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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 351

३२८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
इस वायु को फेंकने के लिए शाखानुसार यान के ऊपर चक्रसहित कीलों से सीत्कारी भस्त्रिका
की भांति सर्पमुखवाली तीन कीलों—पेंचों को यथाविधि बनाकर सरल दृढ गोल या घूमनेवाले शंकुओं से
संस्थापित कर दे, वायु स्वभावानुसार यथाक्रम ऊपर चला जावेगा तब तीनों सर्पमुखी कीलों—पेंचों को
घुमावे पश्चात् पूर्वोक्त तीनों सर्पमुख सर्प की भांति वायु को खींच कर उस उस के भागानुसार स्वमुख से
ही वेग से ऊपर आकाश में फेंक देता है इससे वायु सर्वथा आकाशमण्डल में लय को प्राप्त हो जाता
है अतः वायुद्वारा विमान का नाश या बिगाड निश्चित न हो ॥ ८१-८६ ॥
तस्माद् यानस्य वातापायविनाशो भविष्यति ।
अनायासाद् याति पश्चाद् विमानस्सरल यया ॥ ८७ ॥
अतो विमानावरणत्रयेप्येव प्रकल्पयेत् ।
वातोपसंहारयन्त्रमेवमुक्त्वा यथाविधि ॥ ८८ ॥
अथ वर्षोपसंहारयन्त्रमद्य प्रचक्षते ।
वर्षोपसंहारयन्त्र क्रौञ्चकेनेव प्रकल्पयेत् ॥ ८६ ॥
अत विमान यान वातसम्बन्धी उपद्रव का अनायास विनाश हो जावेगा, पश्चात विमान
सरलता से गति करता है चलता है उडता है। अत' विमान के तीनों आवरणों में ऐसा करे। इस
प्रकार यथाविधि वातोपसंहार यन्त्र कह कर अथ वर्षोपसंहार यन्त्र कहते हैं, वर्षोपसंहार यन्त्र क्रौञ्चक-
लोह से बनावे ॥ ८७-८६ ॥
उक्तं हि क्रियासारे — कहा ही है क्रियासार ग्रन्थ में—
यद्द्रवद्राणनशक्तीर्जलं स्यापहरेत्स्वत. ।
तत् क्रौञ्चिकलोहमिति प्रवदन्ति मनीषिण ॥ ६० ॥
वर्षोपसंहारयन्त्रमतस्तेनैव कल्पयेत् । इत्यादि ॥
जिससे कि जल की द्रव (पतलेपन) प्राणन (गीला करना) शक्तियों को नष्ट करदे, उसे क्रौञ्चिक
लोह मनीषी कहते हैं वर्षोपसंहार यन्त्र अतः इससे बनावे ॥ ६० ॥
यथोक्त यन्त्रसर्वस्वे क्रोञ्चलोहविनिर्णय ॥ ६१ ॥
तथेवात्र प्रवक्ष्यामि क्रौञ्चिकस्य यथाविधि ।
ज्योतिर्मुख त्र्यम्बक च हसतुण्ड सुधारकम् ॥ ६२ ॥
वसुरुद्राब्धिभागान् तथैव च पुनः क्रमात् ।
टङ्गणं सैकत चूर्णमोर्वार रुरुक्क तथा ॥ ६३ ॥
पटोलक वाध्युं षिकं चैते सप्त यथाक्रमम् ।
वसुवेदाग्न्रिबाणतारशैलविभागतः ॥ ६४ ॥
संयोज्य मूषामध्ये स्थापयेत् पद्मकुण्डके ।
द्वादशोत्तरपञ्चशतकक्ष्योष्णप्रमाणतः ॥ ६५ ॥
जैसा कि यन्त्रसर्वस्व में क्रौञ्चिक लोह निर्णय है वैसे ही यहां मैं यथाविधि क्रौञ्चिक का
कथन करूंगा। ज्योतिर्मुख-चित्रक वृक्ष का मूल ८ भाग, त्र्यम्बक-ताम्बा ११ भाग, हंसतुण्ड-हंसराजमूल ?