सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 319, कुल 368 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 319

२६६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
चक्रों-दान्तों वाले चक्र बना कर उनका परस्पर सम्मेल करके-परस्पर एक दूसरे से दान्तों द्वारा फंसा कर
घूमने वाली कीलों से विद्युत् के तारों को लेकर इन कीलों के मार्ग से प्रत्येक चक्र पर क्रम से ठीक ठीक
युक्त करे । प्रत्येक विद्युन्नाल के मूल में विद्युत् को प्रेरित करने के लिए ३ बालिशत लम्बा ३ बालिशत
ऊंचा एक एक चक्र तारसहित सरल स्थापित करे, २० नालों को छोड कर मध्य में स्तम्भ नियुक्त
करे ॥ ३७-४३ ॥
उक्तं हि नारायणेन-कहा ही है नारायण ने-
चतुर्वितस्त्यायामं च तावदेवोन्नतं तथा ।
स्तम्भं कृत्वाथ तन्मध्ये वितस्तिद्वयमानतः ॥ ४४ ॥
आस्यवत्कल्पयेत् सम्यक् त्रिधा तस्मिन् यथाविधि ।
विभज्य समभागेन पश्चात् स्थानत्रये क्रमात् ॥ ४५ ॥
कीलकानि यथाशास्त्रं तत्र तत्र नियोजयेत् ।
चक्रषट्कसमायुक्तं काचकङ्कभिरन्वितम् ॥ ४६ ॥
सनालकङ्कुकावृत तन्त्रीद्वयसमन्वितम् ।
विद्युच्छक्त्याकर्षणार्थं स्थापयेत् कीलकद्वयम् ॥ ४७ ॥
स्तम्भस्य प्रथमे भागे एव सन्धार्य कीलके ।
द्वितीयभागे तच्छक्तिप्रेरणार्थं यथाविधि ॥ ४८ ॥
चक्रपञ्चकसंयुक्तं काचावरणसयुतम् ।
नालद्वयेन सयुक्त तन्त्रीद्वयसमन्वितम् ॥ ४६ ॥
शक्तिप्रवाहतन्त्रग्रोमूलं प्रदेशे त्रिदण्डकम् ।
सम्प्रेषितान्तश्चषक वेणिनी तैलसयुतम् ॥ ५० ॥
पञ्चास्यकीलकं सम्यक् स्थापयेत् सुदृढ यथा ।
४ बालिशत लम्बा ४ बालिशत ही ऊंचा स्तम्भ पीठ के मध्य में बना कर २ बालिशत मान से
मुख की भांति तीन प्रकार की उसमें समान भाग का विभाग करके तीन स्थानों में कीलें यथाशास्त्र
वहां नियुक्त करे ६ चक्रों से युक्त काचकंकुशों-काच के मुखों (दीपरक्षकों ?) से युक्त नालसहित चर्मा-
वरण से घिरे हुए दो तारों से युक्त दो कीलें विद्युत् शक्ति के आकर्षणार्थ लगावे । स्तम्भ के प्रथम भाग
में इस प्रकार दो कीलें लगा कर द्वितीय भाग में उस शक्ति के पहुंचाने प्रेरित करने के लिए यथाविधि
पाच चक्रों से युक्त काचावरणसहित दो नालों के साथ दो तारों से युक्त शक्तिप्रवाहक दो तारों के मूल-
प्रदेश में तीन दण्डों वाले प्रेरित किए अन्दर चषक-पात्र वेणिनी तैल जिसमें हो पाच मुख वाले कील
को सम्यक् दृढ स्थापित करे ॥ ४४-५० ॥
शक्तिप्रवाहसङ्घटनेन वेगाद् यथाक्रमम् ॥ ५१ ॥
तत्रत्यचक्रभ्रमणं भवेद् वेगाद् यथाक्रमात् ।
तथा सन्धारयेत् कीलकानि तृतीये यथाक्रमम् ॥ ५२ ॥