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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 321

२६८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
वेगस्सजायते तस्माद् विमानं घटिकान्तरे ।
पञ्चोत्तरशतक्रोशपर्यन्तं धावति दृढम् ॥ ६४ ॥
एवं कृत्वा विमानस्य गमनाभिमुखं क्रमात् ।
दिशाभिमुखीकर्तुं कीलकान्युच्यन्तेऽधुना ॥ ६५ ॥
पाच मुख वाली कील में सम्बद्ध शक्तिक्रम से प्रविष्ट हो जावे, भीतरी पात्र में रखे वेगिनीतैल
से फिर वह शक्ति विस्तृत हो वेग से दो नालों में से प्रगति करती है बाहिर जाती है सर्वत्र दण्डस्थ सब
चक्रों को क्रमश वेग से शक्तिचालन की भांति घुमाती है इससे २५ सहस्र लिङ्क (डिग्री) के प्रमाण
से वेग हो जाता है उससे विमान एक घड़ी के अन्दर १०५ कोश दौड़ता है इस प्रकार विमान का गमन
लक्ष्य करके दिशा को अभिमुख करने के लिए अब कीलें कही जानी हैं ॥ ६१-६५ ॥
ईशाम्यादिक्रमात्पीठस्याष्टदिक्षु यथाक्रमम् ।
वितस्तीनां पञ्चदशोन्नतमायामतस्तथा ॥ ६६ ॥
वितस्तिद्वयमानं च स्तम्भं कुर्याद् दृढं यथा ।
वितस्तिदशकादेकस्तम्भवत् सङ्ख्यया क्रमात् ॥ ६७ ॥
सङ्गुण्य पीठदेशेथ यावत्सङ्ख्या भविष्यति ।
तावत्सङ्ख्यानुसारेण स्तम्भान् पूर्वोक्तवद् दृढान् ॥ ६८ ॥
कल्पयित्वाथ संस्थाप्य पञ्चकण्टा (ण्ठो ?) ज्वलान्वितान् ।
अभ्रकेन कृतान् पश्चात् तेषामुपरि शास्त्रतः ॥ ६६ ॥
यानाङ्गसर्वस्थानानि गृहकुड्यादिकानपि ।
पूर्वोक्तरुच (रु ?) क व्योमयानवत् कारयेत् क्रमात् ॥ ७० ॥
गृहोपयुक्तसामग्रयञ्चाभ्रकादेव कारयेत् ।
अन्यथा निष्फलमिति प्रवदन्ति मनीषिण ॥ ७१ ॥
पीठ की ईशानी आदि आठ दिशाओं- विशोपदिशाओं में यथाक्रम १५ बालिश्त ऊंचा
लम्बा चौडा मोटा २ बालिश्त मान में दृढ स्तम्भ करे १० बालिश्त का एक स्तम्भ जैसा सख्या से गुणा
कर दश दश क्रम कर निर्दिष्ट कर पीठ देश में जितनी संख्या होगी उतनी संख्यानुसार स्तम्भ बना कर
संस्थापित कर पांच कण्ट-( बिद्युत् के ) केन्द्र या कण्टे झाडफानूस ज्वाला-दीप्ति-प्रकाश से युक्त
अभ्रक से बने फिर उनके ऊपर शास्त्रानुसार याताङ्गों के सर्वस्थान घर कमरे भित्ति आदि भी पूर्वोक्त
रुचक-रुक्म व्योमयान की भांति क्रमश करावे, घर की उपयुक्त सामग्री भी अभ्रक से करावे अन्यथा
निष्फल है ऐसा मनीषी कहते हैं ॥ ६६-७१ ॥
तदुक्तं क्रियासारे-वह कहा है क्रियासार ग्रन्थ में-
शारग्राव* पञ्चविंशत् तथैव द्विवङ्गास्त्व त्रिंशतिश्चाष्टविंशद् ।
गुञ्जाक्षार टङ्कण द्वादशांशं रोद्रीमूलं चाष्टभाग समग्रम् ॥ ७२ ॥

  • क्षारग्राव होना ठीक है।