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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 354

त्रिपुरविमान ] [ ३३१
विद्युत् यथाविधि धीरे से वेग से प्रविष्ट हो जावे उससे शब्द उत्पन्न होता है । मणिशक्ति वेग से
यथाक्रम आकर—॥ ११२-११५ ॥
विद्युच्छक्ति समाहृत्य नालानामुपरि क्रमात् ।
आसमन्ताद् व्यापयित्वा स्वस्मिन् सन्धारयेत् तत ॥११६॥
शक्तिद्वय मिलित्वाथ सर्वत्र मणिषु क्रमात् ।
प्रविश्य वेगात् प्राणनद्रवशक्तीर्विशेषत ॥ ११७ ॥
द्वेधा विभज्योर्ध्वमुख स्वतो भूत्वा यथाक्रमम् ।
विमानोपरि सर्वत्र व्यापयेथ स्वशक्ति ॥ ११८ ॥
तत्रत्यवातावरणमाक्रम्य स्वेन तेजसा ।
वायुमण्डलमध्यस्थद्रवप्राणनयो क्रमात् ॥ ११९ ॥
द्वेधा विभज्यते शक्ति तेन वायुर्लघुत्वताम् ।
प्राप्य मेघजलासारस्थितशक्तिद्वय क्रमात् ॥ १२० ॥
—विद्युत् शक्ति को लेकर क्रम से नालों के ऊपर सब ओर व्याप्त होकर अपने अन्दर धारण
कर ले फिर दोनों शक्तियां—मणिशक्ति और विद्युत् शक्ति मिल कर सर्वत्र मणियों में प्रविष्ट होकर
वेग से प्राणन द्रव शक्तियों को विशेषत. दो भागों में करके स्वतः ऊर्ध्वमुख होकर यथाक्रम विमान
के ऊपर सर्वत्र स्वशक्ति से व्याप्त जाती हैं वहां के वातावरण—वायु के घेरे को या वायुमण्डल पर अपने
तेज से आक्रमण कर उस वायुमण्डल के मध्य में स्थित क्रम से द्रव—पतलापन और प्राणन—गीलापन
रूप में स्थित शक्ति को दो रूपों में विभक्त कर देती है उससे वायु हल्केपन को प्राप्त हो मेघजलप्रपात
की दोनों शक्तियों—द्रव और प्राणन शक्तियों को क्रम से—॥ ११६-१२० ॥
वेगेनाकर्षितु शक्तो न भवेद् बलहीनत ।
वर्षमेघपुरोवातव्याप्तियत्नोपरि क्रमात् ॥ १२१ ॥
पतत्य*दातिवेगेन तदा तत्रत्य वायुना ।
ससर्ग प्रभवेत् पश्चात् परस्परविरोघत ॥ १२२ ॥
तस्य द्रवप्राणनरूपशक्तिद्वयमतः परम् ।
द्विधा विभज्यते तस्माद् वर्ष सशाम्यति क्रमात् ॥ १२३ ॥
तेन यानस्य विच्छित्तिर्न भवेत् तु कदाचन ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन यन्त्र वर्षोपहारकम् ॥ १२४ ॥
विमानोपरि संयोज्यमिति शास्त्रनिर्णयं ।
यन्ता सम्यग्विदित्त्वैतद्रहस्य यानमुत्सृजेत् ॥ १२५ ॥
अन्यथा निष्फल याति विमानञ्च विनश्यति ।
वर्षोपसहारयन्त्रमेवमुक्त्वा यथाविधि ॥ १२६ ॥

  • छान्दसः पाठः पतति यदा ।