बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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समाहृत्याय सम्मेल्य बध्नाति सुदृढं यथा ॥ १५४ ॥
पूर्वोत्तरावरणयोः सन्धिसम्मेलनं यथा ।
विद्युदाकर्षणेनाशु प्रभवेत् सर्वतः क्रमात् ॥ १५५ ॥
तथा पञ्चास्यमयूरकीलकानि नियोजयेत् ।
सन्धिसम्मेलनं तेन प्रभवेन्नात्र संशयः ॥ १५६ ॥
तत्पृथक्करणार्थाय पुनः कालानुसारतः ।
सर्वत्र शक्त्यपकर्षणकीलान्यपि पूर्ववत् ॥ १५७ ॥
शक्तिप्रचोदनयन्त्रेष्वेव संस्थापयेत् क्रमात् ।
पश्चात् ऊर्ध्वमुख से सर्पास्य कील मार्ग से उस शक्ति को वेग से प्रेरित करे उससे स्वयं कील
के अन्दर से वह कील हाथ सर्वत्र अनुलोम विलोम से ऊपर आकर वेग से दो आवरणों की कीलों को
पकड कर मिला कर सुदृढ बान्धता है जिससे पूर्व और उत्तर आवरण में सन्धि का सम्मेलन—मेल
संयोग विद्युत् के आकर्षण से शीघ्र सब ओर क्रम से हो जावे वैसे पञ्चास्य—पञ्चमुख वाली
मायूर कीली मोर के आकार के पेंच को लगावे, उससे सन्धि सम्मेलन हो जावे इसमें संशय नहीं ।
फिर कालानुसार अलग करने के लिए सर्वत्र शक्त्याकर्षण—शक्ति को खींचने वाली कीलों को भी पूर्व
की भांति शक्तिप्रेरक यन्त्रों में ही क्रम से संस्थापित कर दे ॥ १५२-१५७ ॥
१५८ का पूर्वार्द्ध विषय अधूरा रहा, अतः कुछ श्लोक मध्य में अन्य होकर पश्चात् हस्तलेख
कापी संख्या २२ पश्चात् २१ वस्तुतः कापी २३ का भाग (मैटर) होना चाहिये ।