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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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त्रिपुरविमान ] [ ३०६
ब्रह्माभ्रकप्रभेदास्तु भवेत्तु षोडशधा क्रमात् ।
रक्ताभ्रको , द्वादशभेदेन सुविराजित. ॥ ६८ ॥
वैश्यजातिस्सप्तधा स्याच्छूद्रः पञ्चदश क्रमात् ।
आहत्य पञ्चाशद् भेदाश्शून्यस्याहुर्मनीषिणः ॥ ६९ ॥
ब्राह्मण क्षत्रिय आदि भेद से अभ्रक की चार जाति हैं । श्वेत अभ्रक ब्राह्मण, रक्त अभ्रक
क्षत्रिय, पीत अभ्रक वैश्य और कृष्ण अभ्रक शूद्र है । ब्राह्मण अभ्रक के १६ भेद हैं क्षत्रिय अभ्रक
के १२ भेद वैश्य अभ्रक के ७ भेद और शूद्र अभ्रक १५ भेद का है । इस प्रकार मिलाकर ५० भेद
अभ्रक के मनीषी जनों ने कहे हैं ॥ ६८--६९ ॥
उक्तं हि शौनकीये — शौनकीय सूत्र में कहा ही है—
अथाम्बरस्वरूपं व्याख्यास्यामोऽत्र चत्वारो वर्णा ब्रह्माक्षत्रियवैश्यशूद्र-
भेदात् । तेषां प्रभेदा पञ्चाशत् तत्र ब्रह्माजातिष्षोडश क्षत्रियजातिद्वादश वैश्य-
जातिस्सप्त शूद्रजाति पञ्चदशाहत्य पञ्चाशत् , तेषां नामान्यनुक्रमिष्याम ।
ब्रह्माम्बरस्य रव्यम्बरभ्राजकरोचिष्मकपुण्डरीकविरञ्चिकवज्रगर्भकोशाम्बर-
सौवर्चलसोमकामृतनेत्रशैत्यमुखकुरन्दरुद्रास्यपञ्चोदररुक्मगर्भश्चेति षोडश
नामानि भवन्ति । अथ शुण्डीरकशाम्बररेखास्यौदुम्बरभद्रकपञ्चास्याशु-
मुखरक्तनेत्रमणिगर्भकरोहिणकसोमांशककौमिकश्चेति द्वादश रक्ताभ्रकनामानि
भवन्ति । वैश्याभ्रकस्य कृष्णमुखश्यामरेखगरलकोशपञ्चधाराम्बरीषकमणि-
गर्भक्रौञ्चास्य इति सप्त नामधेयानि भवन्तीति । अथ शूद्रस्य गोमुखकन्दुरक-
शौण्डिकमुग्धास्यविषगर्भमण्डूकतैलगर्भरेखास्यपार्वणिकराकाशुकप्राणदद्रोणिक-
रक्तबन्धकरसग्राहकव्रणहारिकश्चेति पञ्चदशनामधेयानि भवन्तीति ॥ ७० ॥
अब अभ्रक के स्वरूप का आख्यान करेंगे । इसके चार वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र भेद
से उनके ५० प्रकार होते हैं उनमें ब्राह्मण १६ क्षत्रिय १२ वैश्य ७ और शूद्र १५ हैं मिला कर ५० हैं,
उनके नामों को कहेंगे । ब्राह्मण अभ्रक के रवि, अम्बर, भ्राजक, रोचिष्मक, पुण्डरीक, विरञ्चिक, वज्रगर्भ,
कोशाम्बर, सौवर्चल, सोमक, अमृतनेत्र, शैत्यमुख, कुरन्द, रुद्रास्य, पञ्चोदर, रुक्मगर्भ ये १६ नाम होते
हैं । और शुण्डीरक, शाम्बर, रेखास्य, औदुम्बर, भद्रक, पञ्चास्य, अंशुमुख, रक्तनेत्र, मणिगर्भ, रोहिणिक,
सोमांशक, कौर्मिक ये रक्ताभ्रक—क्षत्रिय अभ्रक के नाम हैं । वैश्य अभ्रक के कृष्णमुख, श्यामरेख,
गरलकोश, पञ्चधार, अम्बरीषक, मणिगर्भ, कौञ्चास्य ये ७ नाम होते हैं । और शूद्र अभ्रक के गोमुख,
कन्दुरक, शौण्डिक, मुग्धास्य, विषगर्भ, मण्डूक, तैलगर्भ, रेखास्य, पार्वणिक, रक्तांशुक, प्राणद, द्रोणिक,
रक्तबन्धक, रसग्राहक, व्रणहारिक ये १५ नाम होते हैं ॥ ७० ॥
पुण्डरीको रोहिणिक पञ्चधारश्च द्रोणिक ।
चातुर्वर्ण्यक्रमात् तेषु व्योमयानक्रियार्हका ॥ ७१ ॥
चत्वार्येते विशेषेण यानसामग्र्यकर्मणि ।
शास्त्रज्ञै बहुधा प्रोक्तास्सम्यक् श्रेष्ठतमा इति ॥७२ ॥