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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 342, कुल 368 में से

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कापी संख्या २२—
(यह हस्तलेख कापीसंख्या २२ है त्रिपुरविमान का शेष प्रतीत होता है जो हस्तलेख कापी २३
वस्तुतः कापी २१) के पीछे जाना चाहिए—
जलान्तर्गमने पूर्वावरणस्य यथाविधि ॥१॥
सर्वचक्रोपसंहारं कृत्वा पश्चाद् यथाक्रमम् ।
चक्रद्रोण्यावरणं कुर्याद् यानादधः क्रमात् ॥२॥
जलनिबन्धनार्थाय आमूलाग्रं यथाविधि ।
कुर्यादावरणं क्षीरीपटतत्समुद्बढं यथा ॥२॥
वितस्त्यायामस्तत्तद्वद् वितस्त्यर्धघनं तथा ।
मण्डूकहस्तवत् कुर्याच्चक्राणि सुदृढान्यथा ॥४॥
चतुरङ्गुलगात्रांश्च द्वादशाङ्गुलमुन्नतान् ।
लोहदण्डान् कल्पयित्वा तेषामग्रे यथाविधि ॥५॥
मण्डूकहस्तचक्राणि योजयेत् कीलकैस्सह ।
(त्रिपुर विमान के ) जल के अन्दर जाने के निमित्त पूर्व आवरण—पृथिवी पर चलने वाले
आवरण के सब चक्रों का उपसंहार—संकोच करके उनके गतिक्रम को रोककर पश्चात् यथाक्रम
विमान के नीचे चक्रद्रोणी चक्रों के आधारस्थान का आवरण करे जल के बान्धने के लिये आगे पीछे
तक यथाविधि क्षीरीवृक्षों के दूध का गोन्द से बने पट से सुदृढं आवरण करे । १ बालिश्त लम्बे चौडे
आधे बालिश्त मोटे चक्र मेण्डक के हाथ के समान बनावे, ३ अङ्गुल ऊंचे लम्बे लोहदण्डों को बनाकर
उनके आगे यथाविधि मण्डूकहस्तचक्रों को कीलों से युक्त करे—॥१-५॥
सर्वत्र चक्रद्रोणीना पार्श्वयोरुभयोरपि ॥६॥
द्रोण्यन्तर्गतचक्राणां सन्धिस्थानसमानत ।
संस्थापयेल्लोहदण्डान् सचक्रांश्च यथाविधि ॥७॥
सुदृढान् सरलान् चक्रकीलकान्तर्गतान्यथ ।
तथा दण्डद्वयं चक्रसयुत कीलकैस्सह ॥८॥
आहृत्य पूर्वोक्तचक्रदण्डसन्धिमुखान्तरात् ।
विमानपुरतस्तद्वत्पार्श्वयोरुभयोरपि ॥६॥