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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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त्रिपुराविमान ] [ ३१५
वितस्तिसप्तकोन्नत्यं प्रथमावरणं दृढम् ।
कल्पयित्वाथ विधिवद् यावदावरणं भवेत् ॥ १२३ ॥
तावत्सर्वत्र सुदृढान् नलिकाकीलान् (?) वरान् ।
ग्रहणार्थं मध्ययानपीठस्य सुदृढं यथा ॥ १२४ ॥
कृत्वा वितस्तिदशकान्तरं सर्वत्र शास्त्रतः ।
विशद्वितस्त्यन्तरायाम मध्यदेशे तथैव हि ॥ १२५ ॥
सर्वत्र विमान के नीचले भाग वाले देश में स्थापित करे, वेणी तन्त्री—वेणी के आकार के
तारों या चिन्तासूचक तारों को जोड़पिण्डों को यथाक्रम विमान के आकाश गमन काल में जोडने को
क्रम से ८ दिशाओं में तथा मध्य में उत्तम ६ कीलों को मध्य यान पीठ के ग्रहणार्थ शास्त्रानुसार १०
बालिश्त का अन्तर करके मध्य देश में २० वितस्ति अन्तर पर लम्बा—॥ १२१-१२५ ॥
स्थापयेत् सुदृढं पश्चात् कीलकाना मुखान्तरे ।
सचक्रतन्त्रीविधिवद् योजयेत् सुदृढं यथा ॥ १२६ ॥
प्रतिकीलमुखे तन्त्र्या चञ्चुपुटद्वयं यथा ।
न्यग्भावेनोर्ध्वमुखतः विस्तृतं स्याद् यथा तथा ॥ १२७ ॥
सम्मे (म्मि ?) लीकरणं पूर्वापरभागद्वयो क्रमात् ।
यथा भवेत् तथा तन्त्रीकीलकान् परिकल्पयेत् ॥ १२८ ॥
न्यग्गुलीकरणं चैव तद्वद्विकसनं यथा ।
छत्रीवत् प्रभवेच्चक्रकीलकान् कल्पयेत्तथा ॥ १२६ ॥
न्यग्गुलीकरणे तेषामुपरिष्टात् समन्ततः ।
प्रभवेत् पटावरणं यथा चोर्ध्वमुखान्तरात् ॥ १३० ॥
—सुदृढ स्थापित करे । पश्चात् कीलों के मुख के अन्दर विधिवत् चक्रसहित दो तारों को सुदृढ
जोडे, प्रत्येक कील के मुख में तार में दो चञ्चुपुट जैसे ऐसे हो अलग होने से—पुट खुलने से ऊर्ध्व-
मुख से विस्तृत हो जावे मिलाना पूर्व पिछले दोनों भागों का क्रम से जिससे वैसे तारों की कीलों
को लगावे । संकुचित करना बन्द करना और उसी भांति विकसित करना खोलना छत्री की भांति हो
ऐसे चक्रों की कीलों को बनावे, सङ्कोच करने बन्द करने में उनका ऊपर पटावरण समान हो जिससे
ऊर्ध्वमुख अन्दर से युक्त करे ॥ १२६-१३० ॥
तथा पट चोर्ध्वमुखे योजयेत् कीलकैससह ।
तिरोधान पटस्याथ यथा स्याद् गृहविस्तृते ॥ १३१ ॥
प्रथमावरणमेव कृत्वा पश्चाद् यथाविधि ।
द्वितीयावरणं कुर्यात् त्रिणेत्रेण मनोहरम् ॥ १३२ ॥
तथा पट को ऊपर के मुख में कीलों से लगावे, पट का हटा देना घर के विस्तार के निमित्त
है । इस प्रकार प्रथमावरण बना कर पश्चात् यथाविधि दूसरा सुन्दर आवरण त्रिणेत्र लोहे से
करे ॥ १३१-१३२ ॥