बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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कर सके ऐसे सुदृढ नालों को बनावे जितना ऊंचा विमान हो, विमान के आवरण के आगे नाल लगाने
के लिए तीन बालिश्त लम्बे नाल यथाक्रम लगावे यान के पीछे यथाक्रम कील के साथ लगावे वैसे ही
विमान के ऊपर भी लगावे चणनिर्यांस—चने का गोंद ? नाल के ऊपर क्रम से—॥ १०१-१०५ ॥
एकाङ्गुलप्रमाणेण सम्यक् संलेपयेत् ततः ।
वज्रगंभैद्रावकेण(न?) पुनस्तदुपरि क्रमात् ॥ १०६ ॥
त्रिवारं लेपयेत् तेन वज्रवत् सुदृढं भवेत् ।
तन्नालोपरि सर्वत्र द्वादशाङ्गुलमन्तरम् ॥ १०७ ॥
पृथक् पृथक् कल्पयित्वा सिञ्जीरवज्रमिश्रितम् ।
विन्यस्य यामार्धकालं पावकेन प्रतापयेत् ॥ १०८ ॥
द्रवप्राणानशक्त्याकर्षणदक्षान् जलस्य हि ।
अङ्गुष्ठमात्रान् पञ्चास्यमणीन् व्याघ्रवशंकरीन् ॥१०६॥
पूर्वोक्तसिञ्जीरवज्रोपरि सम्भारयेद् दृ