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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

२६० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
शुण्डालेश्च तथा कीलकादिभि प्रेरितं क्रमात् ।
घटिकावच्छिन्नकाले योजनानां चतुश्शतम् ॥ ३७५ ॥
विमान वेगतो याति नात्र कार्या विचारणा ।
एवं सुन्दरयानस्य आकाररचनाविधिः ॥ ३७६ ॥
आलोड्य पूर्वशास्त्राणि यथामति निरूपित (निरूपितम्?) ।
इसी रीति से पीठस्थ अधोयन्त्रों से पृथक् पृथक् वातौष्ण्य धूम के वेग क्षण में ही उत्पन्न
होते हैं । इसी प्रकार व्योमयान के ऊर्ध्वभाग में भी क्रम से चतुर्मुखी औष्ण्यकयन्त्र से औष्ण्यवेग
स्वभावतः ३४०० लिङ्क (डिग्री) प्रमाण से वेग चुटकी बजाने जितने समय में निःसंशय हो जाता
है । चातुर्मुखौष्ण्य वेग से वातधूमौष्ण्यकों और शुण्डालों से तथा कील आदि से प्रेरित विमान
घड़ीमात्र काल में चार सौ योजन (१६०० कोस एवं एक घण्टे में ४००० कोस) वेग से जाता है
इसमें विचार करने की बात नहीं । इस सुन्दरविमान के आकाररचना की विधि पूर्वशास्त्रों का आलोडन
करके यथामति निरूपित की है ॥३७१-३७६॥

हस्तलेख कापी संख्या २०—
अथ रुक्मविमाननिर्णयः — अथ रुक्मविमान का निर्णय कहते हैं—
रुक्मश्च ॥ अ० २ अधि० ४ सू० ६ १ ॥
एवमुक्त्वा सुन्दराख्यविमान शास्त्रत क्रमात् ।
इदानीं रुक्मविमानसस्प्रहात्सम्प्रचक्षते ॥१॥
इस प्रकार सुन्दरनामक विमान शास्त्र से क्रमशः कहकर अब रुक्मविमान संक्षेप से कहते हैं ।
विमानबोधकपद्द्वयमस्मिन्निरूपितम् ।
तत्रादिमपदाद् व्योमयाननाम निदर्शितम् ॥२॥
समुच्चयार्थावबोधो द्वितीयपदतस्मृत ।
एव सामान्यत प्रोक्तस्सूत्रार्थस्सङ्ग्रहेण तु ॥३॥
विमानबोधक दो पद यहां निरूपित किए हैं उनमें आदिमपद से व्योमयान—विमान का नाम
दिखलाया दूसरे पद से समुच्चयार्थ का बोध किया गया है, इस प्रकार सामान्यतः संक्षेप से सूत्रार्थ कहा
अब उसका विशेषार्थ शास्त्र से क्रमश' कहा जाता है ॥२—३॥
विमानो रुक्मवर्णात्वान्नाम्ना रुक्म इतीरित ॥४॥
राजलोहादेव रुक्मविमानमपि कारयेत् ।
पाकभेदाद् राजलोहे रुक्मवर्णविकारता ॥५॥
यथा भवेत् तथा कुर्याच्छास्त्रोक्तेनैव मार्गंत ।
अन्यथा निष्फल याति नात्र कार्या विचारणा ॥६॥
रुक्म (सुनेहरा) वर्ण होने से विमान रुक्म नाम का कहा है । राजलोहे से ही रुक्म विमान
अवश्य बनाना चाहिए, पाकभेद से राजलोह में रुक्मवर्णविकारता जैसे हो जावे वैसे शास्त्रोक्त मार्ग से
बनावे अन्यथा निष्फलता को प्राप्त हो जाता है इसमें विचारणा—शङ्का न करनी चाहिए ॥४—६॥
उक्तं हि यानबिन्दौ—कहा ही है यानबिन्दु ग्रन्थ में—
आदौ कृत्वा स्वर्णवर्णं राजलोहस्य शास्त्रतः ।
पश्चादाकाररचना कुर्याद् यानस्य च क्रमात् ॥७॥ इत्यादि
आदि में राजलोहे का शास्त्रविधि से स्वर्णवर्ण करके पश्चात् विमानयान की आकाररचना
क्रम से करे ॥७॥

२६२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र ]

वर्णस्वरूपमुक्तं वर्णसर्वस्वे—वर्णस्वरूप कहा है वर्णसर्वस्व में—
प्राणक्षारचतुष्टय च चणकमारण्यक' कोमलम्,
द्वात्रिंशच्छश कन्दसत्त्वममलमष्टादशाश तथा ।
विशच्छोदितनागमब्ध्युदितरेखामुख षोडश,
पञ्चान्माक्षिकषट्कद्दिश्यममल पञ्चानन विशति ॥८॥
पार पञ्चदशाष्टविशदमल क्षारत्रय ।
विशतिव्योम सप्तदशाष्ट हुसगरद पञ्चामृत षोडश ।
एतान् द्रावकयन्त्रकोशकुहरे सम्पूर्य पश्चाद् यथा-
शास्त्र द्रावकमाहरेद् द्विमुखरन्ध्राभ्यां यथापाकत ॥६॥
पश्चात् कुण्डमुखान्तरे सुविमले तद्राजलोह पुन ।
मूषाया परिपूर्य तत्र विधिवत् सस्थाप्य भस्त्रामुखात् ।
सञ्जाल्याष्टशतोष्णकध्यरयतस्सगृह्य पश्चात् सुधी ।
यन्त्रास्ये वरगर्भमध्यकुहरे संपूर्य सशोधयेत् ॥१०॥
एव कृत्वा राजलोह पश्चात् सग्राहयेद् यदि ।
शुद्धस्वर्णवदाभाति तल्लोह सुदृढ मृदु ॥११॥
एतेनैव प्रकर्तव्य विमानाकारमद्भुतम् ।
अत्यन्तसुन्दर सर्वहर्षद भवति ध्रुवम् ॥१२॥

प्राणक्षार—नवसादर या मूत्रक्षार* ४ भाग, कोमल आरण्यक चणक—कोमल गोखरु†
३२ भाग, अमल शशकन्दसत्त्व—लोहसत्त्व १८ भाग, शोधा हुआ नाग—सीसा २० भाग, अब्धि—
समुद्र में प्रकट हुआ रेखामुख—समुद्रफेन या शङ्ख ? १६ भाग, पश्चात् माक्षिक—सोनामाखीधातु
६ भाग, पञ्चानन ? (लोहा ?) २० भाग, पारा १५ भाग, विमल तीनों क्षार सज्जीखार यवक्षार सुहागा
समान सब २८ भाग, अभ्रक २० भाग, हंस—रूपाधातु ? १७ भाग, गरद—वत्सनाभ—वछनाग ८ भाग,
पञ्चामृत ?—दूध दही मधु शर्करा घृत ? १६ भाग, उनको द्रावक यन्त्रकोश के गुप्तस्थान में भरकर पश्चात्
यथाशास्त्र पाक हो जाने पर द्रावक को दो मुखरन्ध्रों—दो मुखछिद्रों से लेले । पश्चात् शुद्ध कुण्डमुख के
अन्दर उस राजलोहे को मूषा बोतल में भरकर विधिवत् स्थापित कर भस्त्रामुख से ८०० दर्जे की उष्णता
के वेग से सुबुद्धिमान् संगृहीत करके यन्त्र के मुख में आवृत करनेवाले गर्भमध्य छिद्रवाले में भरकर
शोधे इस प्रकार करके राजलोहे को लेले वह लोहा शुद्ध स्वर्ण जैसा लगता है मृदु दृढ हो जाता है
इसी राजलोहे से विमानाकार अद्भुत करना चाहिए यह अत्यन्त सुन्दर हर्षप्रद निश्चय होता है ॥८-१२॥

अथ पीठनिर्णयः—अथ पीठनिर्णय कहते हैं—
पीठ रुक्मविमानस्य कूर्माकार प्रकल्पयेत् ।
विजस्तिसहस्रायाम गात्रमेकवितस्तिकम् ॥१३॥

  • नुसार नरसार—प्राण, प्राणनामक क्षार या प्राणो का क्षार मूत्र "लोहद्रावकस्तथा" (रसतरङ्गिणी) ।
    † चणकद्रुम चणकसदृश पत्ते फल वाला ।

रुक्मविमान ] [ २६३
यथेष्टमथवा कुर्यात् सुदृढं सुमनोहरम् ।
पीठाधोभागदेशेष्टदिक्षु पश्चाद् यथाक्रमम् ॥१४॥
वितस्तिद्वादशायामकेन्द्रस्थानान् पृथक् पृथक् ।
गणितोक्तविधानेन कल्पयित्वा यथाविधि ॥१५॥
एकैककेन्द्रस्थानेथ चञ्चुपुटमुखान् दृढान् ।
कीलकान् स्थापयेत्सम्यग्दृढमावृत्तकीलकः ॥१६॥
पश्चादय.पिण्डचक्राण्यष्टकेन्द्रेषु युग्मतः ।
संयोजयेद् यथैकस्मिन् प्रभवेदेकसस्थितिः ॥१७॥
रुक्मविमान का पीठ कूर्माकार बनावे, सहस्र बालिश्त लम्बा चौड़ा १ बालिश्त मोटा अथवा
यथेष्ट सुदृढ मनोहर बनावे। पश्चात् पीठ के अधोभाग देश में आठों दिशाओं में यथाक्रम १२ बालिश्त
लम्बे केन्द्रस्थानों को पृथक् पृथक् गणितोक्त विधान से यथाविधि बनाकर एक एक केन्द्रस्थान में चञ्चु-
पुटमुखवाले कीलों को लगावे फिर घूमनेवाली या गोल कीलों से आठ केन्द्रों में दो दो करके लोहपिण्ड-
चक्रों को—स्थूलमोटे चक्रों को लगावे जिससे एक में एक की संस्थिति हो ॥ १३-१७ ॥
अयश्चक्रनिर्णयः —लोहचक्रों का निर्णय कहते हैं—
अयश्चक्रपिण्डलक्षणमुक्तं लल्लेन—लोहचक्रपिण्ड का लक्षण लल्ल ने कहा है—
वितस्तिद्वादशायाम कुङ्कुष्ठाष्टकभारकम् ।
वर्तुंलाकारत कुर्यात् पिष्टपेषणयन्त्रवत् ॥१८॥ इत्यादि ॥
१२ बालिश्त लम्बा चौड़ा ८ कंकुष्ठ ? भारवाला गोलाकार चक्की के पाट की भांति करे ॥१८॥
पश्चाच्चक्राणि विधिवच्चञ्चपुटमुखान्तरे ।
सम्यक् सन्धारयेद्भद्रमष्टदिक्षु पृथक् पृथक् ॥१९॥
एकैकअयस्कपिण्डमूलकेन्द्राद् यथाविधि ।
अविद्युत्कीलपर्यन्तं नालावरणत क्रमात् ॥२०॥
सन्धारयेच्छृङ्खलतन्त्रयस्सयंत्र कीलकै ।
पूर्वोक्तायस्कपिण्डस्थानपार्श्वे पृथक् पृथक् ॥२१॥
फिर चक्रों-अय पिण्डचक्रों को विधिवत् चञ्चुपुटमुख-चोंच आकार के सम्पुटरूप में आठों-
दिशाओं में पृथक् पृथक् संयुक्त करे । एक एक लोहचक्रपिण्ड के मूलकेन्द्र से यथाविधि विद्युत् की
कील तक क्रमश नालावरण से शृङ्खलातन्त्रयों-जंजीररूप तारों को कीलों से पूर्व कहे लोहचक्रपिण्डस्थान
के पार्श्व में पृथक् पृथक् सङ्गत करे ॥१९-२१॥
बटिणिकास्तम्भनिर्णय. —बटिणिका-बटन या घुण्डी के स्तम्भ का निर्णय—
वितस्त्येकायामयुक्तान् चतुर्वितस्तिरुन्नतान् ।
स्तम्भान् संस्थापयेत्तेषु कीलकान् तन्त्रवाहकान् ॥२२॥
सन्धारयेद् दृढ पश्चाच्छक्तिनालाविधिक्रमात् ।
अष्टाङ्गुलायामचक्राण्युभयोः पार्श्वयोः दृढम् ॥२३॥

२६४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
सतन्त्रीणि यथाशास्त्र मध्यभागे च योजयेत् ।
आविद्युन्नालमारभ्य चक्राण्यावृत्य च क्रमात् ॥२४॥
आहृत्य शृङ्खलाकारतन्त्रीस्तम्भान्तरे दृढम् ।
अन्त कीलमुखे सम्यग्योजयेत्सरल यथा ॥२५॥
एक बालिश्त लम्बाई से युक्त मोटे चार बालिश्त ऊंचे ऊपर लम्बे स्तम्भों को संस्थापित
करे, उनमें तार लेजानेवाली कीलों को भी दृढ लगावे पश्चात् शक्तिनाल के अवधिक्रम से दोनों पार्श्वों
में ८ अङ्गुल लम्बे चौडे चक्र तारसहित यथाशास्त्र मध्य में लगावे । विद्युत् की नाल से लेकर क्रम से
चक्रों को घेरकर—चक्रों के ऊपर से लाकर शृङ्खलाकार—जंजीर जैसी तारों को स्तम्भ के अन्दर भीतरी
कीलमुख में सम्यक् सरल युक्त करे ॥२४-२५॥
पश्चाच्चषकवत् तस्योपरि कीलसमन्वितम् ।
संस्थापयेद् बटनिकामन्तरावृत्तकुङ्मलाम् ॥२६॥
तस्मिन्नङ्गुष्ठविक्षेपादन्तस्स्खलन यथा ।
तथा भ्रामकचक्राणि कीलकंस्सह योजयेत् ॥२७॥
यथा बटनिकोपर्यह्ङ्गुष्ठविक्षेपण भवेत् ।
तत्क्षणात् स्तम्भान्तरस्थचक्रकील्यान्यथाक्रमात् ।२८।॥
परिभ्रमन्ति वेगेन विद्युत्संयोजनात् स्वतः ।
पुनर्विद्युन्नालमुखाच्चक्रकीलान्यथाक्रमम् ॥२६॥
एतत्प्रेक्षणतस्सम्यग्भ्राम्यन्ते शक्तियोगत. ।
एतेन पञ्चसहस्रलिङ्गुवेग प्रजायते ॥३०॥
फिर पात्र (गिलास आदि) की भांति उस स्तम्भ के ऊपर कील से युक्त बटनिका-बटन या
घुण्डी अन्दर घूमने वाले कुङ्मल-आधे खिले फूल के समानाकार वाले पेंच (चाबी) से घिरी हुई को
संस्थापित करे, उसमें अङ्गुठे के विक्षेप से-अंगूठे द्वारा दबाने से अन्दर सञ्चलन-गति जिससे हो जावे
इस रीति घूमने वाले चक्रकीलों के साथ युक्त कर दे कि जैसे ही बटन या घुण्डी के ऊपर अङ्गूठे का
दबाव हो तो तुरन्त स्तम्भके अन्दर स्थित चक्रों की कीलें-पेंच यथाक्रम से विद्युत्के संयोगसे स्वतः वेग से
घूमने लगते हैं-घूमने लगें । फिर विद्युत् के नालमुख से कीलें यथाक्रम इस प्रैंखण-झूलाने साधन से
सम्यक् शक्तियोग से घूमते हैं, इससे पांच सहस्र लिङ्गु (डिग्री) का वेग उत्पन्न हो जाता है ॥२६-३०॥
अथ विमानोड्डीयनादिनिर्णय. — अब विमान के उड़ने आदि का निर्णय —
एतच्छ्‌लङ्घाकघर्षणेन पीठाधस्ताद् यथाक्रमम् ।
आकुञ्चितान्य पिण्डचकारिण प्रभवन्ति हि ॥ ३१ ॥
तच्चक्रेस्ताडित पीठ ऊर्ध्वं गच्छति खे क्रमात् ।
पीठोपरिस्थचक्रस्तम्भस्थकीलप्रचालनात् ॥ ३२ ॥
अत्यन्तवेगतस्स्तम्भभ्रमण प्रभवेत् क्रमात् ।

रुक्मविमान ] [ २६५
तेनोर्ध्वंगमनं वेगात् स्तम्भाना भवति स्वतः ॥ ३३ ॥
आरोहणावरोहणक्रमात् सव्यापसव्यत ।
शक्तिसंयोजनात् सम्यग्भ्राम्यन्त्येव मुहुर्मुहुः ॥ ३४ ॥
चक्रताडनतोधस्तात् स्तम्भाकर्षणोपरि ।
उड्डीयोड्डीय वेगेन विमान खपथे क्रमात् ॥ ३५ ॥
यात्यूर्ध्वं सरलात् सम्यग्गतिमम्भीरतस्स्वयम् ।
एतेनोर्ध्वं विमानस्य खपथारोहण भवेत् ॥ ३६ ॥
इस वेगरूप शक्ति के आकर्षण से पीठ के नीचे स्थित लोहपिण्ड चक्र खींचे हुए हो जाते हैं
उन चक्रों से ताड़ित पीठ के ऊपर आकाश में क्रम से चला जाता है, फिर पीठ के ऊपर स्थित चक्रस्तम्भस्थ
कील प्रचालन से अत्यन्त वेग से स्तम्भ का भ्रमण होता है उससे वेग से स्तम्भों का स्वतः ऊर्ध्व गमन
होता है। आरोहण - ऊपर जाने अवरोहण-नीचे आने के क्रम से दाएं बाएं से शक्ति को युक्त करने
से पुन पुनः सम्यक् घूमते हैं, चक्रताडन द्वारा नीचे से ऊपर स्तम्भ के आकर्षण से विमान वेग से उड़
कर आकाश मार्ग में क्रम से ऊपर सम्यक् सरलता और गम्भीरता से चला जाता है इससे विमान का
आकाश मार्ग में आरोहण हो जावे-हो जाता है ॥ ३१-३६ ॥
अथ गमनोपयुक्तविद्युन्नालचक्राणि - अथ गमन में उपयुक्त विद्युत् की नालों के चक्र कहते हैं -
पीठस्योपरि शास्त्रोक्तसख्यारेखानुसारत ।
विहायैकवितस्त्यन्तराय नालद्वयान्तरे ॥ ३७ ॥
विद्युन्नालानि विधिवत् सचक्राणि यथाक्रमम् ।
सन्धारयेद् विशेषेण ओतप्रोतात्मना तत ॥ ३८ ॥
एकैकविद्युन्नालस्य पार्श्वयोर्भयोरपि ।
वितस्तिद्वयमायाम वितस्त्येकोन्नत तथा ॥ ३९ ॥
कल्पयित्वा दन्तचक्राण्यथ तेषा परस्परम् ।
सम्मेलयित्वा विधिवत् कीलैस्सम्भ्रामकैस्तथा ॥ ४० ॥
विद्युत्तन्त्रीस्समाहृत्य एतत्कीलमार्गत ।
प्रतिचक्रोपरि यथा सम्यक् सन्धारयेत् क्रमात् ॥ ४१ ॥
प्रतिविद्युन्नालमूले विद्युत्सञ्चोदनाय हि ।
वितस्तित्रयमायाम वितस्तित्रयमुन्नतम् ॥ ४२ ॥
एकैकचक्रं सरल स्थापयेत् नांग्रिसंयुतम् ।
विहाय विन्नालानि मध्ये स्तम्भ नियोजयेत् ॥ ४३ ॥
शास्त्र में कही संख्यारेखा-विचारधारा के अनुसार पीठ के ऊपर दो नालों के अन्दर एक एक
बालिश्त का अन्तराय भेद-दूरी छोड़ कर चक्रसहित विद्युन्नालें यथाक्रम विधिवत् लगावे, विशेषत ओत-
प्रोत रूप से फिर एक एक विद्युन्नाल के दोनों पार्श्वों में भी २ बालिश्त लम्बा २ बालिश्त ऊंचे दन्त-

२६६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
चक्रों-दान्तों वाले चक्र बना कर उनका परस्पर सम्मेल करके-परस्पर एक दूसरे से दान्तों द्वारा फंसा कर
घूमने वाली कीलों से विद्युत् के तारों को लेकर इन कीलों के मार्ग से प्रत्येक चक्र पर क्रम से ठीक ठीक
युक्त करे । प्रत्येक विद्युन्नाल के मूल में विद्युत् को प्रेरित करने के लिए ३ बालिशत लम्बा ३ बालिशत
ऊंचा एक एक चक्र तारसहित सरल स्थापित करे, २० नालों को छोड कर मध्य में स्तम्भ नियुक्त
करे ॥ ३७-४३ ॥
उक्तं हि नारायणेन-कहा ही है नारायण ने-
चतुर्वितस्त्यायामं च तावदेवोन्नतं तथा ।
स्तम्भं कृत्वाथ तन्मध्ये वितस्तिद्वयमानतः ॥ ४४ ॥
आस्यवत्कल्पयेत् सम्यक् त्रिधा तस्मिन् यथाविधि ।
विभज्य समभागेन पश्चात् स्थानत्रये क्रमात् ॥ ४५ ॥
कीलकानि यथाशास्त्रं तत्र तत्र नियोजयेत् ।
चक्रषट्कसमायुक्तं काचकङ्कभिरन्वितम् ॥ ४६ ॥
सनालकङ्कुकावृत तन्त्रीद्वयसमन्वितम् ।
विद्युच्छक्त्याकर्षणार्थं स्थापयेत् कीलकद्वयम् ॥ ४७ ॥
स्तम्भस्य प्रथमे भागे एव सन्धार्य कीलके ।
द्वितीयभागे तच्छक्तिप्रेरणार्थं यथाविधि ॥ ४८ ॥
चक्रपञ्चकसंयुक्तं काचावरणसयुतम् ।
नालद्वयेन सयुक्त तन्त्रीद्वयसमन्वितम् ॥ ४६ ॥
शक्तिप्रवाहतन्त्रग्रोमूलं प्रदेशे त्रिदण्डकम् ।
सम्प्रेषितान्तश्चषक वेणिनी तैलसयुतम् ॥ ५० ॥
पञ्चास्यकीलकं सम्यक् स्थापयेत् सुदृढ यथा ।
४ बालिशत लम्बा ४ बालिशत ही ऊंचा स्तम्भ पीठ के मध्य में बना कर २ बालिशत मान से
मुख की भांति तीन प्रकार की उसमें समान भाग का विभाग करके तीन स्थानों में कीलें यथाशास्त्र
वहां नियुक्त करे ६ चक्रों से युक्त काचकंकुशों-काच के मुखों (दीपरक्षकों ?) से युक्त नालसहित चर्मा-
वरण से घिरे हुए दो तारों से युक्त दो कीलें विद्युत् शक्ति के आकर्षणार्थ लगावे । स्तम्भ के प्रथम भाग
में इस प्रकार दो कीलें लगा कर द्वितीय भाग में उस शक्ति के पहुंचाने प्रेरित करने के लिए यथाविधि
पाच चक्रों से युक्त काचावरणसहित दो नालों के साथ दो तारों से युक्त शक्तिप्रवाहक दो तारों के मूल-
प्रदेश में तीन दण्डों वाले प्रेरित किए अन्दर चषक-पात्र वेणिनी तैल जिसमें हो पाच मुख वाले कील
को सम्यक् दृढ स्थापित करे ॥ ४४-५० ॥
शक्तिप्रवाहसङ्घटनेन वेगाद् यथाक्रमम् ॥ ५१ ॥
तत्रत्यचक्रभ्रमणं भवेद् वेगाद् यथाक्रमात् ।
तथा सन्धारयेत् कीलकानि तृतीये यथाक्रमम् ॥ ५२ ॥

रुक्मविमान ] [ २६७
प्रथमास्य समारभ्य तृतीयास्यान्तरावधि ।
अन्योन्यसंसर्गचक्रकीलकैस्सरलं यथा ॥ ५३ ॥
सन्धायं पश्चात् स्तम्भास्यपुरोभागे दृढ यथा ।
बृहच्चक्रं च विधिवत् स्थापयेद् गुम्फ (गम्भ ?) कीलकै ॥ ५४ ॥
एव प्रतिस्तम्भमूले क्रमात् सम्यक् पृथक् पृथक् ।
चक्राणि स्थापयेत् तेषामुपरिष्टात् समन्तत ॥ ५५ ॥
शक्तिप्रवाह के मेल संघर्ष से यथाक्रम वेग से वहां का चक्रभ्रमणवेग से हो जावे ऐसे
तृतीय भाग में दो कीलें लगावे, प्रथममुखको आरम्भकर तृतीय मुखके अन्दर तक अन्योऽन्य संसर्ग कीलों
से सरल लगाकर फिर स्तम्भमुख के सामने के भाग में दृढ वडा चक्र विधिवत् गुम्फ-गांठ कीलों
से स्थापित करे । इस प्रकार प्रति स्तम्भमूल में क्रम से पृथक् पृथक् चक्र स्थापित करे उनके ऊपर सब
ओर से—॥ ५१-५५ ॥
पट्टिका योजयेत् सम्यक् चतुरङ्गलविस्तृताम् ।
संसर्गचक्रकीलादाविद्युद्यन्त्रमुखावधि ॥ ५६ ॥
तन्त्रीद्वय समाहृत्य विद्युदाकर्षणाय हि ।
शक्तिप्रवाहनालस्य मुखकीले नियोजयेत् ॥ ५७ ॥
तत्कीलभ्रमणाच्छक्तिस्तन्त्रीमार्गानुसारत ।
संसर्गचक्रकीलकमार्गद्वारा यथाक्रमम् ॥ ५८ ॥
समागत्यातिवेगेन स्तम्भमूलस्य कीलकम् ।
प्रविश्य (च) तत्कीलद्वारा चक्राणि भ्रमन्ति हि ॥ ५६ ॥
बृहच्चक्रभ्रमणतो सन्धिचक्राण्यपि क्रमात् ।
परस्पर भ्रामयन्ति नालदण्डेषु वेगत ॥ ६० ॥
चार अ ङ्गुल चौड़ी पट्टिका भली प्रकार युक्त करे, संसर्ग चक्रकील से लेकर विद्युद्यन्त्र के मुख
तक विद्युत् के आकर्षण के लिए दो तारों को लेकर शक्ति प्रवाह नाल के मुख कील में नियुक्त करे
उस कील के भ्रमण से शक्ति तारमार्ग के अनुसार संसर्ग चक्रकील के मार्ग द्वारा यथाक्रम अतिवेग से
आकर स्तम्भमूलस्थ कील को प्रविष्ट हो उस कील के द्वारा चक्र घूमते हैं, बडे चक्र भ्रमण से सन्धिचक्र
भी परस्पर क्रम से नालदण्डों में वेग से घूमते हैं ॥ ५६-६० ॥
पश्चास्यकीलके सम्यक्शक्तिस्सम्प्रविशेत् क्रमात् ।
अन्तश्चक्रकसन्दिष्टवेगिनौतैलत पुन ॥ ६१ ॥
तच्छक्तिर्विस्तृता वेगात् प्रं ति नालदयान्तरात् ।
सर्वत्र व्याप्य दण्डस्थसर्वचक्राण्यथाक्रमम् ॥ ६२ ॥
भ्रामयत्यतिवेगेन शक्तिचालनचक्रवत् ।
एतेन पञ्चविंशत्सहस्रलिङ्गप्रमाणत ॥ ६३ ॥

२६८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
वेगस्सजायते तस्माद् विमानं घटिकान्तरे ।
पञ्चोत्तरशतक्रोशपर्यन्तं धावति दृढम् ॥ ६४ ॥
एवं कृत्वा विमानस्य गमनाभिमुखं क्रमात् ।
दिशाभिमुखीकर्तुं कीलकान्युच्यन्तेऽधुना ॥ ६५ ॥
पाच मुख वाली कील में सम्बद्ध शक्तिक्रम से प्रविष्ट हो जावे, भीतरी पात्र में रखे वेगिनीतैल
से फिर वह शक्ति विस्तृत हो वेग से दो नालों में से प्रगति करती है बाहिर जाती है सर्वत्र दण्डस्थ सब
चक्रों को क्रमश वेग से शक्तिचालन की भांति घुमाती है इससे २५ सहस्र लिङ्क (डिग्री) के प्रमाण
से वेग हो जाता है उससे विमान एक घड़ी के अन्दर १०५ कोश दौड़ता है इस प्रकार विमान का गमन
लक्ष्य करके दिशा को अभिमुख करने के लिए अब कीलें कही जानी हैं ॥ ६१-६५ ॥
ईशाम्यादिक्रमात्पीठस्याष्टदिक्षु यथाक्रमम् ।
वितस्तीनां पञ्चदशोन्नतमायामतस्तथा ॥ ६६ ॥
वितस्तिद्वयमानं च स्तम्भं कुर्याद् दृढं यथा ।
वितस्तिदशकादेकस्तम्भवत् सङ्ख्यया क्रमात् ॥ ६७ ॥
सङ्गुण्य पीठदेशेथ यावत्सङ्ख्या भविष्यति ।
तावत्सङ्ख्यानुसारेण स्तम्भान् पूर्वोक्तवद् दृढान् ॥ ६८ ॥
कल्पयित्वाथ संस्थाप्य पञ्चकण्टा (ण्ठो ?) ज्वलान्वितान् ।
अभ्रकेन कृतान् पश्चात् तेषामुपरि शास्त्रतः ॥ ६६ ॥
यानाङ्गसर्वस्थानानि गृहकुड्यादिकानपि ।
पूर्वोक्तरुच (रु ?) क व्योमयानवत् कारयेत् क्रमात् ॥ ७० ॥
गृहोपयुक्तसामग्रयञ्चाभ्रकादेव कारयेत् ।
अन्यथा निष्फलमिति प्रवदन्ति मनीषिण ॥ ७१ ॥
पीठ की ईशानी आदि आठ दिशाओं- विशोपदिशाओं में यथाक्रम १५ बालिश्त ऊंचा
लम्बा चौडा मोटा २ बालिश्त मान में दृढ स्तम्भ करे १० बालिश्त का एक स्तम्भ जैसा सख्या से गुणा
कर दश दश क्रम कर निर्दिष्ट कर पीठ देश में जितनी संख्या होगी उतनी संख्यानुसार स्तम्भ बना कर
संस्थापित कर पांच कण्ट-( बिद्युत् के ) केन्द्र या कण्टे झाडफानूस ज्वाला-दीप्ति-प्रकाश से युक्त
अभ्रक से बने फिर उनके ऊपर शास्त्रानुसार याताङ्गों के सर्वस्थान घर कमरे भित्ति आदि भी पूर्वोक्त
रुचक-रुक्म व्योमयान की भांति क्रमश करावे, घर की उपयुक्त सामग्री भी अभ्रक से करावे अन्यथा
निष्फल है ऐसा मनीषी कहते हैं ॥ ६६-७१ ॥
तदुक्तं क्रियासारे-वह कहा है क्रियासार ग्रन्थ में-
शारग्राव* पञ्चविंशत् तथैव द्विवङ्गास्त्व त्रिंशतिश्चाष्टविंशद् ।
गुञ्जाक्षार टङ्कण द्वादशांशं रोद्रीमूलं चाष्टभाग समग्रम् ॥ ७२ ॥

  • क्षारग्राव होना ठीक है।

रुक्मविमान ] [ २६६
चान्द्रीपुष्पक्षारमेकाशकं च शून्यं च पश्चात् पाकशुद्ध शतांशम् ।
सम्पूर्येतान् कूर्ममूषामुखेऽथ पद्माकुण्डे स्थाप्य भस्त्रामुखेन ।। ७३ ।।
सञ्ज्वाल्राष्टशतकक्ष्योष्णवेगात् पश्चाद् यन्त्रे पूरयेद् वेगतोय ॥ इत्यादि ॥
क्षारभाव—क्षारभाव—ग्रावक्षार–पत्थर का क्षार अर्थात् चूना २५ भाग, द्विवङ्गासत्त्व—कमीस ?
३० भाग, गुञ्जाक्षार २८ भाग, सुहागा ८२ भाग, रौद्रीमूल शङ्कुर जटा ८ भाग, श्वेत कण्टकारी के फूलों
का क्षार १ भाग पश्चात् पाक शुद्ध शून्य—आकाश—अभ्रक १०० भाग इन सब को लेकर कूर्ममूषा
मुख तापयन्त्र में भर कर पद्माकार कुण्ड में रख कर भस्त्रामुख से ८०० दर्जे की उष्णता के वेग से गलाकर
तुरन्त यन्त्र में डाल दे ॥ इत्यादि ॥
एव कृतेऽभ्रकश्शुद्ध. सर्वकार्यक्षमो दृढ ।
अत्यन्तमृदुलश्चित्रवर्णैश्च सुविराजित ।। ७४ ।।
हर्षप्रदश्च सर्वेषा प्रभवेन्नात्र संशय ।
स्तम्भकुड्यगृहादीनि एतेनैव प्रकल्पयेत् ।। ७५ ।।
कल्पयित्वा व्योमयाने गृहाद्याश्शास्त्रस्तत ।
व्योमयान प्रेरयितु सर्वदिक्षु यथोचितम् ।। ७६ ।।
परिवर्तनावर्तनकीलकानि यथाक्रमम् ।
यानादिमध्यान्त्यभागेष्वष्टदिक्षु यथाक्रमम् ।। ७७ ।।
[L1

३८० ] [ बृहद्विमानशास्त्र
परिवर्तनावर्तनाथं पश्चात् तस्य यथाविधि ।
पीठमूले चतुर्दिक्ष्वर्धचन्द्राकारत क्रमात् ॥ ८४ ॥
वितस्तिद्वयमायाम वितस्तिद्वयमुन्नतम् ।
नालं कृत्वाय विधिवत् तन्मध्ये स्थापयेत् क्रमात् ॥८५॥
चतुरङ्गुलायामलोहशलाकान् मृदुलान् तत ।
नालान्तरस्योभयपार्श्वयोस्सयोजयेत् ततः ॥ ८६ ॥
एक मार्ग से दूसरे मार्ग के प्रति विमान को प्रेरित करने के लिये परिवर्तन आवर्तन कीलें
अर्थात् घुमाने लौटाने की साधनभूत कीलों को यथाक्रम विमान की आठों दिशाओं में दृढरूप में युक्त
करे । पूर्व पश्चिम के विमान से दो कीलों को लगाना चाहिए, फिर दोनों का मेल करे उससे विमान
प्रेरित हो जावेगा—चलाने योग्य हो जावेगा । दाएं बाएं विमान वेग से चले-चल पड़ेगा । उन कीलों
के भ्रमण से जिससे दिन रात दौड़ता है अतः परिवर्तन आवर्तन कील कहा है । परिवर्तन आवर्तन के
लिये फिर यथाविधि उसके पीठमूल में चारों दिशाओं में क्रमशः अर्धचन्द्राकार २ बालिश्त लम्बा २
बालिश्त ऊंचा विधिवत् नाल बनाकर उसके मध्य में क्रम से स्थापित करे, ४ अङ्गुल मृदुल-कोमल
लम्बी लोहशलाकाओं को नालों के अन्दर वाले दोनों पाशों में लगावे ॥ ७६—८६ ॥
वितस्त्यायामतस्तद्वद्वितस्त्युन्नतमेव च ।
कृत्वा सरलचक्राणि तेषु संधारयेत् क्रमात् ॥ ८७ ॥
मृदुकङ्कूरत्नन्याध तेषामुपरि शास्त्रतः ।
संवेष्टयेदास्र्मन्तात् सरल च दृढ यथा ॥ ८८ ॥
एव क्रमेण विधिवच्चतुर्दिक्षु यथाक्रमम् ।
अर्धचन्द्राकारनालान् पीठस्य स्थापयेद् दृढम् ॥८६॥
ततो नालस्थचक्राणां भ्रमणायातिवेगत ।
द्यादिमध्यावसानेषु नालानां सप्रमाणतः ॥ ६० ॥
बृहच्चक्राणि विधिवत्स्थापयेत् सुदृढ यथा ।
नालाग्रस्थबृहच्चक्रभ्रमणाद् वेगत क्रमात् ॥ ६१ ॥
नालान्तर्गतचक्राणि भ्रामयन्ति परस्परम् ।
तद्वेगेनाथ तत्कीलशङ्कवश्च यथाक्रमम् ॥ ६२ ॥
पीठे मध्ये तथा चान्त्ये पन्थानाभिमुखं यथा ।
तथावृत्य स्वयं पश्चाद् यानमावर्तयिष्यति ॥ ६३ ॥
तस्मात् सत्पथि वेगेन विमानो धावति स्वयम् ।
तस्मादेतत्कीलकानि स्थापयेदिति वर्णितम् ॥ ६४ ॥
बालिश्तभर लम्बे बालिश्तभर ऊंचे सरलचक्र बनाकर उन में क्रम से कोमल काचकङ्कुवाले
तार से संयुक्त करे उन चक्रों के ऊपर सब ओर सरल दृढरूप में लपेटे इस प्रकार क्रम से विधिवत्
यथाक्रम पीठ की चारों दिशाओं में अर्धचन्द्राकार नालों को दृढ स्थापित करे। फिर नालस्थ चक्रों के

रुक्मविमान ] [ ३०१
भ्रमण के लिये अतिवेग से नालों के आदि मध्य अन्त में प्रमाण से बड़े चक्र विधिवत् सुदृढ स्थापित
करे। नाल के अग्र भाग में स्थित बड़े चक्र के भ्रमण से वेग से नाल के अन्दर वाले चक्र परस्पर
एक दूसरे को घुमाते हैं, उस वेग से वे कीलशङ्कु—कील कांटे यथाक्रम पीठ में मध्य में अन्त में
मार्गों के सम्मुख घूमते हैं उनके साथ घूम कर स्वयं विमानयान घूम जायगा अतः मार्ग में वेग से
विमान स्वयं दौड़ता है अत कीलों को स्थापित करे यह वर्णित किया है ॥ ८७–६४ ॥
अथ घुटिकापञ्जरनिर्णय —अब घुटिका पञ्जर का निर्णय करते हैं—
विज्ञप्ति—यहां से अगले विषय त्रिपुरविमान से पूर्व का बहुत सा अन्य भाग मध्य में
होना चाहिए ( स्वामी ब्रह्ममुनि )

हस्तलेख कापी संख्या २१—
(यह हस्तलेख कापी संख्या २३ है परन्तु यह भाग (मैटर) हस्तकापीसंख्या २१ से पूर्व का है
२३, फिर २२ फिर २१ होना चाहिए। २० के पश्चात् २१ जो हस्तलेख रजिस्टर में है वह वस्तुतः २३
संख्या है उसके मध्य में बहुत भाग (मैटर) शेष है वह कहां है ? कुछ पता नहीं )
त्रिपुरोध ॥ अ० २ सू० १ ॥ १
बो० वृ०
शकुनाद्यैसिंहिकान्तविमानानि यथाविधि ।
उक्त्वेदानीं त्रिपुरविमानससम्यक् प्रचक्षते ॥१॥
अस्य त्रिपुरविमानस्यावरणानि त्रय क्रमात् ।
एकै कावरणस्यात्र पुरमित्यभिधीयते ॥२॥
पुरत्रयेण सयुक्तं विमानं त्रिपुरं विदुः ।
भास्करांशुसमुद्भूतशक्त्या सचोदितं भवेत् ॥३॥
शकुन विमान को आदि बना सिंहिक विमान के अन्त तक † यथाविधि कहकर अब त्रिपुर
विमान कहते हैं, इस त्रिपुर विमान के क्रम से तीन आवरण हैं एक एक आवरण का नाम पुर कहा
जाता है, तीन पुरों से संयुक्त होने से विमान को त्रिपुर जानते हैं, सूर्यकिरणों से प्रकट हुई शक्ति से
प्रेरित होता है चलता है ॥३॥
नारायणोपि—नारायण आचार्य भी कहते हैं—
पृथिव्यप्स्र्वन्तरिक्षेषु स्वाङ्गभेदात् स्वभावत ।
यस्समर्थो भवेद् गन्तुं तमाहुस्त्रिपुरं बुधाः ॥४॥
पृथिवी जलों में अन्तरिक्षों में अपने अङ्गों के भेद से स्वभावतत' जो जाने को—चलने को
समर्थ हो उसे ज्ञानी जन त्रिपुर कहते हैं ॥४॥
भागत्रयं भवेदस्य त्रिपुरस्य यथाक्रमम् ।
तेषु प्रथमभागस्य सञ्चारः पृथिवीतले ॥५॥
द्वितीयभागसञ्चारो जलस्यान्तर्बहिः क्रमात् ।
तृतीयभागसञ्चारस्त्वन्तरिक्षे भवेत् स्यतः ॥६॥
† सिंहिक पर्यन्त २० विमान होते हैं यहां तक का वर्णन कहां है ? गुम है ? ।

त्रिपुराविमान ] [ ३०३
एकधा कीलकंस्सम्यग्भागत्रयमत क्रमात् ।
एकीकृत्य यथाशास्त्र चोदयेद् यदि खे ह्वत' ॥७॥
एकस्वरूपतस्सम्यग्विमानस्त्रिपुराभिधः ।
साङ्केतकानुसारेण वेगात् सञ्चरति ध्रुवम् ॥८॥
पृथिव्यप्स्र्वन्तरिक्षेषु गमनार्थं यथाविधि ।
त्रिधा विभज्यते व्योमयानशास्त्रविधानत ॥६॥
तेष्वादिमविभागस्य रचनाविधिरुच्यते ।
त्रिनेत्रेणैव लोहेन त्रिपुरं कारयेत् सुधी ॥१०॥
अन्यथा निष्फल यातीत्यादुर्लोहविदो वरा ।
तस्मादादौ त्रिनेत्राख्यलोह सम्पादयेन्नर ॥११॥
त्रिपुर विमान के यथाक्रम तीन भाग होते हैं उनमें प्रथम भाग का सञ्चार पृथिवी तल पर,
दूसरे भाग का गमन जल के अन्दर बाहिर क्रम से, तीसरे भाग का सञ्चार तो आकाश में स्वत होता
है । एक साथ कीलों से सम्यक् तीनों भागों को यथाशास्त्र एक करके—मिलाकर यदि आकाश में प्रेरित
किया जावे तो एक स्वरूप हुआ त्रिपुर--विमान सङ्केत करनेवाले पुर्जे से वेग से निश्चित चलता है ।
पृथिवी पर जलों में आकाश में जाने के लिये शास्त्र से यथाविधि तीन प्रकार से विभक्त हो जाता है ।
उनमें प्रथम विमान की रचनाविधि कही जाती है कि त्रिनेत्र लोहे से ही बुद्धिमान् जन त्रिपुर विमान
करावे, नहीं तो निष्फलता को प्राप्त हो जाता है ऐसा उत्तम लोहवेत्ता जन कहते हैं अत आदि में
त्रिनेत्रनामक लोहे को तैयार करे ॥५--११॥
त्रिनेत्रलोहमूक्तं शाकटायनेन - त्रिनेत्र लोहा कहा है शाकटायन ने—
दश रोचिष्मतीलोह. कान्तमित्रोष्ट एव च ।
षोडशांशो वज्रमुखश्चेति भागविनिर्णय ॥१२॥
एतद्भागानुसारेण लोहत्रयमत परम् ।
मूषामुखे विनिक्षिप्य तस्मिन् पश्चाद् यथाक्रमम् ।।१३।।
टङ्गण पञ्च (च) तद्वत् त्रैशिक सप्त एव च ।
एकादश श्रपणिको पञ्च माण्डलिकस्तथा ॥१४॥
रुचक पारदश्चैव त्रीणि त्रीणि पृथक् पृथक् ।
सम्यक् संयोज्य विधिवत् कुण्डे पद्ममुखे दृढम् ॥१५॥
एकत्रिशदुत्तरषट्शतकश्योष्णवेगत ।
त्रिमुखीभस्त्रिकात् सम्यग् गालयेदतिवेगत. ॥१६॥
१० भाग रोचिष्मतीलोहा—कान्त लोहा ?, ८ भाग कान्तमित्र लोहा—मुण्ड लोहा ?,
१६ भाग वज्रमुख लोहा—तीक्ष्ण लोहा ? इस प्रकार भागानुसार तीनों लोहे मूषा बोतल के मुख
में डालकर फिर उसमें सुहागा ५ भाग, त्रैशिक-अर्थं त्त्रिक त्र्यं क्षी शल्लकी के कांटों का क्षार ?
या त्रिण यवतृण का क्षार यवक्षार ७ भाग, श्रपणिक ? ११ भाग, माण्डलिक--मण्डल--चक्रक

३८४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
सामुद्रिक लवण प्रसिद्ध उसका क्षार या चूर्ण ? ५ भाग, रुचक-सर्जिक्षार ३ भाग, पारा ३ भाग ।
इन्हें भली प्रकार मिलाकर पद्ममुख कुण्ड में ६३१ दर्जे की उष्णता वेग से त्रिमुखी भस्त्रिका
से वेग से गलावे ॥१२-१६॥
तद्गलितरस पश्चाद् यन्त्रास्ये पूरयेच्छनैः ।
समीकृत चेन्मृदुल केकापिच्छसमप्रभम् ॥१७॥
अदाह्यमच्छेद्य (अत्रोट्य) च भारविवर्जितम् ।
जलाग्निवातातपाद्यैरभेद्य नाशवर्जितम् ॥१८॥
शुद्ध सूक्ष्मस्वरूप च भवेल्लोह त्रिनेत्रकम् ॥१९॥ इत्यादि
इस गलाए हुए लोहरस को यन्त्रमुख में धीरे से भर दे बराबर कर देने पर मृदु मोरपुच्छ
के समान आभा नीलाभ तथा अताप्य अच्छेद्य अत्रोट्य भाररहित हो, जल अग्नि वायु धूप आदि से
विकृत न होनेवाला नाशरहित शुद्ध सूक्ष्मस्वरूप त्रिनेत्र लोहा हो जावे ॥१७-१९॥
यथेष्ट कारयेत् पीठ त्रिनेत्रेण यथाविधि ।
निदर्शनार्थं पीठप्रमाणमत्र प्रचक्षते ॥२०॥
वितस्तिशतमायाम वितस्तित्रयगात्रकम् ।
वर्तुलं कारयेत् पीठ चतुरस्रमथापि वा ॥२१॥
पीठस्य पश्चिमे भागे वितस्तीना तु विंशति ।
विहाय पश्चात् पीठे वितस्तिदशकान्तरात् ॥२२॥
कुर्यादशीतिसंख्याकान् केन्द्ररेखान् यथाक्रमम् ।
चक्रद्रोणिसन्धानायाथ तत्तत्प्रमाणतः ॥२३॥
वितस्त्यशीतिदीर्घं च वितस्तित्रयविस्तृतम् ।
वितस्तिपञ्चकोन्नतमप्याकारे जलद्रोणिवत् ॥२४॥
एव क्रमेण कर्तव्यं जलद्रोणिर्यथा तथा ।
पश्चात् सन्धारयेद् द्रो ( १?) णीन् केन्द्ररेखासु शास्त्रतः ॥२५॥
त्रिनेत्र लोहे से यथेष्ट पीठ बनावे, यहां निदर्शनार्थ पीठप्रमाण कहते हैं । १०० बालिश्त
लम्बा ३ बालिश्त मोटाई में गोल या चौकोर पीठ बनावे । पीठ के पिछले भाग में २० बालिश्त
छोडकर १० बालिश्त के अन्तर पर पीठ में ८० संख्या में केन्द्ररेखाएं यथाक्रम चक्रद्रौणिक
चक्ररूप दण्डे पात्र—घूमने वाले पात्र जोडने के लिये प्रमाण से करे, ८० बालिश्त लम्बा ३ बालिश्त
चौडा ५ बालिश्त ऊंचा आकार में जलद्रोणि की भांति क्रम से करे जलद्रोणि जैसे द्रोणियों को केन्द्र
रेखाओं में लगावे ॥२०-२५॥
द्रोणीनामुपरि भागे वितस्तित्रयविस्तृतम् ।
छिद्रं कुर्यादासमन्तात् सर्वत्र विधिवत् क्रमात् ॥२६॥
स्वान्तर्गतानि चक्राण्यूर्ध्वमाकृष्यातिवेगतः ।
चक्राण्यदृश्यानि यथा तथावरणतः क्रमात् ॥२७॥

त्रिपुरविमान ] [ ३०५
चक्राधोभागमाक्रम्य स्वयं स्थित्वा यथाक्रमम् ।
पुनस्स्वस्थानमासाद्य भूमौ चक्रप्रसारणम् ॥२८॥
यथा भवेत् तथा कीलकानि तेषु प्रकल्पयेत् ।
चक्राणां कल्पयेत् पश्चादीषादण्डान् यथाविधि ॥२९॥
विद्युदाकुञ्चनार्थाय तेष्वाकुञ्चनकीलकान् ।
प्रतिदण्डे यथाशास्त्र मध्यकेन्द्रे नियोजयेत् ॥३०॥
सार्धद्वयवितस्त्युन्नत वितस्त्येकगात्रकम् ।
ईषादण्डप्रमाण स्याच्चक्रमाणा (न?) प्रकीर्त्यते ॥३१॥
वितस्तित्रयमायाम गात्रमेकवितस्तिकम् ।
षडर वाथ सप्तार पञ्चार वा यथोचितम् ॥३२॥
प्रकल्प्य नेम्या सन्धाय मुषीकावरण तथा ।
चक्रान्त्यभागे चतुरङ्गुलमुत्सृज्य शास्त्रत ॥३३॥
द्रोणियों के ऊपरवाले भाग में ३ बालिश्त घेरे का छिद्र सर्वत्र विधि से करे,
अपने अन्तर्गत चक्रों को अति वेग से ऊपर खींचकर अदृश्य चक्रों को जैसे तैसे आवरण से
क्रमश चक्रों के नीचले भाग को आक्रमित कर स्वयं यथाक्रम स्थित होकर पुन अपने
स्थान को प्राप्त हो भूमि में चक्रप्रमाण करना जैसे हो कीलों को उनमें लगावे । पश्चात्
चक्रों के ईषादण्ड—बम—चूल दण्डों को यथाविधि विद्युत् के आकर्षणार्थ उनमें आकर्षण
कीलें प्रतिदण्ड में यथाशास्त्र मध्य केन्द्र में लगावे अढाई बालिश्त मोटा ईषादण्ड का
माप होना चाहिए। चक्र का माप कहा जाता है १ बालिश्त मोटा ६ अरेवाला या ७ अरेवाला
पांच अरेवाला या यथोचित बनाकर नेमि में लगाकर मुषीका ? का आवरण तथा चक्र के अन्तिम भाग
में ४ अंगुल छोड़कर शास्त्र से—॥२८-३३॥
रन्ध्रमन्त प्रकल्प्य काचावरणतः क्रमात् ।
एव सर्वत्र चक्राणां कारयेद् वर्त्तुलं यथा ॥३४॥
चक्रद्रोण्यन्तरे चक्राण्येतानि द्वादश क्रमात् ।
सन्धारयेद् यथेष्ट वा षट् चतुश्चाष्ट एव च ॥३५॥
सोमकान्ताख्यलोहस्य तन्त्रीशक्त्यपकर्षणे ।
चक्रान्तस्थितरन्ध्रेषु सन्धारयेत् पृथक् पृथक् ॥३६॥
एकैकचक्रमध्येथ विद्युदाघातकीलकान् ।
संयोजयेत् ततस्तेषु छिद्रप्रसारणकीलकान् ॥३७॥
सन्धाय तच्चालनार्थ चक्रकीलमत परम् ।
स्थापयेत् तस्योर्ध्वभागे यथा स्वाभिमुखं भवेत् ॥३८॥
साङ्केतकानुसारेण क्रमाच्चक्राणि चालयेत् ।

३०६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
सर्वेषा चक्रद्रोणीनामुपरिष्टान्तरे क्रमात् ॥३६॥
सन्धारयेत् सोमकान्ततन्त्रीद्वयमत परम् ।
पूर्वपश्चिमदेशेषु चक्राणा सन्धिकीलके ॥४०॥
काचावरण से इस प्रकार सब चक्रों का अन्दर गोल छिद्र करना चाहिए । चक्र-
द्रोणियों के अन्दर ये १२ चक्र क्रम से लगावे या यथेष्ट ६, ४, या ८, सोमकान्त लोह ?--
ताम्बा ? की तारों को शक्ति के खींचने में चक्रों के अन्त में स्थित छिद्रों में पृथक् पृथक्
लगावे एक एक चक्र के मध्य विद्युत् को ठोकर देने वाली प्रेरित करने वाली कीलों को
लगावे फिर उनमें दिशाप्रसारण कीलों को लगाकर उनके चलाने को चक्रकील उसके ऊर्ध्व
भाग में अपने सामने स्थापित करे संकेतप्रेरक साधन के अनुसार चक्रों को चलाने सब
चक्रद्रोणियों के ऊपर अन्दर सोमकान्त लोह--ताम्बा ? की दो तार पूर्वपश्चिम स्थानों में और
चक्रों के सन्धिकीलों में लगावे ॥३४-४०॥
आसन्धिकीलमारभ्य तन्त्यन्तं सर्वत क्रमात् ।
विद्युच्छक्त्याकर्षणार्थं शलाकान् संनियोजयेत् ॥४१॥
सर्वचक्रद्रोण्यूर्ध्वभागेष्वपि (च) यथाक्रमम् ।
तन्त्र्यन्तर्गतशक्तिं तच्छलाकै रपकृष्य च ॥४२॥
चोदयेत् सर्वचक्राणामुपरिष्टाद् यथाविधि ।
चक्राधोभागदेशेषु चक्रान्तर्गतं तन्त्रिभि ॥४३॥
चोदयेद् वेगतश्शक्तिं तत्तत्कीलकचालनात् ।
पर्वतारोहणे तिर्यग्गमनादौ विशेषत ॥४४॥
चक्रोर्ध्वाध प्रदेशस्थशक्तिवेगप्रचोदनात् ।
विमानो याति वेगेन शवतधाकुञ्चनतः क्रमात् ॥४५॥
सन्धिकील से लेकर तार के अन्त तक सब ओर क्रम से विद्युत् शक्ति के आकर्षणार्थ
शलाकाओं को लगावे सब द्रोणीचक्रों के ऊपर भागों में भी यथाक्रम तारों के अन्तर्गत शक्ति को उसकी
शलाकाओं से खींच कर सब चक्रों के ऊपर यथाविधि प्रेरित करे, चक्रों के नीचले भाग में चक्रों के
अन्तर्गत तारों से वेग से शक्ति को कील चला कर प्रेरित करे विशेषत पर्वत पर चढने तिरछे चलने
आदि में चक्रों के ऊपर नीचे देश में स्थित शक्ति के वेग की प्रेरणा से विमान वेग से शक्ति के खींचने
से क्रमशः जाता है गति करता है ॥ ४१-४५ ॥
चक्रोर्ध्वशक्त्याकर्षणेनाधश्शक्तिप्रसारणात् ।
यथा यथा प्रगन्तव्य गच्छत्येव तथा स्वत ॥ ४६ ॥
तिर्यञ्चनादौ चक्राणा पुरस्ताच्चक्रकीलकान् ।
सन्धारयेद् यथाशास्त्रं सुदृढ सरल यथा ॥ ४७ ॥
वेगप्रचोदने सूक्ष्मकीलकद्वयमप्यथ ।
सङ्केतकीलचक्रस्योभयपार्श्वे दृढं यथा ॥ ४८ ॥

in line 29: ॥ ५६ ॥.
In line 29: ५६ -> the second digit has a loop at the bottom right.
In line 3: ४ and then... wait, it looks like ६!
Wait, why would it be ४६? Could it be a misprint in the book for ४९?
YES! Printers often make typographical errors, mistaking ९ for ६ or vice versa!
Wait, look at : is it ४६-५०?
If the printer made the typo in L3 as ४६, then in L11 the printer ALSO put ४६-५०!
Wait, let's look at again:
Is it ४६-५० or ४९-५०?
Look at the character: ४ then ६ (or ९) - ५ ०.
Wait, in , look at the loop: it is at the bottom right, just like ६!
Wait, let's look at both possibilities:
Whether it is printed as ४६ or ४९, let's look very carefully.
Wait, let's look at standard Hindi ९:
A standard Hindi ९ has a loop at the TOP left, going down.
A standard Hindi ६ has a loop at the BOTTOM right!
In L3, does the digit have a loop at the top or bottom?
Look

३०८ ] [ बृहद्विमानशास्त्र
समाकृष्याथ विधिवच्चक्रोर्ध्वाधःप्रदेशके ।
सञ्चोदयेद् यथाकाम काचकुप्पिकमध्यतः ॥ ५९ ॥
तेन वेगात् प्रचलन चक्राणा प्रभवेत् क्रमात् ।
पश्चाद् विमानगमन भवेत् साकेततस्स्वयम् ॥ ६० ॥
यथाशास्त्र चक्रसहित एक पीठ मूल के अन्दर नाल लगावे जो कि दो तारों से युक्त हो, पांच-
मुख चक्रों के कीलमुखों के अन्दर से उन कीलों के मध्यस्थित दो तार संस्थापित करे चक्र के ऊपर
नीचे स्थित दो तारों को यथाविधि मिलावे यथा प्रमाण शक्ति इन तारों के मुख से खींच कर विधिवत्
चक्रों के ऊपर नीचे प्रदेश में यथेष्ट प्रेरित करे काचकुप्पी में से इससे वेग से चक्रों का चलना क्रमशः
हो जावे पश्चात् सङ्केत साधन से स्वयं विमान का चलना हो जावे ॥ ५६-६० ॥
पश्चादावरण कुर्याच्चक्रद्रोण्युपरिक्रमात् ।
पीठावृत्तप्रदेशस्थद्रोणीरेखा द्वयान्तरे ॥ ६१ ॥
एकैकस्तम्भवत् सर्वद्रोणीसन्धिषु शास्त्रत ।
स्तम्भप्रतिष्ठा कृत्वार्थ तेषामुपर्यथाक्रमम् ॥ ६२ ॥
शोधिताभ्रकसामग्रीसहायेन दृढ यथा ।
कुर्यादावरण शिल्पशास्त्रमार्गानुसारत ॥ ६३ ॥
पश्चात् चक्र द्रोणी के ऊपर क्रम से आवरण करे, पीठ के आवृत्त प्रदेश में स्थित दो द्रोणियों
के रेखामध्य एक एक स्तम्भ की भांति सब द्रोणी सन्धियों में शास्त्रानुसार स्तम्भप्रतिष्ठा करके अनन्तर
उनके ऊपर यथाक्रम शोधित अभ्रक सामग्री की सहायता से शिल्पशास्त्रमार्गानुसार दृढ आवरण
करे ॥ ६१-६३ ॥
शुद्धाम्बराच्छद्धि ॥ अ० २, सू० २ ॥ १
बो० वृ०
विमानरचना शुद्धव्योमेनैव प्रकल्पयेत् ।
अन्यथा निष्फल यातीत्युक्त सूत्रे यथाविधि ॥ ६४ ॥
प्रसिद्धद्योतनार्थाय हिकार परिकीर्तित ।
तस्माद् यानोम्बरेणैव कर्तव्यमिति निर्णितम् ॥ ६५ ॥
विमान की रचना शुद्ध अभ्रक से ही करनी चाहिये अन्यथा निष्फलता को प्राप्त होता है ऐसा
सूत्र में कहा है प्रसिद्धि द्योतनार्थ हि शब्द कहा गया है अतः विमान अभ्रक से ही करना चाहिये यह
निर्णय किया है ॥ ६४-६५ ॥
अभ्रकलक्षणमुक्तं धातुसर्वस्वे— अभ्रक लक्षण कहा है धातुसर्वस्व में—
चत्वार्यंभ्रकजातिस्स्याद् ब्रह्मक्षत्रादिभेदत ॥ ६६ ॥
श्वेताभ्रको ब्रह्मजाति क्षत्रियो रक्तवरांक ।
पीताभ्रको वैश्यजाति कृष्णशूद्राभ्रको भवेत् ॥ ६७ ॥

त्रिपुरविमान ] [ ३०६
ब्रह्माभ्रकप्रभेदास्तु भवेत्तु षोडशधा क्रमात् ।
रक्ताभ्रको , द्वादशभेदेन सुविराजित. ॥ ६८ ॥
वैश्यजातिस्सप्तधा स्याच्छूद्रः पञ्चदश क्रमात् ।
आहत्य पञ्चाशद् भेदाश्शून्यस्याहुर्मनीषिणः ॥ ६९ ॥
ब्राह्मण क्षत्रिय आदि भेद से अभ्रक की चार जाति हैं । श्वेत अभ्रक ब्राह्मण, रक्त अभ्रक
क्षत्रिय, पीत अभ्रक वैश्य और कृष्ण अभ्रक शूद्र है । ब्राह्मण अभ्रक के १६ भेद हैं क्षत्रिय अभ्रक
के १२ भेद वैश्य अभ्रक के ७ भेद और शूद्र अभ्रक १५ भेद का है । इस प्रकार मिलाकर ५० भेद
अभ्रक के मनीषी जनों ने कहे हैं ॥ ६८--६९ ॥
उक्तं हि शौनकीये — शौनकीय सूत्र में कहा ही है—
अथाम्बरस्वरूपं व्याख्यास्यामोऽत्र चत्वारो वर्णा ब्रह्माक्षत्रियवैश्यशूद्र-
भेदात् । तेषां प्रभेदा पञ्चाशत् तत्र ब्रह्माजातिष्षोडश क्षत्रियजातिद्वादश वैश्य-
जातिस्सप्त शूद्रजाति पञ्चदशाहत्य पञ्चाशत् , तेषां नामान्यनुक्रमिष्याम ।
ब्रह्माम्बरस्य रव्यम्बरभ्राजकरोचिष्मकपुण्डरीकविरञ्चिकवज्रगर्भकोशाम्बर-
सौवर्चलसोमकामृतनेत्रशैत्यमुखकुरन्दरुद्रास्यपञ्चोदररुक्मगर्भश्चेति षोडश
नामानि भवन्ति । अथ शुण्डीरकशाम्बररेखास्यौदुम्बरभद्रकपञ्चास्याशु-
मुखरक्तनेत्रमणिगर्भकरोहिणकसोमांशककौमिकश्चेति द्वादश रक्ताभ्रकनामानि
भवन्ति । वैश्याभ्रकस्य कृष्णमुखश्यामरेखगरलकोशपञ्चधाराम्बरीषकमणि-
गर्भक्रौञ्चास्य इति सप्त नामधेयानि भवन्तीति । अथ शूद्रस्य गोमुखकन्दुरक-
शौण्डिकमुग्धास्यविषगर्भमण्डूकतैलगर्भरेखास्यपार्वणिकराकाशुकप्राणदद्रोणिक-
रक्तबन्धकरसग्राहकव्रणहारिकश्चेति पञ्चदशनामधेयानि भवन्तीति ॥ ७० ॥
अब अभ्रक के स्वरूप का आख्यान करेंगे । इसके चार वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र भेद
से उनके ५० प्रकार होते हैं उनमें ब्राह्मण १६ क्षत्रिय १२ वैश्य ७ और शूद्र १५ हैं मिला कर ५० हैं,
उनके नामों को कहेंगे । ब्राह्मण अभ्रक के रवि, अम्बर, भ्राजक, रोचिष्मक, पुण्डरीक, विरञ्चिक, वज्रगर्भ,
कोशाम्बर, सौवर्चल, सोमक, अमृतनेत्र, शैत्यमुख, कुरन्द, रुद्रास्य, पञ्चोदर, रुक्मगर्भ ये १६ नाम होते
हैं । और शुण्डीरक, शाम्बर, रेखास्य, औदुम्बर, भद्रक, पञ्चास्य, अंशुमुख, रक्तनेत्र, मणिगर्भ, रोहिणिक,
सोमांशक, कौर्मिक ये रक्ताभ्रक—क्षत्रिय अभ्रक के नाम हैं । वैश्य अभ्रक के कृष्णमुख, श्यामरेख,
गरलकोश, पञ्चधार, अम्बरीषक, मणिगर्भ, कौञ्चास्य ये ७ नाम होते हैं । और शूद्र अभ्रक के गोमुख,
कन्दुरक, शौण्डिक, मुग्धास्य, विषगर्भ, मण्डूक, तैलगर्भ, रेखास्य, पार्वणिक, रक्तांशुक, प्राणद, द्रोणिक,
रक्तबन्धक, रसग्राहक, व्रणहारिक ये १५ नाम होते हैं ॥ ७० ॥
पुण्डरीको रोहिणिक पञ्चधारश्च द्रोणिक ।
चातुर्वर्ण्यक्रमात् तेषु व्योमयानक्रियार्हका ॥ ७१ ॥
चत्वार्येते विशेषेण यानसामग्र्यकर्मणि ।
शास्त्रज्ञै बहुधा प्रोक्तास्सम्यक् श्रेष्ठतमा इति ॥७२ ॥