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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 344

त्रिपुरविमान ] [ ३२१
शक्तिसञ्चोदनात्तत्कीलकचक्रस्य भ्रामणम् ।
तेन वातद्वयं सम्यक् क्रमादावरणद्वये ॥२०॥
सम्पूर्यत्यतिवेगेन यन्त्रेणा तेन भूरिशः ।
सुखावहं भवेत् तस्मिन् सर्वेषां युगपत् क्रमात् ॥२१॥
घूमने वाले लोहमुख स्थापित करे फिर वातपूरककीलों को उनके पाश्र्वों में लगावे,
ऊपर की वायु के खींचने को सीत्कारी सीत्-वायुचूषण करने वाली कीलों को भी सर्वत्र
विशेषरूप से लगावे, सीत्कारी के आकर्षण-से प्रकट हुआ वायु नाल में भरा हुआ द्वितीय
आवरण से लेकर प्रथम आवरण की अवधि तक होता है, उसका जैसे सर्वतोमुख वेगसे
प्रसार हो वैसा यथाक्रम कील युक्त करे । शक्ति के प्रेरण से उस कीलचक्र का घूमना होता
है, इससे वायुएं क्रम से दोनों आवरणों में अतिवेग से भर जाती हैं इससे उसमें सब चालक
और यात्रियों को एक साथ बहुत सुखद होवे-होता है ॥१६-२१॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन वातनालान्नियोजयेत् ।
वातनालावरणद्वयमध्ये यथाविधि ॥२२॥
संस्थाप्य पश्चादावरणोर्ध्वपाश्र्वे समं यथा ।
दक्षिणोत्तरभागेषु चतुर्दिक्षु यथाक्रमम् ॥२३॥
विकासनोपसंहारकीलकान् चक्रसंयुतान् ।
सुदृढान् सरलांश्चैव स्थापयेच्छक्तिवत्क्रमात् ॥२४॥
पूर्वोक्तरावरणयोस्सन्धिस्थाने यथाविधि ।
एकैकावरणस्याथ पृथक्करणहेतुकान् ॥२५॥
जतातन्त्रीसमायुक्तचक्रकीलकान् पृथक् पृथक् ।
सर्वत्र स्थापयेत् सम्यग्वितस्तिदशकान्तरे ॥२६॥
अतः सर्वप्रयत्न से वातनालों को लगावे, दोनों वातनालावरणों के मध्य में यथाविधि
संस्थापित करके पश्चात् आवरण के ऊपर पार्श्व में भी समान दक्षिण उत्तर भागों में चारों दिशाओं में
यथाक्रम विकासन-फैलाने उपसंहार-संकोच करने वाली कीलों को चक्रसहित दृढ सरल शक्ति की भांति
स्थापित करे पूर्वोक्त आवरण के सन्धिस्थान भी यथाविधि एक एक आवरण के पृथक् करने के हेतुरूप
जटा तारों-जटारूप में परस्पर ऐंठा पाए हुए तारों से युक्त चक्रकीलों को पृथक् पृथक् सर्वत्र १० बालिश्त
के अन्दर स्थापित करे ॥२२-२६॥
शक्तिसञ्चोदनात् कीलचक्राणां भ्रमणं यथा ।
तथा तन्त्रिं समाहृत्य शक्तिस्थानाद् यथाक्रमम् ॥२७॥
चक्रकीलकमूलान्तं सम्यक् सञ्चोदयेद् दृढम् ।
तेन विद्युत्प्रसरणं कुर्यादुक्तप्रमाणतः ॥२८॥
तच्छक्तिचोदनात्कीलचक्राणां भ्रमणं भवेत् ।
तस्मादावरणभेदः पृथक् पृथग् यथाक्रमम् ॥२९॥