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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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रुक्मविमान ] [ २६५
तेनोर्ध्वंगमनं वेगात् स्तम्भाना भवति स्वतः ॥ ३३ ॥
आरोहणावरोहणक्रमात् सव्यापसव्यत ।
शक्तिसंयोजनात् सम्यग्भ्राम्यन्त्येव मुहुर्मुहुः ॥ ३४ ॥
चक्रताडनतोधस्तात् स्तम्भाकर्षणोपरि ।
उड्डीयोड्डीय वेगेन विमान खपथे क्रमात् ॥ ३५ ॥
यात्यूर्ध्वं सरलात् सम्यग्गतिमम्भीरतस्स्वयम् ।
एतेनोर्ध्वं विमानस्य खपथारोहण भवेत् ॥ ३६ ॥
इस वेगरूप शक्ति के आकर्षण से पीठ के नीचे स्थित लोहपिण्ड चक्र खींचे हुए हो जाते हैं
उन चक्रों से ताड़ित पीठ के ऊपर आकाश में क्रम से चला जाता है, फिर पीठ के ऊपर स्थित चक्रस्तम्भस्थ
कील प्रचालन से अत्यन्त वेग से स्तम्भ का भ्रमण होता है उससे वेग से स्तम्भों का स्वतः ऊर्ध्व गमन
होता है। आरोहण - ऊपर जाने अवरोहण-नीचे आने के क्रम से दाएं बाएं से शक्ति को युक्त करने
से पुन पुनः सम्यक् घूमते हैं, चक्रताडन द्वारा नीचे से ऊपर स्तम्भ के आकर्षण से विमान वेग से उड़
कर आकाश मार्ग में क्रम से ऊपर सम्यक् सरलता और गम्भीरता से चला जाता है इससे विमान का
आकाश मार्ग में आरोहण हो जावे-हो जाता है ॥ ३१-३६ ॥
अथ गमनोपयुक्तविद्युन्नालचक्राणि - अथ गमन में उपयुक्त विद्युत् की नालों के चक्र कहते हैं -
पीठस्योपरि शास्त्रोक्तसख्यारेखानुसारत ।
विहायैकवितस्त्यन्तराय नालद्वयान्तरे ॥ ३७ ॥
विद्युन्नालानि विधिवत् सचक्राणि यथाक्रमम् ।
सन्धारयेद् विशेषेण ओतप्रोतात्मना तत ॥ ३८ ॥
एकैकविद्युन्नालस्य पार्श्वयोर्भयोरपि ।
वितस्तिद्वयमायाम वितस्त्येकोन्नत तथा ॥ ३९ ॥
कल्पयित्वा दन्तचक्राण्यथ तेषा परस्परम् ।
सम्मेलयित्वा विधिवत् कीलैस्सम्भ्रामकैस्तथा ॥ ४० ॥
विद्युत्तन्त्रीस्समाहृत्य एतत्कीलमार्गत ।
प्रतिचक्रोपरि यथा सम्यक् सन्धारयेत् क्रमात् ॥ ४१ ॥
प्रतिविद्युन्नालमूले विद्युत्सञ्चोदनाय हि ।
वितस्तित्रयमायाम वितस्तित्रयमुन्नतम् ॥ ४२ ॥
एकैकचक्रं सरल स्थापयेत् नांग्रिसंयुतम् ।
विहाय विन्नालानि मध्ये स्तम्भ नियोजयेत् ॥ ४३ ॥
शास्त्र में कही संख्यारेखा-विचारधारा के अनुसार पीठ के ऊपर दो नालों के अन्दर एक एक
बालिश्त का अन्तराय भेद-दूरी छोड़ कर चक्रसहित विद्युन्नालें यथाक्रम विधिवत् लगावे, विशेषत ओत-
प्रोत रूप से फिर एक एक विद्युन्नाल के दोनों पार्श्वों में भी २ बालिश्त लम्बा २ बालिश्त ऊंचे दन्त-