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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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रुक्मविमान ] [ २६७
प्रथमास्य समारभ्य तृतीयास्यान्तरावधि ।
अन्योन्यसंसर्गचक्रकीलकैस्सरलं यथा ॥ ५३ ॥
सन्धायं पश्चात् स्तम्भास्यपुरोभागे दृढ यथा ।
बृहच्चक्रं च विधिवत् स्थापयेद् गुम्फ (गम्भ ?) कीलकै ॥ ५४ ॥
एव प्रतिस्तम्भमूले क्रमात् सम्यक् पृथक् पृथक् ।
चक्राणि स्थापयेत् तेषामुपरिष्टात् समन्तत ॥ ५५ ॥
शक्तिप्रवाह के मेल संघर्ष से यथाक्रम वेग से वहां का चक्रभ्रमणवेग से हो जावे ऐसे
तृतीय भाग में दो कीलें लगावे, प्रथममुखको आरम्भकर तृतीय मुखके अन्दर तक अन्योऽन्य संसर्ग कीलों
से सरल लगाकर फिर स्तम्भमुख के सामने के भाग में दृढ वडा चक्र विधिवत् गुम्फ-गांठ कीलों
से स्थापित करे । इस प्रकार प्रति स्तम्भमूल में क्रम से पृथक् पृथक् चक्र स्थापित करे उनके ऊपर सब
ओर से—॥ ५१-५५ ॥
पट्टिका योजयेत् सम्यक् चतुरङ्गलविस्तृताम् ।
संसर्गचक्रकीलादाविद्युद्यन्त्रमुखावधि ॥ ५६ ॥
तन्त्रीद्वय समाहृत्य विद्युदाकर्षणाय हि ।
शक्तिप्रवाहनालस्य मुखकीले नियोजयेत् ॥ ५७ ॥
तत्कीलभ्रमणाच्छक्तिस्तन्त्रीमार्गानुसारत ।
संसर्गचक्रकीलकमार्गद्वारा यथाक्रमम् ॥ ५८ ॥
समागत्यातिवेगेन स्तम्भमूलस्य कीलकम् ।
प्रविश्य (च) तत्कीलद्वारा चक्राणि भ्रमन्ति हि ॥ ५६ ॥
बृहच्चक्रभ्रमणतो सन्धिचक्राण्यपि क्रमात् ।
परस्पर भ्रामयन्ति नालदण्डेषु वेगत ॥ ६० ॥
चार अ ङ्गुल चौड़ी पट्टिका भली प्रकार युक्त करे, संसर्ग चक्रकील से लेकर विद्युद्यन्त्र के मुख
तक विद्युत् के आकर्षण के लिए दो तारों को लेकर शक्ति प्रवाह नाल के मुख कील में नियुक्त करे
उस कील के भ्रमण से शक्ति तारमार्ग के अनुसार संसर्ग चक्रकील के मार्ग द्वारा यथाक्रम अतिवेग से
आकर स्तम्भमूलस्थ कील को प्रविष्ट हो उस कील के द्वारा चक्र घूमते हैं, बडे चक्र भ्रमण से सन्धिचक्र
भी परस्पर क्रम से नालदण्डों में वेग से घूमते हैं ॥ ५६-६० ॥
पश्चास्यकीलके सम्यक्शक्तिस्सम्प्रविशेत् क्रमात् ।
अन्तश्चक्रकसन्दिष्टवेगिनौतैलत पुन ॥ ६१ ॥
तच्छक्तिर्विस्तृता वेगात् प्रं ति नालदयान्तरात् ।
सर्वत्र व्याप्य दण्डस्थसर्वचक्राण्यथाक्रमम् ॥ ६२ ॥
भ्रामयत्यतिवेगेन शक्तिचालनचक्रवत् ।
एतेन पञ्चविंशत्सहस्रलिङ्गप्रमाणत ॥ ६३ ॥