बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 346त्रिपुराविमान ] [ ३२१
त्रिपुराविमान ] [ ३२१
हस्तात् संगृह्य तत्रत्यवेणीतन्त्रि प्रकर्षयेत् ॥४०॥
विमान के सामने वाले भाग में ध्वजस्तम्भ सुदृढ स्थापित करे, उस स्तम्भ के मूल में दो
घण्टे भी कांसे लोहे के बने हुए चालक और यात्रियों के कालसङ्केत के अर्थ घण्टानाद् करने को
वहां सरल स्थापित करे, वेणीतन्त्रो — चिन्ता सूचिका ❄ डोरी जैसी तार कीलसहित को लेकर घर—कमरे
की भित्ति के ऊपर क्रम से सब सरल जगह लगावे । अत्यन्त अनर्थकार्ये जब जहां हो वेणीतन्त्रि को
खींच ले—॥ ३७–४० ॥
तेन विज्ञायते कृत्य शीघ्रं यानाधिकारिणा ।
ततो यानाधिकारी तु वेगादागत्य तद् गृहम् ॥ ४१ ॥
विचार्य तत्रत्यानर्थकारणं न्यायतस्स्वयम् ।
समाधानं करोत्यस्माद् वेणीतन्त्रि नियोजयेत् ॥४२॥
भाषाकर्षणयन्त्राणि भावाकर्षणकान्यपि ।
दिक्प्रदर्शकयन्त्राणि कालप्रमाकान्यपि ॥ ४३ ॥
शीतोष्णप्रमापकयन्त्राण्यपि विशेषतः ।
सतन्त्रीकीलकं सम्यक् पूर्वपश्चिमयो क्रमात् ॥ ४४ ॥
सस्थापयेत् ततोऽत्यन्तवातवर्षातपादिभि ।
अत्यन्तोपद्रव व्योमयानस्य प्रभवेद् यदि ॥ ४५ ॥
तन्निवारयितु यन्त्रत्रय पश्चाद् यथाविधि ।
इस से यानाधिकारी द्वारा जान लिया जाता है, तब वह यानाधिकारी शीघ्र उस कमरे में
आकर और अनर्थकारण का युक्ति से विचार कर समाधान करता है अतः वेणीतन्त्री लगानी चाहिए ।
भाषण को खींचने वाले यन्त्र, भाव को खींचने वाले यन्त्र, दिशाप्रदर्शक यन्त्र, कालमापक यन्त्र, शीत
और उष्णता को मापने वाले यन्त्र भी विशेषतः तारों और कीलों के साथ आगे पीछे लगावे— संस्थापित
करे । फिर अत्यन्त वात वर्षा आतप — धूप आदि से विमान का अत्यन्त बिगाड हो तो उसके निवारणार्थ
तीन यन्त्र पीछे यथाविधि —॥४१-४५॥
पूर्वपश्चिमयोश्चैव तथा शिखरपार्श्वयोः ॥ ४६ ॥
सस्थापयेत् क्रमात् सम्यक् पृथक् पृथग्यथाक्रमम् ।
श्लोकस्थादिपदात् सम्यग्घिमसंहारकादय ॥ ४७ ॥
प्रोक्तास्स्तु पालनार्थाय विमानस्य यथाक्रमम् ।
उक्त हि यन्त्रसर्वस्वे यन्त्रत्रय यथाविधि ॥ ४८ ॥
सर्वेषां सुखबोधाय तान्येवात्र प्रचक्षते ।
श्वास्यवातनिरसनयन्त्र तद्वन्मनोहरम् ॥ ४६ ॥
❄ "वेण् चिन्तायाम्" ( भ्वादि० )