बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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३१४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
कुर्याच्चित्रविचित्राणि गृहाण्यस्मिन् दृढानि हि ।
यथा दृश्यं परेषां स्यात् तथावरणकीलकैः ॥ ११२ ॥
कवाटान् स्थापयेत् तद्वद् वातायनमुखानपि ।
सर्वत्र गृहमध्येष्टदिक्षु शास्त्रानुसारतः ॥ ११३ ॥
कीलसञ्चालनेनाशु गृहसम्भ्रमणं यथा ।
भवेत् तथावृत्तचक्रकीलकान् स्थापयेत् क्रमात् ॥ ११४ ॥
प्रसारणतिरोधानं चक्राणां प्रभवेद् यथा ।
तथा कीलसन्धानं कृत्वा पश्चाद् यथाक्रमम् ॥ ११५ ॥
चालक यात्रियों के बैठने के अर्थ और सामग्री रखने के लिए, जैसे कर्ता ने सङ्कल्पित किया
वैसे ही विधिवत् क्रम से चित्र विचित्र घर इसमें स्थिर करे, जैसे दूसरों का दृश्य सामने आ जावे ऐसे
आवरण कीलों से किवाड लगावे खिडकियों के मुख भी सर्वत्र घर के मध्य आठ दिशाओं में शास्त्रानुसार
कील चलाने से शीघ्र घर का भ्रमण जिससे हो जावे वैसे घूमने वाले चक्रों की कीलें लगावे प्रसारण-
खोलने और तिरोधान-बन्द होना चक्रों का हो जावे ऐसे कील को सन्धान करके यथाक्रम-॥१११-११५॥
चक्राणि स्थापयेद् द्रोणीद्वयमध्यस्थसन्धिषु ।
सम्पूरणाकर्षणार्थं तथा सञ्चोदनाय हि ॥ ११६ ॥
वाताकर्षणनालानि सचक्राणि तथैव हि ।
भस्त्रिकामुखयुक्तानि विस्तृतास्यान्यथाक्रमम् ॥ ११७ ॥
विशद्विहाय सन्धिद्वयकेन्द्रान्यथाविधि ।
संस्थापयेत् ततस्तन्मुखपुरोभागत्तो मृदु ॥ ११८ ॥
पुरोवाताघातचक्राण्यपि सर्वत्र कीलकैः ।
अध प्रसारणे वायुं तद्वदूर्ध्वप्रचोदने ॥ ११९ ॥
द्विमुखीनालचक्राणि यानावृत्तप्रदेशके ।
त्रिशद्वितस्त्यन्तराय कृत्वा शास्त्रप्रमाणतः ॥ १२० ॥
दो द्रोणियों की मध्यस्थ सन्धियों में सम्पूरण और आकर्षण के अर्थ तथा प्रेरणा देने के लिए
चक्रसहित वाताकर्षण नाल भस्त्रामुख दो सन्धियों के केन्द्र २० विस्तार में छोड़ कर उनके मुख के
सामने भाग संस्थापित करे । सामने के वायु को आघात देने वाले चक्रों सर्वत्र कीलों से वायु को नीचे
लाने ऊपर प्रेरित करने में दो मुख वाले नाल चक्रों को विमान के घिरे या घूमने वाले प्रदेश में ३०
बालिश्त अन्तर छोड कर शास्त्र प्रमाण से - ॥ ११६-१२० ॥
सर्वत्र स्थापयेत् पश्चाद् यानाधोभागदेशके ।
वेणीतन्त्रीसमायुक्तानयःपिण्डान् यथाक्रमम् ॥ १२१ ॥
विमानाकाशगमनकाले संयोजितु क्रमात् ।
अष्टदिक्षु तथा मध्ये कीलकान् नव कल्पयेत् ॥ १२२ ॥
त्रिपुराविमान ] [ ३१५
वितस्तिसप्तकोन्नत्यं प्रथमावरणं दृढम् ।
कल्पयित्वाथ विधिवद् यावदावरणं भवेत् ॥ १२३ ॥
तावत्सर्वत्र सुदृढान् नलिकाकीलान् (?) वरान् ।
ग्रहणार्थं मध्ययानपीठस्य सुदृढं यथा ॥ १२४ ॥
कृत्वा वितस्तिदशकान्तरं सर्वत्र शास्त्रतः ।
विशद्वितस्त्यन्तरायाम मध्यदेशे तथैव हि ॥ १२५ ॥
सर्वत्र विमान के नीचले भाग वाले देश में स्थापित करे, वेणी तन्त्री—वेणी के आकार के
तारों या चिन्तासूचक तारों को जोड़पिण्डों को यथाक्रम विमान के आकाश गमन काल में जोडने को
क्रम से ८ दिशाओं में तथा मध्य में उत्तम ६ कीलों को मध्य यान पीठ के ग्रहणार्थ शास्त्रानुसार १०
बालिश्त का अन्तर करके मध्य देश में २० वितस्ति अन्तर पर लम्बा—॥ १२१-१२५ ॥
स्थापयेत् सुदृढं पश्चात् कीलकाना मुखान्तरे ।
सचक्रतन्त्रीविधिवद् योजयेत् सुदृढं यथा ॥ १२६ ॥
प्रतिकीलमुखे तन्त्र्या चञ्चुपुटद्वयं यथा ।
न्यग्भावेनोर्ध्वमुखतः विस्तृतं स्याद् यथा तथा ॥ १२७ ॥
सम्मे (म्मि ?) लीकरणं पूर्वापरभागद्वयो क्रमात् ।
यथा भवेत् तथा तन्त्रीकीलकान् परिकल्पयेत् ॥ १२८ ॥
न्यग्गुलीकरणं चैव तद्वद्विकसनं यथा ।
छत्रीवत् प्रभवेच्चक्रकीलकान् कल्पयेत्तथा ॥ १२६ ॥
न्यग्गुलीकरणे तेषामुपरिष्टात् समन्ततः ।
प्रभवेत् पटावरणं यथा चोर्ध्वमुखान्तरात् ॥ १३० ॥
—सुदृढ स्थापित करे । पश्चात् कीलों के मुख के अन्दर विधिवत् चक्रसहित दो तारों को सुदृढ
जोडे, प्रत्येक कील के मुख में तार में दो चञ्चुपुट जैसे ऐसे हो अलग होने से—पुट खुलने से ऊर्ध्व-
मुख से विस्तृत हो जावे मिलाना पूर्व पिछले दोनों भागों का क्रम से जिससे वैसे तारों की कीलों
को लगावे । संकुचित करना बन्द करना और उसी भांति विकसित करना खोलना छत्री की भांति हो
ऐसे चक्रों की कीलों को बनावे, सङ्कोच करने बन्द करने में उनका ऊपर पटावरण समान हो जिससे
ऊर्ध्वमुख अन्दर से युक्त करे ॥ १२६-१३० ॥
तथा पट चोर्ध्वमुखे योजयेत् कीलकैससह ।
तिरोधान पटस्याथ यथा स्याद् गृहविस्तृते ॥ १३१ ॥
प्रथमावरणमेव कृत्वा पश्चाद् यथाविधि ।
द्वितीयावरणं कुर्यात् त्रिणेत्रेण मनोहरम् ॥ १३२ ॥
तथा पट को ऊपर के मुख में कीलों से लगावे, पट का हटा देना घर के विस्तार के निमित्त
है । इस प्रकार प्रथमावरण बना कर पश्चात् यथाविधि दूसरा सुन्दर आवरण त्रिणेत्र लोहे से
करे ॥ १३१-१३२ ॥
३१६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
तदुपरि चान्यत् ॥ अ० २, सू० ३ ॥ १
बो० वृ०
प्रथमावरणस्यैवमुक्तवाथ रचनाविधिम् ।
द्वितीयावरणरचनाविधिरस्मिन् प्रकीर्त्यते ॥ १३३ ॥
प्रथमावरणस्योपर्यथाशास्त्रं यथाक्रमम् ।
अन्यदावरणं कुर्यादिति सूत्रविनिर्णयः ॥ १३४ ॥
प्रथमावरणात् किञ्चिद्ध्रस्वमावरणं यथा ।
तथा द्वितीयावरणं कर्तव्यमिति वर्णितम् ॥ १३५ ॥
वितस्तिशतकायामं यदि स्यात् प्रथमाऽङ्गणम् ।
वितस्त्यशीत्यायामं स्याद् द्वितीयावरणं तथा ॥ १३६ ॥
वितस्त्यशीत्यायामं च वितस्तित्रयगात्रकम् ।
द्वितीयावरणपीठं त्रिणेत्रेणैव कल्पयेत् ॥ १३७ ॥
प्रथम आवरण की इस प्रकार रचनाविधि कह कर द्वितीय आवरण की रचनाविधि इसमें कही
जाती है । प्रथम आवरण के ऊपर यथाशास्त्र यथाक्रम अन्य आवरण करे यह सूत्र का निर्णय है । प्रथम
आवरण से कुछ छोटा आवरण वैसा दूसरा आवरण करना चाहिए यह कहा है, प्रथम अङ्गण-आवरण
यदि १०० बालिशत लम्बा हो तो दूसरा आवरण ८० बालिशत लम्बा ३ बालिशत मोटा दूसरे आवरण
का पीठ त्रिणेत्र लोहे से बनावे ॥ १३३-१३७ ॥
पीठस्याध प्रदेशेथ प्रथमावरणोपरि ।
संयोजनार्थं विधिवत् कीलकानि दृढं यथा ॥ १३८ ॥
प्रथमावरणे यावत्संख्या स्यात् तावदेव हि ।
सन्धारयेद् यथाकामं सर्वत्राधोमुखान्यथ ॥ १३६ ॥
कीलकद्वयसंयोजनार्थं शास्त्रानुसारतः ।
कीलीग्रहणयोग्यानि हस्तचक्राण्यपि क्रमात् ॥ १४० ॥
कीलपक्त्यनुसारेणोभयत्र च यथाक्रमम् ।
कीलकानि स्थापयित्वा तेषामन्तरतस्ततः ॥ १४१ ॥
सचक्रनालान् सर्वत्र सतन्त्रीन् योजयेद् दृढम् ।
विद्युत्स्थानमुखात् तेषु विद्युत्संयोजनं यथा ॥ १४२ ॥
भवेत् तथा बृहच्चक्रकीलकं सरलं दृढम् ।
विद्युत्पात्रमुखे सार्धवितस्त्यन्तरतः क्रमात् ॥-१४३ ॥
स्थापयित्वा तदारभ्य नालचक्रोपरि क्रमात् ।
सुसूक्ष्मा मृदुला शुद्धा कनिष्ठाङ्गुलमानतः ॥ १४४ ॥
पीठ के नीचले प्रदेश में और प्रथम आवरण के ऊपर लगाने को कीलें दृढ प्रथम आवरण में
त्रिपुरविमान ] [ ३१७
जितनी संख्या हो उतने ही लगावे यथेष्ट सर्वत्र नीचे मुख वाली दो कीलों के लगाने को शास्त्रानुसार
कीली से ग्रहण करने योग्य हस्तचक्र—मण्डूकाइस्त चक ? भी क्रम से कील पंक्ति के अनुसार दोनों ओर
यथाक्रम कीलें स्थापित करके उनके अन्दर से चक्रसहित तारों को लगावे, विद्युत् स्थान मुख से उनमें
विद्युत् का संयोग जिससे हो जावे ऐसे सरल बडे चक्र की कील विद्युत् पात्र के मुख में डेढ बालिश्त
अन्दर से या अन्तर से ? स्थापित करके उससे आरम्भ कर नालचक्र के ऊपर क्रम से सुसूक्ष्म मृदु शुद्ध
कनिष्ठा अंगुली के समान—॥ १३८-१४४ ॥
पट्टिका योजयेत् कीलकान्तं सम्यग्यथाविधि ।
पश्चात् कीलपकतीना मुखसन्धिषु शास्त्रतः ॥ १४५ ॥
व्यत्यस्तहस्तवद् वेगादूर्ध्वमागत्य सर्वतः ।
पूर्वोत्तरावरणकीलक्रमादृत्य पंक्ति । १४६ ॥
अन्योन्यं योजयित्वाथ बध्नीयात् सुदृढं यथा ।
❊ततोर्ध्वमुखसर्पाख्यकीलकानि पृथक् पृथक् ॥ १४७ ॥
संस्थापयेत् ततस्सर्वकीलक्रमणाय हि ।
पूर्वोक्तविद्युत्पात्रस्य पुरोभागस्थकीलकात् ॥ १४८ ॥
तदन्तर्गतबृहच्चक्रभ्रमणं भवेद् यथा ।
तथा प्रसारयेद् विद्युच्छक्तिं तदुपरि क्रमात् ॥ १४६ ॥
शक्तिवेगानुसारेण तच्चक्रभ्रमणं भवेत् ।
एतच्चक्रस्य भ्रमणं दशवारं यथा भवेत् ॥ १५० ॥
तत्पुरोभागस्थचक्रभ्रमणं वेगतो भवेत् ।
तेन नालस्थचक्राणि सर्वाण्यपि यथाक्रमम् ॥ १५१ ॥
भ्रामयन्ति वेगेन कीलपंक्तिमुखावधि ।
—पट्टिका लगावे कील के अन्त में यथाविधि, पश्चात् कीलपंक्तियों के मुख सन्धिस्थानों में
शास्त्र से उलटे हाथ वाले वेग से ऊपर सर्वतः आकर पूर्वोत्तर के आवरण की कीली को लेकर पंक्ति से
एक दूसरे में मिला कर सुदृढ बान्ध दे फिर ऊर्ध्वमुख सर्पाख्य कीलें पृथक् पृथक् संस्थापित करे फिर सब
कीलों के भ्रमण के लिए पूर्वोक्त विद्युत्पात्र के सम्मुख भाग में वर्तमान कील से उसके अन्दर के बड़े
चक्र का भ्रमण जिससे हो जावे वैसे उसके ऊपर विद्युत् शक्ति को प्रसारित करे शक्ति के वेगानुसार
वह चक्रभ्रमण हो जावे । इस चक्र का भ्रमण दश बार जिससे हो जावे । उसके सामने वाले चक्र का
भ्रमण वेग से हो इससे नालस्थ सब चक्र भी कीली पंक्ति के मुख तक वेग से घूमते हैं ॥ १४५-१५१ ॥
पश्चादूर्ध्वमुखतस्सर्पास्यकीलक्रमागतं ॥ १५२ ॥
तच्छक्तिं चोदयद् वेगात् तेन कीलकान्तरात् स्वयम् ।
तत्कीलहस्तस्सर्वत्र अनुलोमविलोमत ॥ १५३ ॥
ऊर्ध्वमागत्य वेगेनावरणद्वयकीलकान् ।
❊ तत ऊर्ध्वं० एकादेशसन्धिरार्थंः ।
३१८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
समाहृत्याय सम्मेल्य बध्नाति सुदृढं यथा ॥ १५४ ॥
पूर्वोत्तरावरणयोः सन्धिसम्मेलनं यथा ।
विद्युदाकर्षणेनाशु प्रभवेत् सर्वतः क्रमात् ॥ १५५ ॥
तथा पञ्चास्यमयूरकीलकानि नियोजयेत् ।
सन्धिसम्मेलनं तेन प्रभवेन्नात्र संशयः ॥ १५६ ॥
तत्पृथक्करणार्थाय पुनः कालानुसारतः ।
सर्वत्र शक्त्यपकर्षणकीलान्यपि पूर्ववत् ॥ १५७ ॥
शक्तिप्रचोदनयन्त्रेष्वेव संस्थापयेत् क्रमात् ।
पश्चात् ऊर्ध्वमुख से सर्पास्य कील मार्ग से उस शक्ति को वेग से प्रेरित करे उससे स्वयं कील
के अन्दर से वह कील हाथ सर्वत्र अनुलोम विलोम से ऊपर आकर वेग से दो आवरणों की कीलों को
पकड कर मिला कर सुदृढ बान्धता है जिससे पूर्व और उत्तर आवरण में सन्धि का सम्मेलन—मेल
संयोग विद्युत् के आकर्षण से शीघ्र सब ओर क्रम से हो जावे वैसे पञ्चास्य—पञ्चमुख वाली
मायूर कीली मोर के आकार के पेंच को लगावे, उससे सन्धि सम्मेलन हो जावे इसमें संशय नहीं ।
फिर कालानुसार अलग करने के लिए सर्वत्र शक्त्याकर्षण—शक्ति को खींचने वाली कीलों को भी पूर्व
की भांति शक्तिप्रेरक यन्त्रों में ही क्रम से संस्थापित कर दे ॥ १५२-१५७ ॥
१५८ का पूर्वार्द्ध विषय अधूरा रहा, अतः कुछ श्लोक मध्य में अन्य होकर पश्चात् हस्तलेख
कापी संख्या २२ पश्चात् २१ वस्तुतः कापी २३ का भाग (मैटर) होना चाहिये ।
कापी संख्या २२—
(यह हस्तलेख कापीसंख्या २२ है त्रिपुरविमान का शेष प्रतीत होता है जो हस्तलेख कापी २३
वस्तुतः कापी २१) के पीछे जाना चाहिए—
जलान्तर्गमने पूर्वावरणस्य यथाविधि ॥१॥
सर्वचक्रोपसंहारं कृत्वा पश्चाद् यथाक्रमम् ।
चक्रद्रोण्यावरणं कुर्याद् यानादधः क्रमात् ॥२॥
जलनिबन्धनार्थाय आमूलाग्रं यथाविधि ।
कुर्यादावरणं क्षीरीपटतत्समुद्बढं यथा ॥२॥
वितस्त्यायामस्तत्तद्वद् वितस्त्यर्धघनं तथा ।
मण्डूकहस्तवत् कुर्याच्चक्राणि सुदृढान्यथा ॥४॥
चतुरङ्गुलगात्रांश्च द्वादशाङ्गुलमुन्नतान् ।
लोहदण्डान् कल्पयित्वा तेषामग्रे यथाविधि ॥५॥
मण्डूकहस्तचक्राणि योजयेत् कीलकैस्सह ।
(त्रिपुर विमान के ) जल के अन्दर जाने के निमित्त पूर्व आवरण—पृथिवी पर चलने वाले
आवरण के सब चक्रों का उपसंहार—संकोच करके उनके गतिक्रम को रोककर पश्चात् यथाक्रम
विमान के नीचे चक्रद्रोणी चक्रों के आधारस्थान का आवरण करे जल के बान्धने के लिये आगे पीछे
तक यथाविधि क्षीरीवृक्षों के दूध का गोन्द से बने पट से सुदृढं आवरण करे । १ बालिश्त लम्बे चौडे
आधे बालिश्त मोटे चक्र मेण्डक के हाथ के समान बनावे, ३ अङ्गुल ऊंचे लम्बे लोहदण्डों को बनाकर
उनके आगे यथाविधि मण्डूकहस्तचक्रों को कीलों से युक्त करे—॥१-५॥
सर्वत्र चक्रद्रोणीना पार्श्वयोरुभयोरपि ॥६॥
द्रोण्यन्तर्गतचक्राणां सन्धिस्थानसमानत ।
संस्थापयेल्लोहदण्डान् सचक्रांश्च यथाविधि ॥७॥
सुदृढान् सरलान् चक्रकीलकान्तर्गतान्यथ ।
तथा दण्डद्वयं चक्रसयुत कीलकैस्सह ॥८॥
आहृत्य पूर्वोक्तचक्रदण्डसन्धिमुखान्तरात् ।
विमानपुरतस्तद्वत्पार्श्वयोरुभयोरपि ॥६॥
३२० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
सलिलोत्क्षेपणार्याय स्थापयेत् कीलकं दृढम् ।
शक्तिसञ्चोदनादादिकीलकभ्रमणं भवेत् ॥१०॥
—सर्वत्र चक्रद्रोणियों के दोनों पाश्र्वों में भी। द्रोणियों के भीतरी चक्रों के सन्धिस्थान
की सहायता से सरल चक्रकीलों के अन्तर्गत चक्रसहित लोहदण्डों को संस्थापित करे । चक्र-
संयुक्त कीलों से दो दण्डों को पूर्वोक्त चक्रदण्डसन्धिमुख के अन्दर से निकालकर विमान के
सामने से दोनों पाश्र्वों से जल के हटाने के लिये कीलों से दृढ लगावे, इस प्रकार शक्तिप्रेरणा से आदि
कीलों—पेचों का भ्रमण होगा ॥६—१०॥
तच्चक्रवेगात्सर्वेषां चक्राणां भ्रमणं भवेत् ।
जलस्योत्क्षेपणा तेन ह्यासस्रन्ताद् यथाक्रमम् ॥११॥
प्रभवेदतिवेगेन तस्माद् यान. प्रधावति ।
एव क्रमेण विधिवदूर्ध्वावरणपाश्र्वयो ॥१२॥
सन्धारयेन्नलाघातचक्राणि सुदृढान्यथ ।
[L
त्रिपुरविमान ] [ ३२१
शक्तिसञ्चोदनात्तत्कीलकचक्रस्य भ्रामणम् ।
तेन वातद्वयं सम्यक् क्रमादावरणद्वये ॥२०॥
सम्पूर्यत्यतिवेगेन यन्त्रेणा तेन भूरिशः ।
सुखावहं भवेत् तस्मिन् सर्वेषां युगपत् क्रमात् ॥२१॥
घूमने वाले लोहमुख स्थापित करे फिर वातपूरककीलों को उनके पाश्र्वों में लगावे,
ऊपर की वायु के खींचने को सीत्कारी सीत्-वायुचूषण करने वाली कीलों को भी सर्वत्र
विशेषरूप से लगावे, सीत्कारी के आकर्षण-से प्रकट हुआ वायु नाल में भरा हुआ द्वितीय
आवरण से लेकर प्रथम आवरण की अवधि तक होता है, उसका जैसे सर्वतोमुख वेगसे
प्रसार हो वैसा यथाक्रम कील युक्त करे । शक्ति के प्रेरण से उस कीलचक्र का घूमना होता
है, इससे वायुएं क्रम से दोनों आवरणों में अतिवेग से भर जाती हैं इससे उसमें सब चालक
और यात्रियों को एक साथ बहुत सुखद होवे-होता है ॥१६-२१॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन वातनालान्नियोजयेत् ।
वातनालावरणद्वयमध्ये यथाविधि ॥२२॥
संस्थाप्य पश्चादावरणोर्ध्वपाश्र्वे समं यथा ।
दक्षिणोत्तरभागेषु चतुर्दिक्षु यथाक्रमम् ॥२३॥
विकासनोपसंहारकीलकान् चक्रसंयुतान् ।
सुदृढान् सरलांश्चैव स्थापयेच्छक्तिवत्क्रमात् ॥२४॥
पूर्वोक्तरावरणयोस्सन्धिस्थाने यथाविधि ।
एकैकावरणस्याथ पृथक्करणहेतुकान् ॥२५॥
जतातन्त्रीसमायुक्तचक्रकीलकान् पृथक् पृथक् ।
सर्वत्र स्थापयेत् सम्यग्वितस्तिदशकान्तरे ॥२६॥
अतः सर्वप्रयत्न से वातनालों को लगावे, दोनों वातनालावरणों के मध्य में यथाविधि
संस्थापित करके पश्चात् आवरण के ऊपर पार्श्व में भी समान दक्षिण उत्तर भागों में चारों दिशाओं में
यथाक्रम विकासन-फैलाने उपसंहार-संकोच करने वाली कीलों को चक्रसहित दृढ सरल शक्ति की भांति
स्थापित करे पूर्वोक्त आवरण के सन्धिस्थान भी यथाविधि एक एक आवरण के पृथक् करने के हेतुरूप
जटा तारों-जटारूप में परस्पर ऐंठा पाए हुए तारों से युक्त चक्रकीलों को पृथक् पृथक् सर्वत्र १० बालिश्त
के अन्दर स्थापित करे ॥२२-२६॥
शक्तिसञ्चोदनात् कीलचक्राणां भ्रमणं यथा ।
तथा तन्त्रिं समाहृत्य शक्तिस्थानाद् यथाक्रमम् ॥२७॥
चक्रकीलकमूलान्तं सम्यक् सञ्चोदयेद् दृढम् ।
तेन विद्युत्प्रसरणं कुर्यादुक्तप्रमाणतः ॥२८॥
तच्छक्तिचोदनात्कीलचक्राणां भ्रमणं भवेत् ।
तस्मादावरणभेदः पृथक् पृथग् यथाक्रमम् ॥२९॥
३२२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
युगपत्प्रभवेत्सम्यक् पृथिव्याकाशमार्गतः ।
यथेष्टं वेगतश्चावरणौ यन्तु भवेत् स्वतः ॥३०॥
शक्ति की प्रेरणा से कीलचक्रों का भ्रमण जैसे हो वैसे शक्तिस्थान से—मीटर तार को लेकर
यथाक्रम चक्र की कील के मूलतक भली प्रकार प्रेरित करे उससे उक्त प्रमाण से विद्युत् का फैलाव करे,
उस शक्तिप्रेरण से कीलचक्रों का भ्रमण होवे । इससे पृथक् पृथक् पृथिवी और आकाश के मार्ग सम्बन्धी
आवरणों का भेद एक साथ हो जावे फिर यथेष्ट दोनों आवरणों में वेग से जाना हो सके ॥२६-३०॥
पश्चाद् द्वितीयावरणोपरि शास्त्रप्रमाणतः ।
यन्त्रूपवेशनार्थाय वस्तुप्रक्षेपणाय च ॥३१॥
गृहाणि कल्पयेच्चित्रविचित्राणि यथाक्रमम् ।
वातायनकवाटाश्च पूर्वावरणवत्क्रमात् ॥३२॥
यथादृश्य भवेद् बाह्यं कर्तव्यास्तत्र(च) तथा ।
पश्चादावरणकुड्याना समन्ताद् यथाक्रमम् ॥३३॥
सर्वत्र कारयेत् पीठावरणाग्रे दृढ यथा ।
वितस्तिसप्तकोन्नत्य गात्रे त्वर्धवितस्तिकम् ॥३४॥
सर्वत्र कुड्यप्रमाणमेव शास्त्रे निरूपितम् ।
तृतीयावरणाद् विद्युत्सङ्ग्रहार्थं यथाविधि ॥३५॥
[
त्रिपुराविमान ] [ ३२१
हस्तात् संगृह्य तत्रत्यवेणीतन्त्रि प्रकर्षयेत् ॥४०॥
विमान के सामने वाले भाग में ध्वजस्तम्भ सुदृढ स्थापित करे, उस स्तम्भ के मूल में दो
घण्टे भी कांसे लोहे के बने हुए चालक और यात्रियों के कालसङ्केत के अर्थ घण्टानाद् करने को
वहां सरल स्थापित करे, वेणीतन्त्रो — चिन्ता सूचिका ❄ डोरी जैसी तार कीलसहित को लेकर घर—कमरे
की भित्ति के ऊपर क्रम से सब सरल जगह लगावे । अत्यन्त अनर्थकार्ये जब जहां हो वेणीतन्त्रि को
खींच ले—॥ ३७–४० ॥
तेन विज्ञायते कृत्य शीघ्रं यानाधिकारिणा ।
ततो यानाधिकारी तु वेगादागत्य तद् गृहम् ॥ ४१ ॥
विचार्य तत्रत्यानर्थकारणं न्यायतस्स्वयम् ।
समाधानं करोत्यस्माद् वेणीतन्त्रि नियोजयेत् ॥४२॥
भाषाकर्षणयन्त्राणि भावाकर्षणकान्यपि ।
दिक्प्रदर्शकयन्त्राणि कालप्रमाकान्यपि ॥ ४३ ॥
शीतोष्णप्रमापकयन्त्राण्यपि विशेषतः ।
सतन्त्रीकीलकं सम्यक् पूर्वपश्चिमयो क्रमात् ॥ ४४ ॥
सस्थापयेत् ततोऽत्यन्तवातवर्षातपादिभि ।
अत्यन्तोपद्रव व्योमयानस्य प्रभवेद् यदि ॥ ४५ ॥
तन्निवारयितु यन्त्रत्रय पश्चाद् यथाविधि ।
इस से यानाधिकारी द्वारा जान लिया जाता है, तब वह यानाधिकारी शीघ्र उस कमरे में
आकर और अनर्थकारण का युक्ति से विचार कर समाधान करता है अतः वेणीतन्त्री लगानी चाहिए ।
भाषण को खींचने वाले यन्त्र, भाव को खींचने वाले यन्त्र, दिशाप्रदर्शक यन्त्र, कालमापक यन्त्र, शीत
और उष्णता को मापने वाले यन्त्र भी विशेषतः तारों और कीलों के साथ आगे पीछे लगावे— संस्थापित
करे । फिर अत्यन्त वात वर्षा आतप — धूप आदि से विमान का अत्यन्त बिगाड हो तो उसके निवारणार्थ
तीन यन्त्र पीछे यथाविधि —॥४१-४५॥
पूर्वपश्चिमयोश्चैव तथा शिखरपार्श्वयोः ॥ ४६ ॥
सस्थापयेत् क्रमात् सम्यक् पृथक् पृथग्यथाक्रमम् ।
श्लोकस्थादिपदात् सम्यग्घिमसंहारकादय ॥ ४७ ॥
प्रोक्तास्स्तु पालनार्थाय विमानस्य यथाक्रमम् ।
उक्त हि यन्त्रसर्वस्वे यन्त्रत्रय यथाविधि ॥ ४८ ॥
सर्वेषां सुखबोधाय तान्येवात्र प्रचक्षते ।
श्वास्यवातनिरसनयन्त्र तद्वन्मनोहरम् ॥ ४६ ॥
❄ "वेण् चिन्तायाम्" ( भ्वादि० )
! Wait, is it शारिका? शा, रि, का, र, स: वारिकुड्मलशारिकारसपञ्चवारणसोदरान् ।
Line 26:
वाधिपञ्चकमाक्षिकाष्टकवातकङ्करिकोदरान् ॥५५॥
Wait, वातकङ्करिकोदरान् or वातकङ्कुरिकोदरान् or वातकङ्करिकोदरान्? It is वातकङ्करिकोदरान् or वातकन्दुरिकोदरान्? Let's check: क, ङ्क, रि, क, ो, द, र, ा, न्: वातकङ्करिकोदरान् or वातकङ्कुरिकोदरान् (looks like वातकङ्करिकोदरान् or कङ्कुरिकोदरान्, it has no u-matra on ङ्क, so वातकङ्करिकोदरान् or वातकङ्करिकोदरान् -> wait, look at कङ्क: क + ङ्क with ु? No, wait, look at कङ्करि: क, ङ्क, रि? Wait, is it कङ्कूरिकोदरान्? There is an u-matra ू under it! Look at कङ्कू -> wait, `वातक
त्रिपुरविमान ] [ ३२५
अत्यन्तलघुवातातपाद्यैरच्छेद्यमेव च ।
प्रभवेद् वारुणं लोहं सुदृढं सुमनोहरम् ॥६०॥
अथास्यवातनिरसनयन्त्रं तेन प्रकल्पयेत् ।
आदौ कुर्याल्लोहशुद्धिं पश्चादाकारकल्पनम् ॥६१॥
बारिपङ्क‡—सुगन्धवला का मूल ? विषारि—करञ्जुवा, सुहागा, जालिका—लोहा, अम्ल—
अम्लवेतस, विषोदर—विषनिन्दु—कुचला ?, वारिपण्डकक्षार-अभ्रकक्षार या समुद्र लवण ? या जलक्षार,
सामुद्रिक लवण ५ भाग, सप्तकशोण—सप्तशोण—७ भाग सिन्दूर, मजीठ, गोधर—मनःशिला ?
वारुणास्यक—वरना वृक्ष के मूल का सत्त्व ?, पार्वण अरुण—अर्क ?, फाक्तुण्ड—काला अगर, भूधर—
पर्वत ?, वारुणाभ्रक श्वेताभ्रक, क्षार—सज्जीक्षार, कुण्डलीमूल - गुडूचीसत्त्व या कौञ्चमूल ?, लोधर—
लोध्र, वारिकुङ्मल—सुगन्ध वाला फूल, शारिकारस—शालिचावल का रस या अनन्तमूल का रस ? षष्ठय,
बाणसहोदर ? बार्डिपण्डवक—सीसा ५ भाग, स्वर्णमाक्षिक ८ भाग, वातक—पटशण या मूर्वालता, किणि-
कोदर–कंगुनी मालकंगनी ? बालुका-रेता, अञ्जन–सुरमा या रसौंत, कुक्कुटाण्डक–शलमली बीज या मुर्गी के
अण्डे ?, कार्मु खीमल-कार्मु कीमल —खदिरमल—कत्था, लोध्र, बीरुरु रस ? सिंहिकामुख—कटेली सत्त्व
या मूल, कूर्मजह्व—कोई ओषधि ?, मसूरिक ? इन सब शुद्ध वस्तुओं को मूषा मृत्तिकादि से बनी
विशिष्ट बोतल में भरकर पद्मामुखकुण्ड में यथाविधि रखकर पांचमुखवाली भस्त्रा से ७०० दर्जे की उष्णता
वेग से गलाकर यन्त्रमुख में उस द्रवरस को धीरे से भरकर ऋजुकरणयन्त्र में स्थित कीलों से उस रस
को क्रम से बराबर किया हुआ मृदुल धूम्ररंगवाला, अत्यन्त हलका वायु धूप आदि से अच्छेद्य हो जावे
यह वारुण लोहा अच्छा दृढ सुन्दर है अथास्यवातनिरसनयन्त्र इससे बनाना चाहिए, प्रथम लोहशुद्धि
करे पश्चात् आकाररचना करे ॥५३-६१॥
शुद्धिक्रममुक्तं क्रियासारे—शुद्धिक्रम क्रियासार में कहा है—
शुण्डीद्रावकात् सम्यक् पाचनायन्त्रतः क्रमात् ।
पाचयेत् त्रिदिनं पश्चात् कुट्टिणीयन्त्रतः पुन ॥६२॥
पटवत्कारयेत् सम्यक् पट्टिका सुदृढं यथा ।
वातारिकन्दनिर्यास कृत्वो पश्चाद् यथाविधि ॥६३॥
तत्पट्टिकोपर्य्यंगुलप्रमाणेन समग्रतः ।
विलेप्य तापनायन्त्रे तापयेत् अधर्मामात्रकम् ॥६४॥
पश्चात् संगृह्य विधिवन्मृत्सार वागुर तथा ।
जन्मिथितफणिक्षीर समभाग यथाक्रमम् ॥६५॥
भाण्डे निक्षिप्य विधिवत्पाचनायन्त्रतः क्रमात् ।
पाचयेद्दिनमेकं पश्चात् संग्राहयेच्छनैः ॥६६॥
‡ बरपिङ्क
† क्रिया–व्या छान्दस इकारलोप 'यन्त्राय्यान्नाक्रमम्' की भाँति ।
- wait, looking atपुन.: there is a dot at the baseline? No, middle dot. It's a colon/visarga! Line 12 has तत.` - dot at middle/bottom.
Let's look at L12:
तत. कण्टकहेरण्डधवलोदरचारकान् ।
Wait, is it कण्टकहेरण्डधवलोदरचारकान्?
Let's check Hindi in line 15:
"गोखरू, हेरण्ड ? धवलोदर—धव या धव और लोदर—लोध्र—लोध—लोध, चारक —पियाल"
"गोखरू" = कण्टक (गोक्षुर/कण्टक)!
"हेरण्ड" = हेरण्ड!
"धवलोदर" = धवलोदर!
"चारकान्" = चारकान्!
Yes, exactly: कण्टकहेरण्डधवलोदरचारकान् ।
Line 13:
तिलांश्च समभागेन मेलयित्वा यथाविधि ॥६९॥
Let's check letters:
तिलांश्च समभागेन मेलयित्वा यथाविधि ॥६९॥
Yes!
Line 14:
तैलाहरणयन्त्रेण तैलमाहृत्य तत्परम् ।
Let's check:
`तैलाहरणयन्त्रेण त
)लता? Ah, सञ्च(ञ्च?)लताorसञ्च(श्व?)लता? It says सञ्च(श्व?)लताorसञ्च(ञ्च?)लता? Let's look at the image: सञ्च(श्व?)लताorसञ्च(ञ्च?)लता? It says सञ्च(श्व?)लताorसञ्च(ञ्च?)लता? Let's look at the image: सञ्च(श्व?)लताorसञ्च(ञ्च?)लता? It says सञ्च(श्व?)लताorसञ्च(ञ्च?)लता? Let's look at the image: सञ्च(श्व?)लताorसञ्च(ञ्च?)लता? It says सञ्च(श्व?)लताorसञ्च(ञ्च?)लता? Let's look at the image: सञ्च(श्व?)लताorसञ्च(ञ्च?)लता? It says सञ्च(श्व?)लताorसञ्च(ञ्च?)लता? Let's look at the image: सञ्च(श्व?)लताorसञ्च(ञ्च?)लता? It says सञ्च(श्व?)लताorसञ्च(ञ्च?)लता? Let's look at the image: सञ्च(श्व?)लताorसञ्च(ञ्च?)लता? It says सञ्च(श्व?)लताorसञ्च(ञ्च?)लता`? Let's
३२८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
इस वायु को फेंकने के लिए शाखानुसार यान के ऊपर चक्रसहित कीलों से सीत्कारी भस्त्रिका
की भांति सर्पमुखवाली तीन कीलों—पेंचों को यथाविधि बनाकर सरल दृढ गोल या घूमनेवाले शंकुओं से
संस्थापित कर दे, वायु स्वभावानुसार यथाक्रम ऊपर चला जावेगा तब तीनों सर्पमुखी कीलों—पेंचों को
घुमावे पश्चात् पूर्वोक्त तीनों सर्पमुख सर्प की भांति वायु को खींच कर उस उस के भागानुसार स्वमुख से
ही वेग से ऊपर आकाश में फेंक देता है इससे वायु सर्वथा आकाशमण्डल में लय को प्राप्त हो जाता
है अतः वायुद्वारा विमान का नाश या बिगाड निश्चित न हो ॥ ८१-८६ ॥
तस्माद् यानस्य वातापायविनाशो भविष्यति ।
अनायासाद् याति पश्चाद् विमानस्सरल यया ॥ ८७ ॥
अतो विमानावरणत्रयेप्येव प्रकल्पयेत् ।
वातोपसंहारयन्त्रमेवमुक्त्वा यथाविधि ॥ ८८ ॥
अथ वर्षोपसंहारयन्त्रमद्य प्रचक्षते ।
वर्षोपसंहारयन्त्र क्रौञ्चकेनेव प्रकल्पयेत् ॥ ८६ ॥
अत विमान यान वातसम्बन्धी उपद्रव का अनायास विनाश हो जावेगा, पश्चात विमान
सरलता से गति करता है चलता है उडता है। अत' विमान के तीनों आवरणों में ऐसा करे। इस
प्रकार यथाविधि वातोपसंहार यन्त्र कह कर अथ वर्षोपसंहार यन्त्र कहते हैं, वर्षोपसंहार यन्त्र क्रौञ्चक-
लोह से बनावे ॥ ८७-८६ ॥
उक्तं हि क्रियासारे — कहा ही है क्रियासार ग्रन्थ में—
यद्द्रवद्राणनशक्तीर्जलं स्यापहरेत्स्वत. ।
तत् क्रौञ्चिकलोहमिति प्रवदन्ति मनीषिण ॥ ६० ॥
वर्षोपसंहारयन्त्रमतस्तेनैव कल्पयेत् । इत्यादि ॥
जिससे कि जल की द्रव (पतलेपन) प्राणन (गीला करना) शक्तियों को नष्ट करदे, उसे क्रौञ्चिक
लोह मनीषी कहते हैं वर्षोपसंहार यन्त्र अतः इससे बनावे ॥ ६० ॥
यथोक्त यन्त्रसर्वस्वे क्रोञ्चलोहविनिर्णय ॥ ६१ ॥
तथेवात्र प्रवक्ष्यामि क्रौञ्चिकस्य यथाविधि ।
ज्योतिर्मुख त्र्यम्बक च हसतुण्ड सुधारकम् ॥ ६२ ॥
वसुरुद्राब्धिभागान् तथैव च पुनः क्रमात् ।
टङ्गणं सैकत चूर्णमोर्वार रुरुक्क तथा ॥ ६३ ॥
पटोलक वाध्युं षिकं चैते सप्त यथाक्रमम् ।
वसुवेदाग्न्रिबाणतारशैलविभागतः ॥ ६४ ॥
संयोज्य मूषामध्ये स्थापयेत् पद्मकुण्डके ।
द्वादशोत्तरपञ्चशतकक्ष्योष्णप्रमाणतः ॥ ६५ ॥
जैसा कि यन्त्रसर्वस्व में क्रौञ्चिक लोह निर्णय है वैसे ही यहां मैं यथाविधि क्रौञ्चिक का
कथन करूंगा। ज्योतिर्मुख-चित्रक वृक्ष का मूल ८ भाग, त्र्यम्बक-ताम्बा ११ भाग, हंसतुण्ड-हंसराजमूल ?
त्रिपुरविमान ] [ ३२६
१२ भाग, सुधारक-सुधार कपूर ७ भाग, पुनः सुहागा ८ भाग, सैकत-श्वेतकण्टकारी का सत्त्व या रस
या रेत ? ४ भाग, चूना १२ भाग, ककक्षी खरबूजा के बीज या तैल ३ भाग, रुरुक-हरिणशृङ्ग या
रुरुक कोई ओषधि या पारा ५ भाग, पटोल-परवल ५ या २७ भाग, बाष्पु धिक-समुद्रफेन या द्रोणीलवण १
भाग ? ये सात पदार्थ मिला कर मूषामुख कृत्रिम बोतल में रख दे पद्माकुण्ड में ५१२ दर्जे कीउष्णता
प्रमाण से—॥ ६१-६५ ॥
गालयित्वातिवेगेन त्रिमुखीभस्त्रिकामुखात् ।
समीकरणावन्त्रास्ये तद्रस पूरयेच्छनै ॥ ६६ ॥
एव कुतैरत्यन्तमुदु मधुवर्ण दृढ रुचम् ।
वर्षविच्छेदनकर वर्षवातातपाग्निभिः ॥ ६७ ॥
अभेद्यमुष्णगर्भ च विषनाशकर शिवम् ।
जलद्रवप्राणनाशशक्त्याकर्षणसदीक्षितम् ॥ ६८ ॥
प्रभवेत् कौशिक लोह सर्वजन्तुविषापहम् ।
एतल्लोहेन कर्तव्य यन्त्र वर्षोपसहारकम् ॥ ६६ ॥
तुलसीरुक्मपुङ्खाग्नित्रिजटापञ्चकण्टकी ।
एतेषा बीजतैलेन लोह सन्ताप्य शास्त्रत ॥ १०० ॥
त्रिमुखी भस्त्रामुख से वेग से गला कर समानीकरण यन्त्र के मुख में उस पिंघले रस को धीरे
से भर दे ऐसा करने पर अत्यन्त मृदु मधु रंगवाला दृढ चमकदार वर्षा का विच्छेद करने वाला वर्षा वायु
धूप से भेदन न करने योग्य उष्णस्वभाव विषनाशक कल्याणकर जल का द्रव (पतलापन) प्राणन (गीलापन)
नामक शक्तियों के आकर्षण की शक्ति से युक्त कौशिक लोहा सब जन्तुओं के विष का नाशक है । इस
लोहे से वर्षोपसंहारक यन्त्र बनाना चाहिये । तुलसी, रुक्म, धतूरा, नागकेसर ?, शरपुंखा, चित्रक,
त्रिजटा—बिल्व, पञ्चकण्टकी-? के बीजों के तेल से लोहे को गरम करके—॥ ६६-१०० ॥
पश्चाद् यन्त्र यथाशास्त्र कल्पयेन्नान्यथा भवेत् ।
तल्लोह कुट्टिणीयन्त्रात् पट्टिका कारयेत् तत. ॥ १०१ ॥
वितस्तिद्वयमायाम षड्वितस्त्युन्नत तथा ।
एकै कस्मिन्नेकनाल यथा संयोजितु भवेत् ॥ १०२ ॥
कल्पयेत् सुदृढान् नालान् यावद्यानोन्नत तथा ।
विमानावरणास्याग्रे नालसंयोजनाय हि ॥ १०३ ॥
वितस्तित्रयमायामानालान् पश्चाद् यथाक्रमम् ।
सन्धायेदामसन्तात् सकीलान् सुदृढ यथा ॥ १०४ ॥
तथैव यानोर्ध्वभागेप्येवमेव नियोजयेत् ।
वरणनिर्याप्तमादाय नालानामुपरि क्रमात् ॥ १०५ ॥
पश्चात् यथाशास्त्र यन्त्र ( वर्षोपसंहार यन्त्र ) बनावे तो ठीक होगा । उस लोहे को कुट्टिणी
यन्त्र से पट्टिका के रूप में बना दे । २ बालिश्त लम्बा ६ बालिश्त ऊँचा एक एक में एक नाल जैसे संयुक्त
३३० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
कर सके ऐसे सुदृढ नालों को बनावे जितना ऊंचा विमान हो, विमान के आवरण के आगे नाल लगाने
के लिए तीन बालिश्त लम्बे नाल यथाक्रम लगावे यान के पीछे यथाक्रम कील के साथ लगावे वैसे ही
विमान के ऊपर भी लगावे चणनिर्यांस—चने का गोंद ? नाल के ऊपर क्रम से—॥ १०१-१०५ ॥
एकाङ्गुलप्रमाणेण सम्यक् संलेपयेत् ततः ।
वज्रगंभैद्रावकेण(न?) पुनस्तदुपरि क्रमात् ॥ १०६ ॥
त्रिवारं लेपयेत् तेन वज्रवत् सुदृढं भवेत् ।
तन्नालोपरि सर्वत्र द्वादशाङ्गुलमन्तरम् ॥ १०७ ॥
पृथक् पृथक् कल्पयित्वा सिञ्जीरवज्रमिश्रितम् ।
विन्यस्य यामार्धकालं पावकेन प्रतापयेत् ॥ १०८ ॥
द्रवप्राणानशक्त्याकर्षणदक्षान् जलस्य हि ।
अङ्गुष्ठमात्रान् पञ्चास्यमणीन् व्याघ्रवशंकरीन् ॥१०६॥
पूर्वोक्तसिञ्जीरवज्रोपरि सम्भारयेद् दृ
त्रिपुरविमान ] [ ३३१
विद्युत् यथाविधि धीरे से वेग से प्रविष्ट हो जावे उससे शब्द उत्पन्न होता है । मणिशक्ति वेग से
यथाक्रम आकर—॥ ११२-११५ ॥
विद्युच्छक्ति समाहृत्य नालानामुपरि क्रमात् ।
आसमन्ताद् व्यापयित्वा स्वस्मिन् सन्धारयेत् तत ॥११६॥
शक्तिद्वय मिलित्वाथ सर्वत्र मणिषु क्रमात् ।
प्रविश्य वेगात् प्राणनद्रवशक्तीर्विशेषत ॥ ११७ ॥
द्वेधा विभज्योर्ध्वमुख स्वतो भूत्वा यथाक्रमम् ।
विमानोपरि सर्वत्र व्यापयेथ स्वशक्ति ॥ ११८ ॥
तत्रत्यवातावरणमाक्रम्य स्वेन तेजसा ।
वायुमण्डलमध्यस्थद्रवप्राणनयो क्रमात् ॥ ११९ ॥
द्वेधा विभज्यते शक्ति तेन वायुर्लघुत्वताम् ।
प्राप्य मेघजलासारस्थितशक्तिद्वय क्रमात् ॥ १२० ॥
—विद्युत् शक्ति को लेकर क्रम से नालों के ऊपर सब ओर व्याप्त होकर अपने अन्दर धारण
कर ले फिर दोनों शक्तियां—मणिशक्ति और विद्युत् शक्ति मिल कर सर्वत्र मणियों में प्रविष्ट होकर
वेग से प्राणन द्रव शक्तियों को विशेषत. दो भागों में करके स्वतः ऊर्ध्वमुख होकर यथाक्रम विमान
के ऊपर सर्वत्र स्वशक्ति से व्याप्त जाती हैं वहां के वातावरण—वायु के घेरे को या वायुमण्डल पर अपने
तेज से आक्रमण कर उस वायुमण्डल के मध्य में स्थित क्रम से द्रव—पतलापन और प्राणन—गीलापन
रूप में स्थित शक्ति को दो रूपों में विभक्त कर देती है उससे वायु हल्केपन को प्राप्त हो मेघजलप्रपात
की दोनों शक्तियों—द्रव और प्राणन शक्तियों को क्रम से—॥ ११६-१२० ॥
वेगेनाकर्षितु शक्तो न भवेद् बलहीनत ।
वर्षमेघपुरोवातव्याप्तियत्नोपरि क्रमात् ॥ १२१ ॥
पतत्य*दातिवेगेन तदा तत्रत्य वायुना ।
ससर्ग प्रभवेत् पश्चात् परस्परविरोघत ॥ १२२ ॥
तस्य द्रवप्राणनरूपशक्तिद्वयमतः परम् ।
द्विधा विभज्यते तस्माद् वर्ष सशाम्यति क्रमात् ॥ १२३ ॥
तेन यानस्य विच्छित्तिर्न भवेत् तु कदाचन ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन यन्त्र वर्षोपहारकम् ॥ १२४ ॥
विमानोपरि संयोज्यमिति शास्त्रनिर्णयं ।
यन्ता सम्यग्विदित्त्वैतद्रहस्य यानमुत्सृजेत् ॥ १२५ ॥
अन्यथा निष्फल याति विमानञ्च विनश्यति ।
वर्षोपसहारयन्त्रमेवमुक्त्वा यथाविधि ॥ १२६ ॥
- छान्दसः पाठः पतति यदा ।
३३२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
सूर्यातपोपसंहारयन्त्रमथ प्रचक्षते ।
सूर्यातपोपसंहारयन्त्र शास्त्रविधानत ॥ १२७ ॥
आतपाशनलोहेन कर्त्तव्यमिति निश्चितम् ।
वेग से खींचने—लेने को समर्थ न हो सके बलहीन होने से । अतः बरसने वाले मेघ का
पुरोवात—पुर्वा हवा की व्याप्ति विमान के ऊपर क्रम से अतिवेग से जब गिरती है तब वहां की विमान
सम्बन्धी अनुकूल बनाई वायु के साथ संसर्ग-संघर्ष टक्कर हो जावे पश्चात् परस्पर विरोध से फिर उस
पूर्व वायु में जल की द्रवशक्ति-पतलापन की शक्ति और प्राशन शक्ति-गीलेपन की शक्ति दोनों पृथक्
पृथक् हो जाती हैं तब वर्षा शान्त हो जाती है इससे कभी भी विमान की क्षति न होगी, अतः सर्वप्रयत्न
से वर्षोपसंहार यन्त्र विमान के ऊपर लगाना चाहिये यह निश्चय है । विमान का चालक इस रहस्य को
भली प्रकार जान कर विमान को चलावे अन्यथा निष्फलता को प्राप्त होता है और विमान विनष्ट हो
जाता है । वर्षोपसंहार यन्त्र इस प्रकार यथाविधि कह कर सूर्यातपोपसंहार को अब कहते हैं, सूर्यातपो-
पसंहार यन्त्र शास्त्रविधान से आतपाशन लोहे से करना चाहिए यह निर्णय है ॥ १२१-१२७ ॥
तदुक्तं क्रियासारे—यह क्रियासार ग्रन्थ या प्रकरण में कहा है—
आतपाशनलोहेन सूर्यातपनिवारणम् ॥ १२८ ॥
तस्मादातपसंहारयन्त्र तेनैव कल्पयेत् ॥ इति
एतल्लोहस्वरूपं तु लोहतन्त्रे निरूपितम् ॥ १२६ ॥
तत्सङ्ग्राह्यात्र विधिवत् सग्रहेण निरूप्यते ।
दौर्वारिक कौशिकगारुड च सोभद्रक चान्द्रिक सर्पनेत्रम् ।
शृङ्गाटक सौम्यक चित्रलोह विश्वोदर पञ्चमुख विरिञ्चिम् ॥१३०॥
एतद्द्वादशलोहानि समभागान् यथाविधि ।
सङ्गृह्य पद्ममूषाया विनिक्षिप्य पुन क्रमात् ॥ १३१ ॥
टङ्कण सप्तभाग च पञ्चमाशं तु चोलिकम् ।
वराटिकाक्षारषट्क कुञ्जरं द्वादशांशकम् ॥ १३२ ॥
नवाशं सैकत शुद्ध कर्पूरं च चतुर्गुणम् ।
षोडशाशं तु त्रुटिल दशाश पौष्पिक क्रमात् ॥ १३३ ॥
आतपाशन लोहे से सूर्य के आतप—धूप का निवारण होता है अतः उससे ही आतपसंहार
यन्त्र बनावे । इस लोहे का स्वरूप कहा है लोहतन्त्र में, उसे लेकर विधिवत् संग्रह से कहा जाता है ।
दौर्वारिक, कौशिक, गारुड, सौभद्र, चान्द्रिक, सर्पनेत्र, शृङ्गाटक, सौम्यक, चित्रलोह, विश्वोदर, पञ्चमुख,
विरिञ्चि । ये १२ लोहे समान भाग लेकर यथाविधि पद्ममूषा यन्त्र में डाल कर पुनः सुहागा ७ भाग,
चोलिक-चौरिक-चोरपुष्पी या चोलकी-नारङ्गी ५ भाग, वराटिका क्षार-कौडी क्षार ६ भाग, कुञ्जर-पीपल
कण्टक चाप ? १२ भाग, शुद्ध सैकत—रेत या खाण्ड ? ६ भाग, कपूर ४ भाग, त्रुटिल—छोटी इलायची
या खस लुआ ? १६ भाग, पौष्पिक—पूषा—पाठा ? १० भाग ॥ १२८-१३३ ॥