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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 337

३१४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
कुर्याच्चित्रविचित्राणि गृहाण्यस्मिन् दृढानि हि ।
यथा दृश्यं परेषां स्यात् तथावरणकीलकैः ॥ ११२ ॥
कवाटान् स्थापयेत् तद्वद् वातायनमुखानपि ।
सर्वत्र गृहमध्येष्टदिक्षु शास्त्रानुसारतः ॥ ११३ ॥
कीलसञ्चालनेनाशु गृहसम्भ्रमणं यथा ।
भवेत् तथावृत्तचक्रकीलकान् स्थापयेत् क्रमात् ॥ ११४ ॥
प्रसारणतिरोधानं चक्राणां प्रभवेद् यथा ।
तथा कीलसन्धानं कृत्वा पश्चाद् यथाक्रमम् ॥ ११५ ॥
चालक यात्रियों के बैठने के अर्थ और सामग्री रखने के लिए, जैसे कर्ता ने सङ्कल्पित किया
वैसे ही विधिवत् क्रम से चित्र विचित्र घर इसमें स्थिर करे, जैसे दूसरों का दृश्य सामने आ जावे ऐसे
आवरण कीलों से किवाड लगावे खिडकियों के मुख भी सर्वत्र घर के मध्य आठ दिशाओं में शास्त्रानुसार
कील चलाने से शीघ्र घर का भ्रमण जिससे हो जावे वैसे घूमने वाले चक्रों की कीलें लगावे प्रसारण-
खोलने और तिरोधान-बन्द होना चक्रों का हो जावे ऐसे कील को सन्धान करके यथाक्रम-॥१११-११५॥
चक्राणि स्थापयेद् द्रोणीद्वयमध्यस्थसन्धिषु ।
सम्पूरणाकर्षणार्थं तथा सञ्चोदनाय हि ॥ ११६ ॥
वाताकर्षणनालानि सचक्राणि तथैव हि ।
भस्त्रिकामुखयुक्तानि विस्तृतास्यान्यथाक्रमम् ॥ ११७ ॥
विशद्विहाय सन्धिद्वयकेन्द्रान्यथाविधि ।
संस्थापयेत् ततस्तन्मुखपुरोभागत्तो मृदु ॥ ११८ ॥
पुरोवाताघातचक्राण्यपि सर्वत्र कीलकैः ।
अध प्रसारणे वायुं तद्वदूर्ध्वप्रचोदने ॥ ११९ ॥
द्विमुखीनालचक्राणि यानावृत्तप्रदेशके ।
त्रिशद्वितस्त्यन्तराय कृत्वा शास्त्रप्रमाणतः ॥ १२० ॥
दो द्रोणियों की मध्यस्थ सन्धियों में सम्पूरण और आकर्षण के अर्थ तथा प्रेरणा देने के लिए
चक्रसहित वाताकर्षण नाल भस्त्रामुख दो सन्धियों के केन्द्र २० विस्तार में छोड़ कर उनके मुख के
सामने भाग संस्थापित करे । सामने के वायु को आघात देने वाले चक्रों सर्वत्र कीलों से वायु को नीचे
लाने ऊपर प्रेरित करने में दो मुख वाले नाल चक्रों को विमान के घिरे या घूमने वाले प्रदेश में ३०
बालिश्त अन्तर छोड कर शास्त्र प्रमाण से - ॥ ११६-१२० ॥
सर्वत्र स्थापयेत् पश्चाद् यानाधोभागदेशके ।
वेणीतन्त्रीसमायुक्तानयःपिण्डान् यथाक्रमम् ॥ १२१ ॥
विमानाकाशगमनकाले संयोजितु क्रमात् ।
अष्टदिक्षु तथा मध्ये कीलकान् नव कल्पयेत् ॥ १२२ ॥