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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 340

त्रिपुरविमान ] [ ३१७
जितनी संख्या हो उतने ही लगावे यथेष्ट सर्वत्र नीचे मुख वाली दो कीलों के लगाने को शास्त्रानुसार
कीली से ग्रहण करने योग्य हस्तचक्र—मण्डूकाइस्त चक ? भी क्रम से कील पंक्ति के अनुसार दोनों ओर
यथाक्रम कीलें स्थापित करके उनके अन्दर से चक्रसहित तारों को लगावे, विद्युत् स्थान मुख से उनमें
विद्युत् का संयोग जिससे हो जावे ऐसे सरल बडे चक्र की कील विद्युत् पात्र के मुख में डेढ बालिश्त
अन्दर से या अन्तर से ? स्थापित करके उससे आरम्भ कर नालचक्र के ऊपर क्रम से सुसूक्ष्म मृदु शुद्ध
कनिष्ठा अंगुली के समान—॥ १३८-१४४ ॥
पट्टिका योजयेत् कीलकान्तं सम्यग्यथाविधि ।
पश्चात् कीलपकतीना मुखसन्धिषु शास्त्रतः ॥ १४५ ॥
व्यत्यस्तहस्तवद् वेगादूर्ध्वमागत्य सर्वतः ।
पूर्वोत्तरावरणकीलक्रमादृत्य पंक्ति । १४६ ॥
अन्योन्यं योजयित्वाथ बध्नीयात् सुदृढं यथा ।
❊ततोर्ध्वमुखसर्पाख्यकीलकानि पृथक् पृथक् ॥ १४७ ॥
संस्थापयेत् ततस्सर्वकीलक्रमणाय हि ।
पूर्वोक्तविद्युत्पात्रस्य पुरोभागस्थकीलकात् ॥ १४८ ॥
तदन्तर्गतबृहच्चक्रभ्रमणं भवेद् यथा ।
तथा प्रसारयेद् विद्युच्छक्तिं तदुपरि क्रमात् ॥ १४६ ॥
शक्तिवेगानुसारेण तच्चक्रभ्रमणं भवेत् ।
एतच्चक्रस्य भ्रमणं दशवारं यथा भवेत् ॥ १५० ॥
तत्पुरोभागस्थचक्रभ्रमणं वेगतो भवेत् ।
तेन नालस्थचक्राणि सर्वाण्यपि यथाक्रमम् ॥ १५१ ॥
भ्रामयन्ति वेगेन कीलपंक्तिमुखावधि ।
—पट्टिका लगावे कील के अन्त में यथाविधि, पश्चात् कीलपंक्तियों के मुख सन्धिस्थानों में
शास्त्र से उलटे हाथ वाले वेग से ऊपर सर्वतः आकर पूर्वोत्तर के आवरण की कीली को लेकर पंक्ति से
एक दूसरे में मिला कर सुदृढ बान्ध दे फिर ऊर्ध्वमुख सर्पाख्य कीलें पृथक् पृथक् संस्थापित करे फिर सब
कीलों के भ्रमण के लिए पूर्वोक्त विद्युत्पात्र के सम्मुख भाग में वर्तमान कील से उसके अन्दर के बड़े
चक्र का भ्रमण जिससे हो जावे वैसे उसके ऊपर विद्युत् शक्ति को प्रसारित करे शक्ति के वेगानुसार
वह चक्रभ्रमण हो जावे । इस चक्र का भ्रमण दश बार जिससे हो जावे । उसके सामने वाले चक्र का
भ्रमण वेग से हो इससे नालस्थ सब चक्र भी कीली पंक्ति के मुख तक वेग से घूमते हैं ॥ १४५-१५१ ॥
पश्चादूर्ध्वमुखतस्सर्पास्यकीलक्रमागतं ॥ १५२ ॥
तच्छक्तिं चोदयद् वेगात् तेन कीलकान्तरात् स्वयम् ।
तत्कीलहस्तस्सर्वत्र अनुलोमविलोमत ॥ १५३ ॥
ऊर्ध्वमागत्य वेगेनावरणद्वयकीलकान् ।
❊ तत ऊर्ध्वं० एकादेशसन्धिरार्थंः ।