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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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रुक्मविमान ] [ ३०१
भ्रमण के लिये अतिवेग से नालों के आदि मध्य अन्त में प्रमाण से बड़े चक्र विधिवत् सुदृढ स्थापित
करे। नाल के अग्र भाग में स्थित बड़े चक्र के भ्रमण से वेग से नाल के अन्दर वाले चक्र परस्पर
एक दूसरे को घुमाते हैं, उस वेग से वे कीलशङ्कु—कील कांटे यथाक्रम पीठ में मध्य में अन्त में
मार्गों के सम्मुख घूमते हैं उनके साथ घूम कर स्वयं विमानयान घूम जायगा अतः मार्ग में वेग से
विमान स्वयं दौड़ता है अत कीलों को स्थापित करे यह वर्णित किया है ॥ ८७–६४ ॥
अथ घुटिकापञ्जरनिर्णय —अब घुटिका पञ्जर का निर्णय करते हैं—
विज्ञप्ति—यहां से अगले विषय त्रिपुरविमान से पूर्व का बहुत सा अन्य भाग मध्य में
होना चाहिए ( स्वामी ब्रह्ममुनि )