बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिपुराविमान ] [ ३०३
एकधा कीलकंस्सम्यग्भागत्रयमत क्रमात् ।
एकीकृत्य यथाशास्त्र चोदयेद् यदि खे ह्वत' ॥७॥
एकस्वरूपतस्सम्यग्विमानस्त्रिपुराभिधः ।
साङ्केतकानुसारेण वेगात् सञ्चरति ध्रुवम् ॥८॥
पृथिव्यप्स्र्वन्तरिक्षेषु गमनार्थं यथाविधि ।
त्रिधा विभज्यते व्योमयानशास्त्रविधानत ॥६॥
तेष्वादिमविभागस्य रचनाविधिरुच्यते ।
त्रिनेत्रेणैव लोहेन त्रिपुरं कारयेत् सुधी ॥१०॥
अन्यथा निष्फल यातीत्यादुर्लोहविदो वरा ।
तस्मादादौ त्रिनेत्राख्यलोह सम्पादयेन्नर ॥११॥
त्रिपुर विमान के यथाक्रम तीन भाग होते हैं उनमें प्रथम भाग का सञ्चार पृथिवी तल पर,
दूसरे भाग का गमन जल के अन्दर बाहिर क्रम से, तीसरे भाग का सञ्चार तो आकाश में स्वत होता
है । एक साथ कीलों से सम्यक् तीनों भागों को यथाशास्त्र एक करके—मिलाकर यदि आकाश में प्रेरित
किया जावे तो एक स्वरूप हुआ त्रिपुर--विमान सङ्केत करनेवाले पुर्जे से वेग से निश्चित चलता है ।
पृथिवी पर जलों में आकाश में जाने के लिये शास्त्र से यथाविधि तीन प्रकार से विभक्त हो जाता है ।
उनमें प्रथम विमान की रचनाविधि कही जाती है कि त्रिनेत्र लोहे से ही बुद्धिमान् जन त्रिपुर विमान
करावे, नहीं तो निष्फलता को प्राप्त हो जाता है ऐसा उत्तम लोहवेत्ता जन कहते हैं अत आदि में
त्रिनेत्रनामक लोहे को तैयार करे ॥५--११॥
त्रिनेत्रलोहमूक्तं शाकटायनेन - त्रिनेत्र लोहा कहा है शाकटायन ने—
दश रोचिष्मतीलोह. कान्तमित्रोष्ट एव च ।
षोडशांशो वज्रमुखश्चेति भागविनिर्णय ॥१२॥
एतद्भागानुसारेण लोहत्रयमत परम् ।
मूषामुखे विनिक्षिप्य तस्मिन् पश्चाद् यथाक्रमम् ।।१३।।
टङ्गण पञ्च (च) तद्वत् त्रैशिक सप्त एव च ।
एकादश श्रपणिको पञ्च माण्डलिकस्तथा ॥१४॥
रुचक पारदश्चैव त्रीणि त्रीणि पृथक् पृथक् ।
सम्यक् संयोज्य विधिवत् कुण्डे पद्ममुखे दृढम् ॥१५॥
एकत्रिशदुत्तरषट्शतकश्योष्णवेगत ।
त्रिमुखीभस्त्रिकात् सम्यग् गालयेदतिवेगत. ॥१६॥
१० भाग रोचिष्मतीलोहा—कान्त लोहा ?, ८ भाग कान्तमित्र लोहा—मुण्ड लोहा ?,
१६ भाग वज्रमुख लोहा—तीक्ष्ण लोहा ? इस प्रकार भागानुसार तीनों लोहे मूषा बोतल के मुख
में डालकर फिर उसमें सुहागा ५ भाग, त्रैशिक-अर्थं त्त्रिक त्र्यं क्षी शल्लकी के कांटों का क्षार ?
या त्रिण यवतृण का क्षार यवक्षार ७ भाग, श्रपणिक ? ११ भाग, माण्डलिक--मण्डल--चक्रक