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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 327

३८४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
सामुद्रिक लवण प्रसिद्ध उसका क्षार या चूर्ण ? ५ भाग, रुचक-सर्जिक्षार ३ भाग, पारा ३ भाग ।
इन्हें भली प्रकार मिलाकर पद्ममुख कुण्ड में ६३१ दर्जे की उष्णता वेग से त्रिमुखी भस्त्रिका
से वेग से गलावे ॥१२-१६॥
तद्गलितरस पश्चाद् यन्त्रास्ये पूरयेच्छनैः ।
समीकृत चेन्मृदुल केकापिच्छसमप्रभम् ॥१७॥
अदाह्यमच्छेद्य (अत्रोट्य) च भारविवर्जितम् ।
जलाग्निवातातपाद्यैरभेद्य नाशवर्जितम् ॥१८॥
शुद्ध सूक्ष्मस्वरूप च भवेल्लोह त्रिनेत्रकम् ॥१९॥ इत्यादि
इस गलाए हुए लोहरस को यन्त्रमुख में धीरे से भर दे बराबर कर देने पर मृदु मोरपुच्छ
के समान आभा नीलाभ तथा अताप्य अच्छेद्य अत्रोट्य भाररहित हो, जल अग्नि वायु धूप आदि से
विकृत न होनेवाला नाशरहित शुद्ध सूक्ष्मस्वरूप त्रिनेत्र लोहा हो जावे ॥१७-१९॥
यथेष्ट कारयेत् पीठ त्रिनेत्रेण यथाविधि ।
निदर्शनार्थं पीठप्रमाणमत्र प्रचक्षते ॥२०॥
वितस्तिशतमायाम वितस्तित्रयगात्रकम् ।
वर्तुलं कारयेत् पीठ चतुरस्रमथापि वा ॥२१॥
पीठस्य पश्चिमे भागे वितस्तीना तु विंशति ।
विहाय पश्चात् पीठे वितस्तिदशकान्तरात् ॥२२॥
कुर्यादशीतिसंख्याकान् केन्द्ररेखान् यथाक्रमम् ।
चक्रद्रोणिसन्धानायाथ तत्तत्प्रमाणतः ॥२३॥
वितस्त्यशीतिदीर्घं च वितस्तित्रयविस्तृतम् ।
वितस्तिपञ्चकोन्नतमप्याकारे जलद्रोणिवत् ॥२४॥
एव क्रमेण कर्तव्यं जलद्रोणिर्यथा तथा ।
पश्चात् सन्धारयेद् द्रो ( १?) णीन् केन्द्ररेखासु शास्त्रतः ॥२५॥
त्रिनेत्र लोहे से यथेष्ट पीठ बनावे, यहां निदर्शनार्थ पीठप्रमाण कहते हैं । १०० बालिश्त
लम्बा ३ बालिश्त मोटाई में गोल या चौकोर पीठ बनावे । पीठ के पिछले भाग में २० बालिश्त
छोडकर १० बालिश्त के अन्तर पर पीठ में ८० संख्या में केन्द्ररेखाएं यथाक्रम चक्रद्रौणिक
चक्ररूप दण्डे पात्र—घूमने वाले पात्र जोडने के लिये प्रमाण से करे, ८० बालिश्त लम्बा ३ बालिश्त
चौडा ५ बालिश्त ऊंचा आकार में जलद्रोणि की भांति क्रम से करे जलद्रोणि जैसे द्रोणियों को केन्द्र
रेखाओं में लगावे ॥२०-२५॥
द्रोणीनामुपरि भागे वितस्तित्रयविस्तृतम् ।
छिद्रं कुर्यादासमन्तात् सर्वत्र विधिवत् क्रमात् ॥२६॥
स्वान्तर्गतानि चक्राण्यूर्ध्वमाकृष्यातिवेगतः ।
चक्राण्यदृश्यानि यथा तथावरणतः क्रमात् ॥२७॥