बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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सतन्त्रीणि यथाशास्त्र मध्यभागे च योजयेत् ।
आविद्युन्नालमारभ्य चक्राण्यावृत्य च क्रमात् ॥२४॥
आहृत्य शृङ्खलाकारतन्त्रीस्तम्भान्तरे दृढम् ।
अन्त कीलमुखे सम्यग्योजयेत्सरल यथा ॥२५॥
एक बालिश्त लम्बाई से युक्त मोटे चार बालिश्त ऊंचे ऊपर लम्बे स्तम्भों को संस्थापित
करे, उनमें तार लेजानेवाली कीलों को भी दृढ लगावे पश्चात् शक्तिनाल के अवधिक्रम से दोनों पार्श्वों
में ८ अङ्गुल लम्बे चौडे चक्र तारसहित यथाशास्त्र मध्य में लगावे । विद्युत् की नाल से लेकर क्रम से
चक्रों को घेरकर—चक्रों के ऊपर से लाकर शृङ्खलाकार—जंजीर जैसी तारों को स्तम्भ के अन्दर भीतरी
कीलमुख में सम्यक् सरल युक्त करे ॥२४-२५॥
पश्चाच्चषकवत् तस्योपरि कीलसमन्वितम् ।
संस्थापयेद् बटनिकामन्तरावृत्तकुङ्मलाम् ॥२६॥
तस्मिन्नङ्गुष्ठविक्षेपादन्तस्स्खलन यथा ।
तथा भ्रामकचक्राणि कीलकंस्सह योजयेत् ॥२७॥
यथा बटनिकोपर्यह्ङ्गुष्ठविक्षेपण भवेत् ।
तत्क्षणात् स्तम्भान्तरस्थचक्रकील्यान्यथाक्रमात् ।२८।॥
परिभ्रमन्ति वेगेन विद्युत्संयोजनात् स्वतः ।
पुनर्विद्युन्नालमुखाच्चक्रकीलान्यथाक्रमम् ॥२६॥
एतत्प्रेक्षणतस्सम्यग्भ्राम्यन्ते शक्तियोगत. ।
एतेन पञ्चसहस्रलिङ्गुवेग प्रजायते ॥३०॥
फिर पात्र (गिलास आदि) की भांति उस स्तम्भ के ऊपर कील से युक्त बटनिका-बटन या
घुण्डी अन्दर घूमने वाले कुङ्मल-आधे खिले फूल के समानाकार वाले पेंच (चाबी) से घिरी हुई को
संस्थापित करे, उसमें अङ्गुठे के विक्षेप से-अंगूठे द्वारा दबाने से अन्दर सञ्चलन-गति जिससे हो जावे
इस रीति घूमने वाले चक्रकीलों के साथ युक्त कर दे कि जैसे ही बटन या घुण्डी के ऊपर अङ्गूठे का
दबाव हो तो तुरन्त स्तम्भके अन्दर स्थित चक्रों की कीलें-पेंच यथाक्रम से विद्युत्के संयोगसे स्वतः वेग से
घूमने लगते हैं-घूमने लगें । फिर विद्युत् के नालमुख से कीलें यथाक्रम इस प्रैंखण-झूलाने साधन से
सम्यक् शक्तियोग से घूमते हैं, इससे पांच सहस्र लिङ्गु (डिग्री) का वेग उत्पन्न हो जाता है ॥२६-३०॥
अथ विमानोड्डीयनादिनिर्णय. — अब विमान के उड़ने आदि का निर्णय —
एतच्छ्लङ्घाकघर्षणेन पीठाधस्ताद् यथाक्रमम् ।
आकुञ्चितान्य पिण्डचकारिण प्रभवन्ति हि ॥ ३१ ॥
तच्चक्रेस्ताडित पीठ ऊर्ध्वं गच्छति खे क्रमात् ।
पीठोपरिस्थचक्रस्तम्भस्थकीलप्रचालनात् ॥ ३२ ॥
अत्यन्तवेगतस्स्तम्भभ्रमण प्रभवेत् क्रमात् ।