बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहस्तलेख कापी संख्या २१—
(यह हस्तलेख कापी संख्या २३ है परन्तु यह भाग (मैटर) हस्तकापीसंख्या २१ से पूर्व का है
२३, फिर २२ फिर २१ होना चाहिए। २० के पश्चात् २१ जो हस्तलेख रजिस्टर में है वह वस्तुतः २३
संख्या है उसके मध्य में बहुत भाग (मैटर) शेष है वह कहां है ? कुछ पता नहीं )
त्रिपुरोध ॥ अ० २ सू० १ ॥ १
बो० वृ०
शकुनाद्यैसिंहिकान्तविमानानि यथाविधि ।
उक्त्वेदानीं त्रिपुरविमानससम्यक् प्रचक्षते ॥१॥
अस्य त्रिपुरविमानस्यावरणानि त्रय क्रमात् ।
एकै कावरणस्यात्र पुरमित्यभिधीयते ॥२॥
पुरत्रयेण सयुक्तं विमानं त्रिपुरं विदुः ।
भास्करांशुसमुद्भूतशक्त्या सचोदितं भवेत् ॥३॥
शकुन विमान को आदि बना सिंहिक विमान के अन्त तक † यथाविधि कहकर अब त्रिपुर
विमान कहते हैं, इस त्रिपुर विमान के क्रम से तीन आवरण हैं एक एक आवरण का नाम पुर कहा
जाता है, तीन पुरों से संयुक्त होने से विमान को त्रिपुर जानते हैं, सूर्यकिरणों से प्रकट हुई शक्ति से
प्रेरित होता है चलता है ॥३॥
नारायणोपि—नारायण आचार्य भी कहते हैं—
पृथिव्यप्स्र्वन्तरिक्षेषु स्वाङ्गभेदात् स्वभावत ।
यस्समर्थो भवेद् गन्तुं तमाहुस्त्रिपुरं बुधाः ॥४॥
पृथिवी जलों में अन्तरिक्षों में अपने अङ्गों के भेद से स्वभावतत' जो जाने को—चलने को
समर्थ हो उसे ज्ञानी जन त्रिपुर कहते हैं ॥४॥
भागत्रयं भवेदस्य त्रिपुरस्य यथाक्रमम् ।
तेषु प्रथमभागस्य सञ्चारः पृथिवीतले ॥५॥
द्वितीयभागसञ्चारो जलस्यान्तर्बहिः क्रमात् ।
तृतीयभागसञ्चारस्त्वन्तरिक्षे भवेत् स्यतः ॥६॥
† सिंहिक पर्यन्त २० विमान होते हैं यहां तक का वर्णन कहां है ? गुम है ? ।