्यन्त मन्त्रावयवों की लय भावना 'प्रशान्तविषुव' है ।
कालातीत उन्मनापर्यन्त नाद के चिन्तन को 'कालविषुव' कहते हैं ।
'शैवतन्त्र' में 'शक्तिविषुव' एवं 'कालविषुव' की व्याख्या करते हुए कहा गया
है—'शक्तिमध्यगतो नादः समनान्तं प्रसर्पति । तच्छक्तिविषुवं प्रोक्तमुन्मन्यां काल-
संज्ञितम् ।।'१
आचार्य भास्कर 'शक्तिविषुव' एवं 'कालविषुव' को इस प्रकार परिभाषित करते
हैं—'अथ लीयमानस्य दीपादेः सूक्ष्मीभूय पुनः स्थूलीभावदर्शनान्तदनुसारेण शक्तौ
लीनस्य नादस्य पुनरुज्जीवनेन व्यापिकामुत्क्रम्य समनायां लय चिन्तनं शक्तिविषुवम् ।
ततः पुनरुज्जीव्योन्मन्यांलयः 'कालविषुवः' ।२
आचार्य अमृतानन्दनाथ 'शक्तिविषुव' एवं 'कालविषुव' को परिभाषित करते हुए
कहते हैं—तदूर्ध्वं शक्तेरूर्ध्वं समनान्तं नादस्य विचिन्तनं 'शक्तिविषुवं । तदूर्ध्वं
समनाया अप्यूर्ध्वम् । 'नात्र काल कलाभानम्' इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्या कालातीतो-
न्मनान्तं नादस्य विचिन्तनं कालविषुवं ।।३
'योगिनीहृदय' में 'शक्तिविषुव'—'कालविषुव' की इस प्रकार परिभाषा दी गई
है—
'विषुवशक्तिसंज्ञं तुदूर्ध्वं नाद चिन्तनम् ।
तदूर्ध्वं कालविषुवमुन्मनान्तं महेश्वरि ।।'४
शक्ति के मध्यगत नाद से समनापर्यन्त चिन्तन को 'शक्ति विषुव' कहते हैं ।
यहाँ तक काल की क्रीड़ा है क्योंकि समना तक ही काल की सीमा है उसके आगे
'उन्मना' में नहीं ।
कालविषुव के बाद 'तत्त्वविषुव' अङ्गीकृत होता है । नाद ही तत्त्व का
अभिव्यञ्जक है । लेकिन जब तक नाद का वास्तविक अन्त नहीं होता तब तक
तत्त्व बोध नहीं होता । नादान्त तो दूर की बात शक्ति में या समना में भी नाद
का अन्त नहीं होता । शाक्त योगी उन्मना को भी नाद का अन्त स्वीकार नहीं
१. शैवतन्त्र २. भास्कराचार्य—सेतुबन्ध श्लो० १८७
३. अमृतानन्दनाथ—'योगिनीहृदयदीपिका' ४. योगिनीहृदय
प्रथमोऽंशः २०३
करते। उन्मना के ऊपर—उन्मना को भेद करने के साथ-साथ नाद लीन होता है।
उस स्थिति में तत्त्वबोध या आत्मसाक्षात्कार स्वभावतः होता है। अतः 'तत्त्वविषुव'
को ही चैतन्य का अभिव्यक्ति स्थान कहना सङ्गत है। ६ शून्यों, ५ अवस्थाओं
एवं ६ विषुवों से परे है—विश्व की परम विश्रान्ति या परम शिव की अवस्था।
उन्मना तक सभी मन्त्रावयव १०८१७ बार उच्चरित होने से नाद का अन्त एवं
तत्त्वज्ञान का उदय होकर परमपद की प्राप्ति होती है।
समनोर्ध्वं पुनरुज्जीवितस्यात्यन्तं सूक्ष्मतमस्य नादस्योन्मन्यां लयः कालविषुव-
मित्याह—
समनागतमुन्मन्यामेते द्वे शक्तिकालविषुवाख्ये ।
श्रीविद्याकूटावयवेषु ककारादिषून्मनान्तेषु ॥ ४९ ॥
अकुलादिकोन्मनान्तप्रदेशसंस्थेषु सकलेषु ।
अध्युष्ठनिमेषोत्तरसप्तदशाधिकशतत्रयत्रुटिभिः ॥ ५० ॥
उच्चरिते नादे सति तस्यान्ते तत्त्ववेदनं भवति ।
तदिदं चैतन्याभिव्यक्तिनिदानं तु तत्त्वविषुवाख्यम् ॥ ५१ ॥
('तत्त्वविषुव' का स्वरूप)
समना एवं उन्मनी में लयीभूत नाद की इन दोनों अवस्थाओं की आख्या
क्रमशः 'शक्तिविषुव' एवं 'कालविषुव' है। ककार से लेकर उन्मना तक एवं अकुल
से लेकर उन्मना तक प्रदेशों में विद्यमान श्रीविद्याकूटों के भागों (अङ्गों) को व्याप्त
करके समस्त ३१७ त्रुटियों एवं साढ़े तीन निमेषों को व्याप्त करता हुआ नाद
तत्त्वज्ञान का कारण होता है। वह यह शुद्ध चैतन्य की अभिव्यक्ति का मूल हेतु
'तत्त्वविषुव' नाम वाला है ॥ ४९-५१ ॥
- प्रकाश *
उक्तेषु द्वात्रिंशत्पद्मेष्वधस्तनद्वयं चरमं चाकुलपद्मानि । शेषाणि कुलपद्मानि । तेषु
यद्यपि मूलाधाराख्यात् कुलपद्मादेव विद्याक्षराणारम्भः, तथापि चक्रराजस्य
सकलाख्यभावनाया अधस्तनसहस्रदलकमलमारभ्यैव 'अकुले विषुसंज्ञे च' इत्यादिना
चतुःशत्यामुक्तत्वात् कुलाकुलविद्ययोरभेदेन श्रीविद्याया अपि तत आरम्भोक्तिस्तन्त्रेषु ।
अध्युष्ठं सार्धत्रयम् । निमेषो लोचनस्पन्दकालः । तस्य त्रिसहस्रतमो ऽंशस्त्रुटिः,
'स्वस्थे नरे समासीने यावत् स्पन्दति लोचनम् ।
तस्य त्रिंशत्तमो भागस्तत्परः परिकीर्तितः ।
तत्परस्य शतांशस्तु त्रुटिरित्यभिधीयते ॥'
इति वचनात् । एवं च (१०८१७) अयुतोत्तराष्टशतोत्तरसप्तदशत्रुटिपर्यन्तं
विद्यावयवस्थानसंलग्नतापूर्वकं नादोच्चारणे कृते सति, तत्त्वस्य स्वसंविदभेदस्य बोधो
भवति । तदिदमुच्चारणं तत्त्वविषुवम् ॥ - ४९-५१ ॥
२०४ वरिवस्यारहस्ये
- सरोजिनी *
'योगिनीहृदय' में 'तत्त्वविषुव' इस प्रकार व्याख्या है—'मुनिचन्द्राष्टदशभि-
स्त्रुटिभिर्नादवेदनम् । चैतन्यव्यक्तिहेतुश्च विषुवं तत्त्वसंज्ञितम् ॥ १८८ ॥ परं स्थानं
महादेवि निसर्गानन्दसुन्दरम् ॥'१
आचार्य अमृतानन्द 'तत्त्वविषुव' की व्याख्या करते हुए कहते हैं—अनन्तरोक्त-
रीत्या चैतन्यस्य स्वात्मतत्त्वस्य व्यक्तेः प्रकाशस्य हेतुस्तत्त्वविषुवम् ।२ कोऽर्थः ।
उन्मनोध्र्वेऽनन्तरोक्तसंख्यावत्त्रुटिभिर्नादलयात् स्वात्मानुसन्धानं तत्त्वविषुवम् ॥३
'शैवतन्त्र' में कहा गया है—'स्वाधिकारे परे धाम्निविषुवं तत्त्वसंज्ञकम् ॥'४
आचार्य भास्कर की व्याख्यानुसार 'तत्त्वविषुव' का स्वरूप इस प्रकार है—
'अथायमेव नादो यद्यविच्छिन्नतया सार्धनिमेषत्रयोत्तरं सप्तदशाधिक शत त्रय त्रुटि
परि
प्रथमोऽंशः २०५
- प्रकाश *
अवस्थादिचतुष्टये संख्याचतुष्टयस्य क्रमादन्वयः । नादत्रयस्य चक्रत्रयात्मकत्व-
भावनं प्रागुक्तम् । चक्रसङ्केते त्वन्यदपि त्रयमुक्तम्—चक्रभावनं त्रिविधं सकलं निष्कलं
सकलनिष्कलं चेति । अकुलसहस्रारं मूलाधारादिपञ्चकं सूक्ष्मजिह्वा भ्रूमध्यं बिन्दुस्थानं
चेति नवसु स्थानेषु त्रैलोक्यमोहनादिचक्रनवकभावनं सकलम्, बिन्दाद्युन्मन्यन्तं
तद्भावनं द्वितीयम्, महाबिन्दावेव तद्भावनं तृतीयमिति । मनोर्मन्त्रस्यार्थानिनुसंदधानस्य
विद्याया अर्णनामक्षराणामष्टपञ्चाशतो मध्य आद्यकूटद्वितयबिन्दादिनवकद्वयप्रहाणेना-
वशिष्टानां चत्वारिंशतोऽक्षराणामुच्चारणं जपो जपपदवाच्यमित्यर्थः ॥ ५२ ॥ - सरोजिनी *
‘अवस्था’—अवस्थायें पाँच हैं—(१) जाग्रत (२) स्वप्न (३) सुषुप्ति (४)
तुरीय, (५) तुरीयातीत । ‘शून्य’—प्रणव रूप मन्त्र के बारह अङ्गों में प्रति द्वितीय
अङ्ग शून्य कहलाता है । ‘विषुवन्ति’—सात विषुव हैं । यथा—‘प्राणविषुव’,
‘मन्त्रविषुव’, ‘नाड़ीविषुव’, ‘प्रशान्तविषुव’, ‘शक्तिविषुव’, ‘कालविषुव’ एवं ‘तत्त्व-
विषुव’ । ‘चक्र’ नौ हैं—(१) त्रैलोक्यमोहन (२) सर्वाशापरिपूरण (३) सर्वसंक्षोभण
(४) सौभाग्यदायक (५) सर्वार्थसाधक (६) सर्वरक्षाकर (७) सर्वरोगहर (८)
सर्वसिद्धिप्रद (९) सर्वानन्दमय चक्र ॥
‘चक्राणि’ = १. ‘सकल’ २. ‘निष्कलं’ ३. ‘सकलनिष्कलं’ ॥ अकुल
सहस्रार, मूलाधारादिपञ्चक, सूक्ष्मजिह्वा, भ्रूमध्य बिन्दु स्थान—नौ स्थानों में—
त्रैलोक्यमोहनादि चक्र नवक भावन तो ‘सकल’ हैं । बिन्दादि उन्मन्यन्त चक्रों में
उनका भावन ‘निष्कलं’ है । महाबिन्दु में उनका भावन ‘सकलनिष्कलं’ है ।
मन्त्रार्थानुसंधानपूर्वक ‘वर्णों’ (अक्षरों), का उच्चारण ‘जप’ कहलाता है किन्तु उसके
साथ अवस्था, शून्य, विषुव एवं चक्रों का भी ध्यान रखना, आवश्यक होता है ।
‘अर्थाश्च’—मन्त्रार्थ के प्रकार पन्द्रह हैं—(१) प्रतिपाद्यार्थ (२) भावार्थ (३)
संप्रदायार्थ (४) निगर्भार्थ (५) कौलिकार्थ (६) रहस्यार्थ (७) महातत्वार्थ (८)
नामार्थ (९) शब्दरूपार्थ (१०) नामैकदेशार्थ (११) शाक्तार्थ (१२) सामरस्यार्थ
(१३) समस्तार्थ (१४) सगुणार्थ (१५) महावाक्यार्थ ॥
‘जप’—‘योगिनीहृदय’ में भी जप-विधान है—‘पुष्पाञ्जलिं ततः कृत्वा जपं
कुर्यात् समाहितः ॥’१ इस ‘जप’ का लक्षण क्या है? ‘समाहितो नियतेन्द्रियों
नादरूपमन्त्रोच्चारणलक्षणं जपं कुर्यात् ॥’ ‘मन्त्र’ नादरूपात्मक है । अतः
नादोत्थानपूर्वक मन्त्राक्षरों का उच्चारण ही ‘जप’ है ।२
‘योगिनीहृदय’ में जप-विधान में भी शून्यषट्क, अवस्थापञ्चक एवं विषुव
सप्तक के योग को महत्व दिया गया है—
१. योगिनीहृदय २. अमृतानन्द—‘दीपिका’
२०६
भास्कराचार्य के अनुसार मन्त्र-जप का स्वरूप
परब्रह्म
शब्दातीत स्तर
'शब्द ब्रह्मणि निष्णातः परब्रह्माधिगच्छति'
← ध्वन्यात्मक नाम (मन्त्र)
ध्वन्यात्मक मन्त्र (नाद)
परावाक् (शब्द ब्रह्म) चेतन शब्द
पश्यन्ती वाक्
मध्यमा वाक्
मन्त्र के अङ्ग = 'नाद' (९ नादों की समष्टि = 'नाद'):
उन्मना
↑
समना
↑
व्यापिका
↑
शक्ति
↑
नादान्त
↑
नाद
↑
निरोधिका
↑
अर्धचन्द्र
↑
बिन्दु
पिण्डस्थ चक्र:
आज्ञाचक्र
↑
विशुद्धाख्यचक्र
↑
अनाहतचक्र
↑
मणिपूरचक्र
↑
स्वाधिष्ठानचक्र
↑
मूलाधारचक्र
मन का यन्त्र के साथ ऐक्य
मन का मन्त्र के साथ ऐक्य
मन का आत्मा के साथ ऐक्य
मन का गुरु के साथ ऐक्य
मन का देवता के साथ ऐक्य
मन का देवी के साथ ऐक्य
मन का मन्त्रार्थ के साथ ऐक्य
मन का नाद के साथ ऐक्य
मन का शून्य के साथ ऐक्य
मन का अवस्थाओं के साथ ऐक्य
मन का विषुवों के साथ ऐक्य
मन का चक्र के साथ ऐक्य
मन का प्राण के साथ ऐक्य
वर्णात्मक मन्त्र
बैखरीगत मन्त्र
(जड़ शब्द)
जप के विभिन्न स्तर:
निस्पन्द निःशब्द (परब्रह्म)
सस्पन्द | शब्दब्रह्म | सशब्द
↑
परावाक्
↑
पश्यन्ती
↑
मध्यमा
↑
वैखरी
↑
↑
↑
वैखरी विश्व विग्रहा → विश्व
ऊर्ध्वारोहण का स्तर
जप के विभिन्न स्तर →
अजपा जप
मानस जप
उपांशु जप
वैखरी जप
मन्त्र
↑
नाद
↑
वर्णोच्चारण
प्रथमोऽंशः २०७
‘शून्यषट्कं तथा देवि! ह्यवस्थापञ्चकं पुनः ॥ १०६ ॥
विषुवं सप्तरूपं च भावयन् मनसा जपेत् ॥¹
जप के अङ्ग
५ अवस्थाएँ ६ शून्य ७ विषुव ९ चक्र १५ मन्त्रार्थ वर्णोच्चारण
आदि विद्या के
आन्तरिक अङ्ग
विद्या के वर्णों की संख्या | उद्धार | काल (मात्रा) | उच्चारण | स्थान | प्रयत्न | रूप | विभिन्न आकार स्थितियाँ आदि
आदि विद्या के
बाह्य अङ्ग
ऋषि छन्द देवता विनियोग बीज शक्ति कीलक न्यास ध्यान नियम पूजा
‘मन्त्र’ = वाचक । देवता = (वाच्य) ॥
‘सर्वेश्वरी सर्वमयी सर्वमन्त्रस्वरूपिणी’ (‘ललिता सहस्रनाम’) ‘परावाक्’
चैतन्यरूपा है—पराप्रत्यकचितिरूपा । पश्यन्ती परदेवता । मध्यमा वैखरी रूपा
भक्तमानस हंसिका ॥ (ल०स०) ‘मन्त्र’ अपने मूल स्वरूप में परावाक् के रूप में
रूपान्तरित हो जाते हैं इसीलिए मन्त्रों को चैतन्य की किरणें कहा गया है—
‘‘मन्त्राश्चिन्मरीचयः ॥’’ जहाँ चैतन्यत्व नहीं वहाँ मन्त्रत्व नहीं ।
१. ‘विज्ञान भैरव’ में जप की दृष्टि—‘विज्ञानभैरव’ में मन्त्राक्षरों के उच्चारण
की अखण्ड आवृत्ति को ही ‘जप’ का पर्याय स्वीकार न करके जप के वैज्ञानिक
स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए कहा गया है—
भूयोभूयः परे भावे भावना भाव्यते हि या ।
जपः सोऽत्र स्वयं नादो मन्त्रात्मा जप्य ईदृशः ॥ १४२ ॥²
१. योगिनीहृदय २. विज्ञान भैरव (शिव)
२०८ वरिवस्यारहस्ये
इस दृष्टि के अनुसार—'मैं ही ब्रह्म हूँ' मैं ही शिव हूँ, इस अनाहत नादरूपी
शब्द (सोऽहं, हंसः) की निरन्तर भावना ही 'जप' है ।
'स्वच्छन्दतन्त्र'१ में कहा भी गया है कि 'मैं इस जगत् का परम कारण परम
हंस, प्राणमय शिव हूँ'—इस प्रकार से अहर्निश स्वभावतः प्रवर्तमान अपने प्राणमय
अजपास्वरूप का विमर्श ही जप है । इसीलिए स्वच्छन्दतन्त्र में कहा गया है—
अहमेव परो हंसः शिवः परमकारणम् (४।३९९) । जपनीय मन्त्र भी स्वयं नादात्मक
ब्रह्म ही है । इसमें अपने अकृत्रिम अहमात्मक स्वरूप का निरन्तर परामर्श होता
रहता है—'स्वयं नादो मंत्रात्मा अकृत्रिमाहंविमर्शात्मा ।'
'श्रीकण्ठीसंहिता' में कहा गया है कि—'पृथङ्मन्त्रः पृथङ्मन्त्री न सिध्यति
कदाचने' अर्थात् मन्त्र और मन्त्री (मन्त्र और मन्त्रजापक) तथा मन्त्र की अधिष्ठात्री
देवता—ये कभी पृथक् नहीं होते अतः इनको पृथक् मानकर जप करने से कभी
सिद्धि प्राप्त नहीं होती ।। जप का विषय नादात्मक मन्त्र ही है । इसमें साधक को
परम तत्त्व के साथ अपनी प्रत्यभिज्ञा की स्पष्ट प्रतीति होने लगती है ।
२. 'योगिनीहृदय दीपिका' में जप की दृष्टि२—इस ग्रन्थ के अनुसार इन्द्रियों
की बहिर्मुख प्रवृत्ति को रोककर आन्तर अनाहत नाद की निरन्तर भावना करना ही
जप' है —
“संयमेन्द्रिय सञ्चारं - प्रोच्चरेन्नादमान्तरम् ।
एष एव जपः प्रोक्ता न तु बाह्य जपो जपः ॥”
ग्रन्थकार ने बाह्य जप को जप स्वीकार ही नहीं किया—'न तु बाह्य जपो
जपः । विकल्पात्मक विविध वर्णों के संघात से विनिर्मित मन्त्रों का बाह्योच्चारण
जप नहीं है ।
३. 'तन्त्रालोक' में जप की दृष्टि३—इस ग्रन्थ में कहा गया है कि 'तत्स्वरूपं
जपः प्रोक्तो भावाभावपदच्युतः ॥' अर्थात् 'उस परम कारण शिव का आत्मस्वरूप
ही जप है । भावाभाव (प्राणापान आदि गत्यात्मक) पद की सीमा को अतिक्रान्त
कर जाने की दशा (जहाँ चिदैक्य परामर्श हो) ही जप है—'“तस्य शिवस्य स्वरूपं
परावाक्स्वभावम् आत्मरूपम् अर्थात् भूयो भूयः परादृश्यमानं जपः अतएव
भावाभावपदच्युतः ॥ तन्मध्यस्फुरत्संवित्परामर्शमात्रसार इत्यर्थः ॥'४ शिव का
स्वात्मरूप परावाक् है । परावाक् का शाश्वत परामर्श ही जप है । इस परामर्श दशा
में भावाभावात्मक पद में स्थिति नहीं रहती प्रत्युत् मध्यावस्थान की दशा प्राप्त हो
जाती है । भाव एवं भावाभाव दोनों की स्थितियाँ सङ्कोचात्मक होती है अतः साधक
'इसका त्रोटन करता है और मध्य में विराजमान होता है । वहीं पर संवित् का
अमृत परामर्श होता है । यही अमृतात्मक परामर्श ही 'जप' है ।
१. स्वच्छन्दतन्त्र (४।३९९) २. योगिनीहृदय दीपिका (पृ० १९५)
३. तन्त्रालोक (१।९०) ४. जयरथ-'विवेक' (तन्त्रालोक टीका)
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Line 9: अनाहतनादमय -> ना
Line 10: दशाओं
Line 11: संविद् / संवित्
Line 12: विमर्शिनी -> र्शिनी
Line 13: अभिनवगुप्तपादाचार्य
Line 18: पहचान -> न
Line 22: परमकारणम् -> रणम् -> look at ण in परमकारणम्:
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२१० वरिवस्यारहस्ये
अहोरात्र में २१ हजार छः सौ बार श्वास-प्रश्वास के माध्यम से जो श्वसन-क्रिया
सम्पादित करता है उसमें अपानवायु के साथ 'सकार' बाहर फेंकता है एवं 'हङ्कार'
के साथ प्राणवायु ग्रहण करता हुआ अहोरात्र 'हंसः' मन्त्र का जप किया करता
है—इस "हंसः हंसः हंसः हंसः" के स्वरूप वाले इस स्वाभाविक श्वासप्रश्वासात्मक
मन्त्र की आवृत्ति का नाम ही 'जप' है—यही मन्त्र उलट कर जपने से 'सोऽहं' बन
जाता है—
सकारेण बहिर्याति हकारेण विशेत्पुनः ।
हंस हंसेत्यतो मन्त्रं जपो जपति नित्यशः ॥
षट् शतानि दिवारात्रौ सहस्राण्येकविंशतिः ।
जपो देव्या विनिर्दिष्टः सुलभो दुर्लभो जडैः ॥
यह जप स्वयमेव उच्चरित है—इसका कोई जापक नहीं है और न तो इस
जप का कोई प्रतिहन्ता ही है—
'नास्योच्चारयिता कश्चित्प्रतिहन्ता न विद्यते ।
स्वयमुच्चरते देवि प्राणिनामुरसि स्थितः ।।'
विश्वपूरण परभाव स्वस्वभाव में जो भावना (विमर्शना) भावित (संपादित) होती
है वही 'जप' है । यह जप अकृताहंविमर्शात्मा नाद है और इसका जप्य है
स्वात्मदेवता ।।
८. 'शिवसूत्रवार्तिक' में जप की दृष्टि—वार्तिककार वरदराज का कथन है
कि 'जनिपालनधर्मत्व के कारण' जिसे 'जप' कहा जाता है वह अकृत्रिम अहं के
आमर्श से परिप्लावित, स्वात्मावमर्शी, याथार्थ्यवादी, स्वात्मपरामर्श संपदा से युक्त
योगियों की 'स्वैरअभिलापात्मा कथा' है । वही योगीन्द्रविषया कथा 'जप' है—
अकृत्रिमाहमामर्शमयस्वात्मावमर्शिनः ।। १११ ।।
'या या स्वैराभिलापात्मा कथा याथार्थ्यवादिनः ।
भूयो भूयः परे भावे भावना भाव्यते हि या ।। ११२ ।।
जपः सोऽत्र स्वयं नादो मन्त्रात्मा जप्य ईदृशः ।। ११३ ।।
जनिपालनधर्मत्वाज्जप इत्यभिधीयते ।
अथेदृग्विधयोगीन्द्र विषयापि च या कथा ।। ११५ ।।
जपः सोऽपि जनस्योक्तो जनिपालन योगतः ।।"
'जयसंहिता' में कहा गया है कि "एक ही मन्त्रनाथ अन्तर और बाह्य दोनों
में उदित होकर एक हो जाता है तब उस 'जप' को लक्ष संख्या से भी अधिक
समझना चाहिए ।।" अर्थात् 'जप' मन्त्रनाथ के अन्तर एवं बाह्य में उदित होकर
एक हो जाने की प्रक्रिया की संज्ञा है ।
'तत्त्वरक्षाविधान' में कहा गया है कि "आत्मसंवित् या परमपद में मन्त्र का '
प्रथमोंऽशः २११
प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि वह शक्ति एवं क्रियारहित है । शक्ति के विषय में
ही मन्त्र का प्रयोग (मन्त्र जप) करना चाहिए वही मन्त्र सफल होता है ॥"
'श्रीवैहायसी' में कहा गया है कि—सन्धिस्थल में नादोर्ध्वध्वनि से बोधित
'जप' करना चाहिए । सूत्र में ग्रथित मणि के समान शक्ति के ताने बाने से
निर्मित मन्त्राक्षरों का ध्यान करते हुए जप करना चाहिए । वह शक्ति परम व्योम
में रहती है और परमामृत से समृद्ध है । उक्त रीति से 'जप' करने पर ही मन्त्र
अपने स्वरूप को प्रकट करता है अन्यथा अपने को गुप्त रखता है ।
'ध्यानं जपेन' (शाक्तदर्शन) कहकर आचार्य हयग्रीव ने कहा है कि जप का
ध्यान से एवं ध्यान का जप से सम्बंध है । आचार्य अगस्त्य ने जप का बंध-क्षय
से सम्बंध स्थापित करते हुए कहा है—'जपाद्बन्धो नश्यति ॥"
९. 'हंस पारमेश्वर' में जप की दृष्टि—'जप' वर्णों के उच्चारण की प्रक्रिया
नहीं है प्रत्युत् सुषुम्णा मार्ग में नादोच्चारण है । इसीलिए कहा गया है कि वर्णरूप
मन्त्र 'पशुभाव' में स्थित हैं और जब वे सुषुम्णामार्ग से उच्चरित होने लगते हैं तो
'पशुपति' बन जाते हैं"—
'पशुभावेस्थिता मन्त्राः केवला वर्णरूपिणः ।
सौषुम्णेऽध्वन्युच्चरिताः पतित्वं प्राप्नुवन्ति ते ॥
९. 'त्रिकसार' में जप की दृष्टि—'त्रिकसार' में कहा गया है कि चिच्छक्ति
के बल का स्पर्श न होने के कारण मन्त्रों के वर्ण जड़ अक्षर ही रहते हैं—
'चिच्छक्तिबला स्पर्शात् केवलं वर्णरूप मात्रा रूपत्वान्मन्त्रपुत्रिकाकरण निष्फल चेष्टा
भवन्ति ॥'१
वर्णातीत परतत्त्व के विदित हो जाने पर मन्त्राधिप भी मन्त्र के साथ मांत्रिक
के किङ्कर हो जाते हैं
विदिते तु परे तत्त्वे वर्णातीते ह्यविग्रहे ।
किङ्करत्वं तु गच्छन्ति मन्त्रा मन्त्राधिपैः सह ॥२
तात्पर्य यह है कि चूँकि 'मन्त्र' चित्तत्त्व की रश्मियाँ हैं—
“मन्त्राश्चिन्मरीचयः”—अतः 'जप' जापक द्वारा चैतन्य तत्त्व के साथ तादात्म्यप्राप्ति
की एक प्रक्रिया है न कि जड़ अक्षरों की पुनरावृत्ति मात्र ॥
१०. 'स्पन्दप्रदीपिका' में जप की दृष्टि—आचार्य उत्पलदेव 'स्पन्द प्रदीपिका'
में कहते हैं कि मन्त्र का 'बल' है निरावरण चित् का उल्लास । इसी बल को
लेकर मन्त्र सहज नादशक्ति से उद्बोधित होकर प्रदीप्त होते हैं । और उनमें
सर्वज्ञता आदि का बल समाविष्ट होता है 'तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः'
(स्पं० का २६)
१. स्पन्द प्रदीपिका २. त्रिकसार
२१२ वरिवस्यारहस्ये
'तद्बलं निरावरणचिदुल्लासरूपं परशक्त्याख्यमाक्रम्याधिष्ठाय मन्त्राः बीज पिण्ड
पद नामरूपा मननत्राणधर्मिणः सहजनादशक्त्युद्बोधदीप्तत्वात् । सर्वज्ञत्वादिना बलेन
श्लाघायुक्ता'—इसका अर्थ यह हुआ कि जब 'मन्त्र' नादशक्ति-उद्बोधित है तब
'जप' वह प्रक्रिया है जिसमें नादोत्थान हो एवं चित् का उल्लास हो ॥
११. योगसूत्रभाष्यकार व्यास की जप-दृष्टि—योगसूत्रकार पतंजलि कहते
हैं—'तज्जपस्तदर्थभावनम्' (१।२८) अर्थात् उस (प्रणव) का जप एवं उस प्रणव के
अर्थभूत परमात्मा की भावना करनी चाहिए ॥ ('प्रणवस्य जपः प्रणवाभिधेयस्य
चेश्वरस्य भावनम्')१ 'ओंकार को जपते हुए एवं ओंकार के अर्थ 'ईश्वर' की भावना
करते हुए योगी का चित्त एकाग्र होता है ।'२ 'विष्णुपुराण' में कहा गया है कि
ओंकार के पश्चात् योग-साधन एवं योग-साधन के पश्चात् जप करना चाहिए । जप
एवं योग की सिद्धि से परमात्मा का साक्षात्कार होता है—
“स्वाध्यायाद्योग मासीत योगात्स्वाध्याय मामनेत् ।
स्वाध्याय योग सम्पत्या परमात्मा प्रकाशते ॥”
अर्थात् जपपूर्वक ईश्वरार्थभावना एवं भावनापूर्वक ओंकार का जप करना
चाहिए । ईश्वर-ध्यान से 'जप' को संपुटित करना चाहिए । सारांश—'जप' के बाद
योग एवं योग के बाद 'जप' विधेय है । ('भावन' = 'भावनं पुनः पुनश्चित्ते
निवेशनम्'—'तत्त्व वैशारदी' ।)३ प्रणव जप के साथ ब्रह्मध्यान (प्रणिधान) करना
चाहिए—'प्रणव जपेन सह ब्रह्मध्यानं प्रणिधानं' ।।४ प्रणवेन परंब्रह्म ध्यायीत नियतो
यतिः ।।” ईश्वर-प्रणिधान के दो भेद हैं—(१) 'अहं ब्रह्मास्मि', 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म',
तमेतमात्मानमोमिति ब्रह्मौणैकीकृत्य ब्रह्म चात्मनोमित्येकीकृत्य । (२) प्रकृति-पुरुष दोनों
का विलापन करके अपने अहं को ब्रह्मरूप समझना । (१) प्रथम प्रणिधान—
उपासना । (२) द्वितीय प्रणिधान—तत्त्वज्ञान ।।५
अर्धमात्रादि में जो प्रतिफलित चैतन्य है वही 'मन्त्र' है । इसीलिए
'मन्त्राश्चिन्मरीचयः' कहा गया है । 'जप करना' एवं 'जप होना'—इस द्विविध रूप
में जप द्विप्रकारी है—
१. 'जप करना'—वैखरी भूमि । वाचिक जप । उपांशु जप । मानसिक जप
२. 'जप होना'—(स्वाभाविक जप) (१) हृदय में जप, फिर (२) नाभि में
जप, फिर (३) मूलाधार में जप ।
(बाह्य जप में मन्त्राक्षरों का पृथक्-पृथक् उच्चारण रहता है—वह विकल्पमय
है—अतः वह मन्त्र नहीं है । मध्यमा में भूमि में मन्त्र नाद के साथ स्वतः ध्वनित
१-२. व्यास भाष्य ३. तत्त्व वैशारदी (वाचस्पति मिश्र)
४. योगवार्तिक (विज्ञान भिक्षु)
५. प्रत्यगात्मानन्द सरस्वती-'जपसूत्रम्'—'भावन' का अर्थ भावना (चिन्तन करना)
नहीं है 'भावन' (होने देना) है ।
प्रथमोंऽशः २१३
हो उठता है । हृदय जप को ही मध्यमा मार्ग में प्रवेश समझना चाहिए क्योंकि इस
स्थिति में नाद अपने आप चलता रहता है । बाह्य जप में नाद-श्रुति नहीं होती ।
मध्यमा भूमि में जब नाद के साथ मन्त्र स्वभावतः ध्वनित होने लगे तब उसे
आन्तरिक जप समझना चाहिए ।) आभ्यन्तर नाद का उच्चारण होना ही जप का
प्रधान लक्षण है—
‘संयम्येन्द्रियग्रामं प्रोच्चरेन्नादमान्तरम् ।
एष एव जपः प्रोक्तो न तु बाह्यजपो जपः ॥’
‘जप के साथ मन्त्रावय व समूह में ६ शून्यों, ५ अवस्थाओं ७ विषुवों की
भावना भी करनी पड़ती है । ‘जप’—ध्वनि (व्यक्त एवं अव्यक्त) संख्या एवं भाव
(अर्थ) इन तीनों की त्रिपुरी है ।१
मन्त्र में चार बातें मुख्य हैं—(१) बीज (२) पिण्ड (३) पद (४) नाम ।
उनका धर्म है—मनन एवं त्राण । इन सभी का सम्बंध भी जप से है । जप के दो
प्रकार हैं—(१) बाह्य (२) आभ्यन्तर । बाह्यजप = वैखरीनाद का विलास ।
आभ्यन्तर जप = मध्यमा नाद का विलास ॥
‘शाक्तानन्दतरंगिणी’ में अक्षरों की आवृत्ति को ‘जप’ की आख्या दी गई है—
‘जपः स्यादक्षरावृत्तिः’ किन्तु जप की यह परिभाषा वास्तविक जप की नहीं है
क्योंकि वास्तविक जप की आवृत्ति करनी ही नहीं पड़ती प्रत्युत् उसकी आवृत्ति
अपने आप होती रहती है । .
जप के द्वारा देवता प्रसन्न होते हैं एवं उससे सिद्धि मिलती है—
“जपेन देवता नित्यं स्तूयमाना प्रसीदति ।
जपात्सिद्धिर्जपात्सिद्धिर्न संशयः ॥”
जप के भेद—‘स्वच्छन्दतन्त्र’ में जप के ६ भेद बताए गए हैं—(१) वाचिक
(२) मानस (३) यौगिक (४) योग वाचिक (५) योग मानसिक (६) वाङ्मानसिक
यौगिक ॥
१. जप का प्रथम रूप (वाचिक) = देवी का ध्यान करते हुए वाणी द्वारा
मन्त्रोच्चारण “वाचा केवलयोच्चार्य मन्त्र देवी विभाव्य च ।”
२. जप का द्वितीय रूप (मानस) = सावधान चित्त से देवी के रूप का
सम्यक् रीति से चिन्तन करते हुए मन्त्रानुसंधान ‘देव्या रूपं च संचित्य सावधानेन
चेतसा । मन्त्रस्याप्यनुसंधानं मानसं परिकीर्तितम् ॥’
३. जप का तृतीय रूप (यौगिक) = तीन स्थानों से क्रमशः तीन बीजों को
यथामार्ग चिन्तित करके उनका आरोहण करना ‘यौगिक जप’ है ।
१. जपसूत्रम् (प्रत्यगात्मानन्द सरस्वती)