बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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सर्वेषा चक्रद्रोणीनामुपरिष्टान्तरे क्रमात् ॥३६॥
सन्धारयेत् सोमकान्ततन्त्रीद्वयमत परम् ।
पूर्वपश्चिमदेशेषु चक्राणा सन्धिकीलके ॥४०॥
काचावरण से इस प्रकार सब चक्रों का अन्दर गोल छिद्र करना चाहिए । चक्र-
द्रोणियों के अन्दर ये १२ चक्र क्रम से लगावे या यथेष्ट ६, ४, या ८, सोमकान्त लोह ?--
ताम्बा ? की तारों को शक्ति के खींचने में चक्रों के अन्त में स्थित छिद्रों में पृथक् पृथक्
लगावे एक एक चक्र के मध्य विद्युत् को ठोकर देने वाली प्रेरित करने वाली कीलों को
लगावे फिर उनमें दिशाप्रसारण कीलों को लगाकर उनके चलाने को चक्रकील उसके ऊर्ध्व
भाग में अपने सामने स्थापित करे संकेतप्रेरक साधन के अनुसार चक्रों को चलाने सब
चक्रद्रोणियों के ऊपर अन्दर सोमकान्त लोह--ताम्बा ? की दो तार पूर्वपश्चिम स्थानों में और
चक्रों के सन्धिकीलों में लगावे ॥३४-४०॥
आसन्धिकीलमारभ्य तन्त्यन्तं सर्वत क्रमात् ।
विद्युच्छक्त्याकर्षणार्थं शलाकान् संनियोजयेत् ॥४१॥
सर्वचक्रद्रोण्यूर्ध्वभागेष्वपि (च) यथाक्रमम् ।
तन्त्र्यन्तर्गतशक्तिं तच्छलाकै रपकृष्य च ॥४२॥
चोदयेत् सर्वचक्राणामुपरिष्टाद् यथाविधि ।
चक्राधोभागदेशेषु चक्रान्तर्गतं तन्त्रिभि ॥४३॥
चोदयेद् वेगतश्शक्तिं तत्तत्कीलकचालनात् ।
पर्वतारोहणे तिर्यग्गमनादौ विशेषत ॥४४॥
चक्रोर्ध्वाध प्रदेशस्थशक्तिवेगप्रचोदनात् ।
विमानो याति वेगेन शवतधाकुञ्चनतः क्रमात् ॥४५॥
सन्धिकील से लेकर तार के अन्त तक सब ओर क्रम से विद्युत् शक्ति के आकर्षणार्थ
शलाकाओं को लगावे सब द्रोणीचक्रों के ऊपर भागों में भी यथाक्रम तारों के अन्तर्गत शक्ति को उसकी
शलाकाओं से खींच कर सब चक्रों के ऊपर यथाविधि प्रेरित करे, चक्रों के नीचले भाग में चक्रों के
अन्तर्गत तारों से वेग से शक्ति को कील चला कर प्रेरित करे विशेषत पर्वत पर चढने तिरछे चलने
आदि में चक्रों के ऊपर नीचे देश में स्थित शक्ति के वेग की प्रेरणा से विमान वेग से शक्ति के खींचने
से क्रमशः जाता है गति करता है ॥ ४१-४५ ॥
चक्रोर्ध्वशक्त्याकर्षणेनाधश्शक्तिप्रसारणात् ।
यथा यथा प्रगन्तव्य गच्छत्येव तथा स्वत ॥ ४६ ॥
तिर्यञ्चनादौ चक्राणा पुरस्ताच्चक्रकीलकान् ।
सन्धारयेद् यथाशास्त्रं सुदृढ सरल यथा ॥ ४७ ॥
वेगप्रचोदने सूक्ष्मकीलकद्वयमप्यथ ।
सङ्केतकीलचक्रस्योभयपार्श्वे दृढं यथा ॥ ४८ ॥