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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 345

३२२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
युगपत्प्रभवेत्सम्यक् पृथिव्याकाशमार्गतः ।
यथेष्टं वेगतश्चावरणौ यन्तु भवेत् स्वतः ॥३०॥
शक्ति की प्रेरणा से कीलचक्रों का भ्रमण जैसे हो वैसे शक्तिस्थान से—मीटर तार को लेकर
यथाक्रम चक्र की कील के मूलतक भली प्रकार प्रेरित करे उससे उक्त प्रमाण से विद्युत् का फैलाव करे,
उस शक्तिप्रेरण से कीलचक्रों का भ्रमण होवे । इससे पृथक् पृथक् पृथिवी और आकाश के मार्ग सम्बन्धी
आवरणों का भेद एक साथ हो जावे फिर यथेष्ट दोनों आवरणों में वेग से जाना हो सके ॥२६-३०॥
पश्चाद् द्वितीयावरणोपरि शास्त्रप्रमाणतः ।
यन्त्रूपवेशनार्थाय वस्तुप्रक्षेपणाय च ॥३१॥
गृहाणि कल्पयेच्चित्रविचित्राणि यथाक्रमम् ।
वातायनकवाटाश्च पूर्वावरणवत्क्रमात् ॥३२॥
यथादृश्य भवेद् बाह्यं कर्तव्यास्तत्र(च) तथा ।
पश्चादावरणकुड्याना समन्ताद् यथाक्रमम् ॥३३॥
सर्वत्र कारयेत् पीठावरणाग्रे दृढ यथा ।
वितस्तिसप्तकोन्नत्य गात्रे त्वर्धवितस्तिकम् ॥३४॥
सर्वत्र कुड्यप्रमाणमेव शास्त्रे निरूपितम् ।
तृतीयावरणाद् विद्युत्सङ्ग्रहार्थं यथाविधि ॥३५॥
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