बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
पृष्ठ 323, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ें३८० ] [ बृहद्विमानशास्त्र
परिवर्तनावर्तनाथं पश्चात् तस्य यथाविधि ।
पीठमूले चतुर्दिक्ष्वर्धचन्द्राकारत क्रमात् ॥ ८४ ॥
वितस्तिद्वयमायाम वितस्तिद्वयमुन्नतम् ।
नालं कृत्वाय विधिवत् तन्मध्ये स्थापयेत् क्रमात् ॥८५॥
चतुरङ्गुलायामलोहशलाकान् मृदुलान् तत ।
नालान्तरस्योभयपार्श्वयोस्सयोजयेत् ततः ॥ ८६ ॥
एक मार्ग से दूसरे मार्ग के प्रति विमान को प्रेरित करने के लिये परिवर्तन आवर्तन कीलें
अर्थात् घुमाने लौटाने की साधनभूत कीलों को यथाक्रम विमान की आठों दिशाओं में दृढरूप में युक्त
करे । पूर्व पश्चिम के विमान से दो कीलों को लगाना चाहिए, फिर दोनों का मेल करे उससे विमान
प्रेरित हो जावेगा—चलाने योग्य हो जावेगा । दाएं बाएं विमान वेग से चले-चल पड़ेगा । उन कीलों
के भ्रमण से जिससे दिन रात दौड़ता है अतः परिवर्तन आवर्तन कील कहा है । परिवर्तन आवर्तन के
लिये फिर यथाविधि उसके पीठमूल में चारों दिशाओं में क्रमशः अर्धचन्द्राकार २ बालिश्त लम्बा २
बालिश्त ऊंचा विधिवत् नाल बनाकर उसके मध्य में क्रम से स्थापित करे, ४ अङ्गुल मृदुल-कोमल
लम्बी लोहशलाकाओं को नालों के अन्दर वाले दोनों पाशों में लगावे ॥ ७६—८६ ॥
वितस्त्यायामतस्तद्वद्वितस्त्युन्नतमेव च ।
कृत्वा सरलचक्राणि तेषु संधारयेत् क्रमात् ॥ ८७ ॥
मृदुकङ्कूरत्नन्याध तेषामुपरि शास्त्रतः ।
संवेष्टयेदास्र्मन्तात् सरल च दृढ यथा ॥ ८८ ॥
एव क्रमेण विधिवच्चतुर्दिक्षु यथाक्रमम् ।
अर्धचन्द्राकारनालान् पीठस्य स्थापयेद् दृढम् ॥८६॥
ततो नालस्थचक्राणां भ्रमणायातिवेगत ।
द्यादिमध्यावसानेषु नालानां सप्रमाणतः ॥ ६० ॥
बृहच्चक्राणि विधिवत्स्थापयेत् सुदृढ यथा ।
नालाग्रस्थबृहच्चक्रभ्रमणाद् वेगत क्रमात् ॥ ६१ ॥
नालान्तर्गतचक्राणि भ्रामयन्ति परस्परम् ।
तद्वेगेनाथ तत्कीलशङ्कवश्च यथाक्रमम् ॥ ६२ ॥
पीठे मध्ये तथा चान्त्ये पन्थानाभिमुखं यथा ।
तथावृत्य स्वयं पश्चाद् यानमावर्तयिष्यति ॥ ६३ ॥
तस्मात् सत्पथि वेगेन विमानो धावति स्वयम् ।
तस्मादेतत्कीलकानि स्थापयेदिति वर्णितम् ॥ ६४ ॥
बालिश्तभर लम्बे बालिश्तभर ऊंचे सरलचक्र बनाकर उन में क्रम से कोमल काचकङ्कुवाले
तार से संयुक्त करे उन चक्रों के ऊपर सब ओर सरल दृढरूप में लपेटे इस प्रकार क्रम से विधिवत्
यथाक्रम पीठ की चारों दिशाओं में अर्धचन्द्राकार नालों को दृढ स्थापित करे। फिर नालस्थ चक्रों के