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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 343

३२० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
सलिलोत्क्षेपणार्याय स्थापयेत् कीलकं दृढम् ।
शक्तिसञ्चोदनादादिकीलकभ्रमणं भवेत् ॥१०॥
—सर्वत्र चक्रद्रोणियों के दोनों पाश्र्वों में भी। द्रोणियों के भीतरी चक्रों के सन्धिस्थान
की सहायता से सरल चक्रकीलों के अन्तर्गत चक्रसहित लोहदण्डों को संस्थापित करे । चक्र-
संयुक्त कीलों से दो दण्डों को पूर्वोक्त चक्रदण्डसन्धिमुख के अन्दर से निकालकर विमान के
सामने से दोनों पाश्र्वों से जल के हटाने के लिये कीलों से दृढ लगावे, इस प्रकार शक्तिप्रेरणा से आदि
कीलों—पेचों का भ्रमण होगा ॥६—१०॥
तच्चक्रवेगात्सर्वेषां चक्राणां भ्रमणं भवेत् ।
जलस्योत्क्षेपणा तेन ह्यासस्रन्ताद् यथाक्रमम् ॥११॥
प्रभवेदतिवेगेन तस्माद् यान. प्रधावति ।
एव क्रमेण विधिवदूर्ध्वावरणपाश्र्वयो ॥१२॥
सन्धारयेन्नलाघातचक्राणि सुदृढान्यथ ।
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