सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 352, कुल 368 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 352

त्रिपुरविमान ] [ ३२६
१२ भाग, सुधारक-सुधार कपूर ७ भाग, पुनः सुहागा ८ भाग, सैकत-श्वेतकण्टकारी का सत्त्व या रस
या रेत ? ४ भाग, चूना १२ भाग, ककक्षी खरबूजा के बीज या तैल ३ भाग, रुरुक-हरिणशृङ्ग या
रुरुक कोई ओषधि या पारा ५ भाग, पटोल-परवल ५ या २७ भाग, बाष्पु धिक-समुद्रफेन या द्रोणीलवण १
भाग ? ये सात पदार्थ मिला कर मूषामुख कृत्रिम बोतल में रख दे पद्माकुण्ड में ५१२ दर्जे कीउष्णता
प्रमाण से—॥ ६१-६५ ॥
गालयित्वातिवेगेन त्रिमुखीभस्त्रिकामुखात् ।
समीकरणावन्त्रास्ये तद्रस पूरयेच्छनै ॥ ६६ ॥
एव कुतैरत्यन्तमुदु मधुवर्ण दृढ रुचम् ।
वर्षविच्छेदनकर वर्षवातातपाग्निभिः ॥ ६७ ॥
अभेद्यमुष्णगर्भ च विषनाशकर शिवम् ।
जलद्रवप्राणनाशशक्त्याकर्षणसदीक्षितम् ॥ ६८ ॥
प्रभवेत् कौशिक लोह सर्वजन्तुविषापहम् ।
एतल्लोहेन कर्तव्य यन्त्र वर्षोपसहारकम् ॥ ६६ ॥
तुलसीरुक्मपुङ्खाग्नित्रिजटापञ्चकण्टकी ।
एतेषा बीजतैलेन लोह सन्ताप्य शास्त्रत ॥ १०० ॥
त्रिमुखी भस्त्रामुख से वेग से गला कर समानीकरण यन्त्र के मुख में उस पिंघले रस को धीरे
से भर दे ऐसा करने पर अत्यन्त मृदु मधु रंगवाला दृढ चमकदार वर्षा का विच्छेद करने वाला वर्षा वायु
धूप से भेदन न करने योग्य उष्णस्वभाव विषनाशक कल्याणकर जल का द्रव (पतलापन) प्राणन (गीलापन)
नामक शक्तियों के आकर्षण की शक्ति से युक्त कौशिक लोहा सब जन्तुओं के विष का नाशक है । इस
लोहे से वर्षोपसंहारक यन्त्र बनाना चाहिये । तुलसी, रुक्म, धतूरा, नागकेसर ?, शरपुंखा, चित्रक,
त्रिजटा—बिल्व, पञ्चकण्टकी-? के बीजों के तेल से लोहे को गरम करके—॥ ६६-१०० ॥
पश्चाद् यन्त्र यथाशास्त्र कल्पयेन्नान्यथा भवेत् ।
तल्लोह कुट्टिणीयन्त्रात् पट्टिका कारयेत् तत. ॥ १०१ ॥
वितस्तिद्वयमायाम षड्वितस्त्युन्नत तथा ।
एकै कस्मिन्नेकनाल यथा संयोजितु भवेत् ॥ १०२ ॥
कल्पयेत् सुदृढान् नालान् यावद्यानोन्नत तथा ।
विमानावरणास्याग्रे नालसंयोजनाय हि ॥ १०३ ॥
वितस्तित्रयमायामानालान् पश्चाद् यथाक्रमम् ।
सन्धायेदामसन्तात् सकीलान् सुदृढ यथा ॥ १०४ ॥
तथैव यानोर्ध्वभागेप्येवमेव नियोजयेत् ।
वरणनिर्याप्तमादाय नालानामुपरि क्रमात् ॥ १०५ ॥
पश्चात् यथाशास्त्र यन्त्र ( वर्षोपसंहार यन्त्र ) बनावे तो ठीक होगा । उस लोहे को कुट्टिणी
यन्त्र से पट्टिका के रूप में बना दे । २ बालिश्त लम्बा ६ बालिश्त ऊँचा एक एक में एक नाल जैसे संयुक्त