सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 355, कुल 368 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 355

३३२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
सूर्यातपोपसंहारयन्त्रमथ प्रचक्षते ।
सूर्यातपोपसंहारयन्त्र शास्त्रविधानत ॥ १२७ ॥
आतपाशनलोहेन कर्त्तव्यमिति निश्चितम् ।
वेग से खींचने—लेने को समर्थ न हो सके बलहीन होने से । अतः बरसने वाले मेघ का
पुरोवात—पुर्वा हवा की व्याप्ति विमान के ऊपर क्रम से अतिवेग से जब गिरती है तब वहां की विमान
सम्बन्धी अनुकूल बनाई वायु के साथ संसर्ग-संघर्ष टक्कर हो जावे पश्चात् परस्पर विरोध से फिर उस
पूर्व वायु में जल की द्रवशक्ति-पतलापन की शक्ति और प्राशन शक्ति-गीलेपन की शक्ति दोनों पृथक्
पृथक् हो जाती हैं तब वर्षा शान्त हो जाती है इससे कभी भी विमान की क्षति न होगी, अतः सर्वप्रयत्न
से वर्षोपसंहार यन्त्र विमान के ऊपर लगाना चाहिये यह निश्चय है । विमान का चालक इस रहस्य को
भली प्रकार जान कर विमान को चलावे अन्यथा निष्फलता को प्राप्त होता है और विमान विनष्ट हो
जाता है । वर्षोपसंहार यन्त्र इस प्रकार यथाविधि कह कर सूर्यातपोपसंहार को अब कहते हैं, सूर्यातपो-
पसंहार यन्त्र शास्त्रविधान से आतपाशन लोहे से करना चाहिए यह निर्णय है ॥ १२१-१२७ ॥
तदुक्तं क्रियासारे—यह क्रियासार ग्रन्थ या प्रकरण में कहा है—
आतपाशनलोहेन सूर्यातपनिवारणम् ॥ १२८ ॥
तस्मादातपसंहारयन्त्र तेनैव कल्पयेत् ॥ इति
एतल्लोहस्वरूपं तु लोहतन्त्रे निरूपितम् ॥ १२६ ॥
तत्सङ्ग्राह्यात्र विधिवत् सग्रहेण निरूप्यते ।
दौर्वारिक कौशिकगारुड च सोभद्रक चान्द्रिक सर्पनेत्रम् ।
शृङ्गाटक सौम्यक चित्रलोह विश्वोदर पञ्चमुख विरिञ्चिम् ॥१३०॥
एतद्द्वादशलोहानि समभागान् यथाविधि ।
सङ्गृह्य पद्ममूषाया विनिक्षिप्य पुन क्रमात् ॥ १३१ ॥
टङ्कण सप्तभाग च पञ्चमाशं तु चोलिकम् ।
वराटिकाक्षारषट्क कुञ्जरं द्वादशांशकम् ॥ १३२ ॥
नवाशं सैकत शुद्ध कर्पूरं च चतुर्गुणम् ।
षोडशाशं तु त्रुटिल दशाश पौष्पिक क्रमात् ॥ १३३ ॥
आतपाशन लोहे से सूर्य के आतप—धूप का निवारण होता है अतः उससे ही आतपसंहार
यन्त्र बनावे । इस लोहे का स्वरूप कहा है लोहतन्त्र में, उसे लेकर विधिवत् संग्रह से कहा जाता है ।
दौर्वारिक, कौशिक, गारुड, सौभद्र, चान्द्रिक, सर्पनेत्र, शृङ्गाटक, सौम्यक, चित्रलोह, विश्वोदर, पञ्चमुख,
विरिञ्चि । ये १२ लोहे समान भाग लेकर यथाविधि पद्ममूषा यन्त्र में डाल कर पुनः सुहागा ७ भाग,
चोलिक-चौरिक-चोरपुष्पी या चोलकी-नारङ्गी ५ भाग, वराटिका क्षार-कौडी क्षार ६ भाग, कुञ्जर-पीपल
कण्टक चाप ? १२ भाग, शुद्ध सैकत—रेत या खाण्ड ? ६ भाग, कपूर ४ भाग, त्रुटिल—छोटी इलायची
या खस लुआ ? १६ भाग, पौष्पिक—पूषा—पाठा ? १० भाग ॥ १२८-१३३ ॥