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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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रुक्मविमान ] [ २६६
चान्द्रीपुष्पक्षारमेकाशकं च शून्यं च पश्चात् पाकशुद्ध शतांशम् ।
सम्पूर्येतान् कूर्ममूषामुखेऽथ पद्माकुण्डे स्थाप्य भस्त्रामुखेन ।। ७३ ।।
सञ्ज्वाल्राष्टशतकक्ष्योष्णवेगात् पश्चाद् यन्त्रे पूरयेद् वेगतोय ॥ इत्यादि ॥
क्षारभाव—क्षारभाव—ग्रावक्षार–पत्थर का क्षार अर्थात् चूना २५ भाग, द्विवङ्गासत्त्व—कमीस ?
३० भाग, गुञ्जाक्षार २८ भाग, सुहागा ८२ भाग, रौद्रीमूल शङ्कुर जटा ८ भाग, श्वेत कण्टकारी के फूलों
का क्षार १ भाग पश्चात् पाक शुद्ध शून्य—आकाश—अभ्रक १०० भाग इन सब को लेकर कूर्ममूषा
मुख तापयन्त्र में भर कर पद्माकार कुण्ड में रख कर भस्त्रामुख से ८०० दर्जे की उष्णता के वेग से गलाकर
तुरन्त यन्त्र में डाल दे ॥ इत्यादि ॥
एव कृतेऽभ्रकश्शुद्ध. सर्वकार्यक्षमो दृढ ।
अत्यन्तमृदुलश्चित्रवर्णैश्च सुविराजित ।। ७४ ।।
हर्षप्रदश्च सर्वेषा प्रभवेन्नात्र संशय ।
स्तम्भकुड्यगृहादीनि एतेनैव प्रकल्पयेत् ।। ७५ ।।
कल्पयित्वा व्योमयाने गृहाद्याश्शास्त्रस्तत ।
व्योमयान प्रेरयितु सर्वदिक्षु यथोचितम् ।। ७६ ।।
परिवर्तनावर्तनकीलकानि यथाक्रमम् ।
यानादिमध्यान्त्यभागेष्वष्टदिक्षु यथाक्रमम् ।। ७७ ।।
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