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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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त्रिपुरविमान ] [ ३२५
अत्यन्तलघुवातातपाद्यैरच्छेद्यमेव च ।
प्रभवेद् वारुणं लोहं सुदृढं सुमनोहरम् ॥६०॥
अथास्यवातनिरसनयन्त्रं तेन प्रकल्पयेत् ।
आदौ कुर्याल्लोहशुद्धिं पश्चादाकारकल्पनम् ॥६१॥
बारिपङ्क‡—सुगन्धवला का मूल ? विषारि—करञ्जुवा, सुहागा, जालिका—लोहा, अम्ल—
अम्लवेतस, विषोदर—विषनिन्दु—कुचला ?, वारिपण्डकक्षार-अभ्रकक्षार या समुद्र लवण ? या जलक्षार,
सामुद्रिक लवण ५ भाग, सप्तकशोण—सप्तशोण—७ भाग सिन्दूर, मजीठ, गोधर—मनःशिला ?
वारुणास्यक—वरना वृक्ष के मूल का सत्त्व ?, पार्वण अरुण—अर्क ?, फाक्तुण्ड—काला अगर, भूधर—
पर्वत ?, वारुणाभ्रक श्वेताभ्रक, क्षार—सज्जीक्षार, कुण्डलीमूल - गुडूचीसत्त्व या कौञ्चमूल ?, लोधर—
लोध्र, वारिकुङ्मल—सुगन्ध वाला फूल, शारिकारस—शालिचावल का रस या अनन्तमूल का रस ? षष्ठय,
बाणसहोदर ? बार्डिपण्डवक—सीसा ५ भाग, स्वर्णमाक्षिक ८ भाग, वातक—पटशण या मूर्वालता, किणि-
कोदर–कंगुनी मालकंगनी ? बालुका-रेता, अञ्जन–सुरमा या रसौंत, कुक्कुटाण्डक–शलमली बीज या मुर्गी के
अण्डे ?, कार्मु खीमल-कार्मु कीमल —खदिरमल—कत्था, लोध्र, बीरुरु रस ? सिंहिकामुख—कटेली सत्त्व
या मूल, कूर्मजह्व—कोई ओषधि ?, मसूरिक ? इन सब शुद्ध वस्तुओं को मूषा मृत्तिकादि से बनी
विशिष्ट बोतल में भरकर पद्मामुखकुण्ड में यथाविधि रखकर पांचमुखवाली भस्त्रा से ७०० दर्जे की उष्णता
वेग से गलाकर यन्त्रमुख में उस द्रवरस को धीरे से भरकर ऋजुकरणयन्त्र में स्थित कीलों से उस रस
को क्रम से बराबर किया हुआ मृदुल धूम्ररंगवाला, अत्यन्त हलका वायु धूप आदि से अच्छेद्य हो जावे
यह वारुण लोहा अच्छा दृढ सुन्दर है अथास्यवातनिरसनयन्त्र इससे बनाना चाहिए, प्रथम लोहशुद्धि
करे पश्चात् आकाररचना करे ॥५३-६१॥
शुद्धिक्रममुक्तं क्रियासारे—शुद्धिक्रम क्रियासार में कहा है—
शुण्डीद्रावकात् सम्यक् पाचनायन्त्रतः क्रमात् ।
पाचयेत् त्रिदिनं पश्चात् कुट्टिणीयन्त्रतः पुन ॥६२॥
पटवत्कारयेत् सम्यक् पट्टिका सुदृढं यथा ।
वातारिकन्दनिर्यास कृत्वो पश्चाद् यथाविधि ॥६३॥
तत्पट्टिकोपर्य्यंगुलप्रमाणेन समग्रतः ।
विलेप्य तापनायन्त्रे तापयेत् अधर्मामात्रकम् ॥६४॥
पश्चात् संगृह्य विधिवन्मृत्सार वागुर तथा ।
जन्मिथितफणिक्षीर समभाग यथाक्रमम् ॥६५॥
भाण्डे निक्षिप्य विधिवत्पाचनायन्त्रतः क्रमात् ।
पाचयेद्दिनमेकं पश्चात् संग्राहयेच्छनैः ॥६६॥
‡ बरपिङ्क
† क्रिया–व्या छान्दस इकारलोप 'यन्त्राय्यान्नाक्रमम्' की भाँति ।