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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

२६४ ] [ बृहद्विमानशास्त्र
एव क्रमेणैव कृत्वा पञ्चपात्राण्यथाविधि ।
पीठस्थपञ्चकेन्द्रेषु स्थापयेत्कीलकशङ्कुभि ॥ ११२ ॥
पश्चान्मूत्र ग(r?)र्दभाना षोडशद्रोणसम्मितम् ।
लिक्कूषोडशकेङ्गारान् सुदृढ खनिजोद्भूवान् ॥ ११३ ॥
तथैव लवणालिकुत्रय चैव तत परम् ।
लिक्द्वय शुद्धसापं शुद्ध लिक्द्वय रविम् ॥ ११४ ॥
पूरयेत् पूर्वदिक्पात्रे तत्तद्भागानुसारत ।
एव सम्पूर्य प्राचीदिक्पात्रे पश्चात् तथैव हि ॥ ११५ ॥
फिर पात्रमुख में हुए छिद्र को दृढ सब ओर से ढक कर चर्म को शंकुओं से बान्ध दे पश्चात्
पीठस्थ पांच केन्द्रों में पांच यन्त्र कीलशंकुओं से स्थापित कर दे। फिर गधों का मूत्र १६ द्रोण (मण)
परिमाण १६ लिक्षु (डिग्री) उष्णता परिमाण खनिज से उत्पन्न अङ्गार तथा ३ लिक्षु परिमाण लवण २
लिक्षु शुद्ध सापे सर्पविष, २ लिक्षु रवि-ताम्बा या आख वृक्ष, पूर्व दिशा के यन्त्र में भर दे उस उसके
भागानुसार से इस प्रकार पूर्व पात्र में भर कर-॥ १११-११५ ॥
पश्चात् पश्चिमदिक्पात्रे वक्ष्यमाणान् प्रपूरयेत् ।
सप्तविद्युद्गममणि प्राणक्षारत्रयोदश ॥ ११६ ॥
द्वाविंशच्छशविष्ठा(१?) च सम्मेल्य विधिवत्तत ।
यन्त्रे सम्पूर्य विधिवदाहरेद् द्रावक क्रमात् ॥ ११७ ॥
भागद्वय चोष्ट्र्मूत्र द्रावकस्यैकभागकम् ।
पूरयित्वा प्रतीचीदिग्भाण्डे सम्यक् प्रमाणत ॥ ११८ ॥
पश्चात्खड्गमृगास्थीनि पञ्चाशल्लिकुमेव हि ।
लिक्कूत्रिशद् गन्धक च चिञ्चाक्षारस्तथैव हि ॥ ११९ ॥
लिक्कूषोडशक तद्वदयस्कान्तमत परम् ।
अष्टाविशल्लिकूमात्रं तन्मूत्रे सन्नियोजयेत् ॥ १२० ॥
पश्चात् पश्चिम दिशा वाले पात्र में आगे कहे जाने वाले पदार्थों को भर दे, ७ भाग विद्युद्-
गममणि-चुम्बक ? १३ भाग प्राणक्षार-नवसादर, २२ भाग शश की विष्ठा एक पात्र में विधिवत्
मिला कर यन्त्र में भर कर द्रावक-अर्क निकाल फिर २ भाग ऊण्ट का मूत्र द्रावक का एक भाग पश्चिम
दिशावाले पात्र में भर का पश्चात् ५० लिक्षु गेण्ड मृग की हड्डियां ३० लिक्षु गन्धक, १६ लिक्षु चिंचा-
क्षार-अमली का क्षार, २ लिक्षु अयस्कान्त, २८ लिक्षु प्रमाण मूत्र में डालदे-मिलादे ॥ ११६-१२० ॥
पश्चात् सप्तदशोत्तरशतसख्यात्मकं पुन ।
तद्विन्निममणिं तस्मिन् स्थापयेन्मध्यभागके ॥ १२१ ॥
एव सम्पूर्य विधिवत् पश्चिमे केन्द्रपात्रके ।
वक्ष्यमाणपदार्थांश्चोत्तरपात्रे प्रपूरयेत् ॥ १२२ ॥

सुन्दरविमान ] [ २६५
ततोपामागंबीजाना तैलमेकादशांशकम् ।
सर्पास्यबीजतैलं च द्वात्रिंशाश तथैव हि ॥ १२३ ॥
चत्वारिशदयस्कान्ततैलाश च यथाक्रमम् ।
त्र्युत्तराशीतिभागाशगजमूत्रे नियोजयेत् ॥ १२४ ॥
तैलत्रयतृतीयाशादधिक गजमूत्रकम् ।
मेलयित्वा सप्रमाणमुदीची केन्द्रसस्थिते ॥ १२५ ॥
पश्चात् ११७ संख्या तडित्मणि ? को मध्यभाग वाले में रखे, इस प्रकार पश्चिम केन्द्रपात्र में
भर कर पुन' उत्तर पात्र में कहे जाने वाले पदार्थों को भरे फिर अपामार्ग-चिडचिडे के बीजों का तैल
११ भाग ३२ अंश सर्पास्य बीज- सर्पास्य ? नागकेसर बीज का तैल ४० भाग अयस्कान्त का तैल ८३
गजमूत्र-हाथी के मूत्र में डाल दे फिर तीनों तैलों के तृतीय अंश से अधिक हाथी का मूत्र मिलाकर
उत्तर दिशा के केन्द्र में स्थित हुए-॥ १२१-१२५ ॥
पात्रे सम्पूरयित्वाथ पश्चात् तस्मिन् यथाविधि ।
पारद सेहिकक्षार तथा पार्वणिसत्त्वकम् ॥१२६॥
त्रिंशद्विंशत्पञ्चविंशत्पलभागान् पृथक् पृथक् ।
प्रत्येक तोलयित्वाथ सम्यक् सम्पूरयेत् क्रमात् ॥१२७॥
मणिप्रकारेणोक्ताष्टशतसंख्यात्मक शिवम् ।
स्थापयेद् भास्करमणि तन्मध्ये तैलशोधितम् ॥ १२८ ॥
एवमुत्तरकेन्द्रस्थपात्रे वस्तुप्रपूरणम् ।
कृत्वा दक्षिणकेन्द्रस्थपात्रेण्येव यथाविधि ॥ १२६ ॥
द्वादशद्वैर्काविंशतषोडशभागशका क्रमात् ।
ग्रन्थिद्रावक (च) पञ्चमुखीद्रावकमेव च ॥ १३० ॥
श्वेतापुङ्खाद्रावक च मेलयित्वा यथाविधि ।
गोमूत्रे द्रवभागाशात्पञ्चभागाधिके क्रमात् ॥ १३१ ॥
पात्र में भर कर पश्चात् उसमें यथाविधि पारा, सैहिक क्षार, वही कटेली का क्षार, पार्वणि-
सत्त्व-वंशसत्त्व-वंशलोचन ? या जिसके पर्व पर्व में वैसा ही अङ्ग हो ईख की भांति, लाल रंग, लम्बे
पत्ते, लाल फूल, सूक्ष्म कांटे वाला, सर्पविष विनाशक, कडुवे सार वाला कृष्णपक्ष में खिलने वाला (देखो
कापी १४ श्लोक ७८-८०) पार्वणि वृक्ष होता है ये तीनों ३०, २०, २५ पल अर्थात् १२०, ८०, १००
तोला क्रम से भागों को पृथक् पृथक् प्रत्येक तोल कर भली प्रकार भर दे, मणि प्रकार से उक्त आठ सौ
संख्यात्मक तैल से शोधित कल्याण कर भास्करमणि-सूर्यकान्त मणि को उसके मध्य में स्थापित करे ।
इस प्रकार उत्तर केन्द्र में स्थित पात्र में वस्तु प्रपूरण करके दक्षिण केन्द्रस्थ पात्र में भी यथाविधि १२,
२१, १६ भाग रूप क्रम से ग्रन्थिद्रावक-पिप्पला मूजरस, वासारस, श्वेत शरपुंखा रस या श्वेतगुञ्जा
रस यथाविधि मिला कर उक्त द्रव भागांशों से ५ भाग अधिक अर्थात ५४ भाग गोमूत्र में क्रम
से-॥ १२६-१३१ ॥

? "यन्त्रमूले" means "at the base of the machine". That makes sense too!
Let's look at the matra under म: it curves down to the left, which is ू!
Wait, let's look at कुण्डे in line 25: कु has ु (curves left/up).
In मूषायां (line 24): मू has ू (curves down to the right).
In line 28: under म, the stroke goes down to the right! So it is मू!
And the next letter is ले: यन्त्रमूले सम्पूरयेच्छनैः ।
Yes! यन्त्रमूले सम्पूरयेच्छनैः ।

Line 29:
चपलग्राहक लोह भवेत्पश्चाद् दृढं मृदु ॥ १४२ ॥
Wait, is there a space between चपलग्राहक and लोह?
Yes: चपलग्राहक लोह भवेत्पश्चाद् दृढं मृदु ॥ १४२ ॥

Now let's check lines 30-33 (Hindi):
Line 30:
चूना, ग्राव श्वेत—श्वेत ग्राव—सङ्गममर, निर्यास—गान्ध, मृत्—सोरठ मिट्टी, काच, मधु-
Wait:

  • चूना,

सुन्दरविमान ] [ २६७
में रख कर तीन मुख वाली भस्त्रा से धमन करे ४२३ दर्जे की उष्णता के वेग से तपाकर-गला कर उस
गले रस को यन्त्रमुख में धीरे से भर दे यह चपलग्राहक लोहा हो जावे ॥ १३७-१४२ ॥
शक्तिपूरकपात्रनिर्णय. — शक्तिपूरक पात्र का निर्णय —
वितस्तिपञ्चकायाम विस्त्राष्टकमुन्नतम् ।
अर्धचन्द्राकृति पीठ गात्रमेकवितस्तिकम् ॥ १४३ ॥
चपलग्राहकलोहेनैव कुर्याद् यथाविधि ।
शक्तिपूरकपात्र तन्मध्ये संस्थापयेत् क्रमात् ॥ १४४ ॥
पात्रमूल बृहत्कुम्भाकारवद् वर्त्तुलं तथा ।
द्रोणवन्मुखभाग च कल्पयित्वा यथाविधि ॥ १४५ ॥
एतदाकारत. काचकवच तस्य कारयेत् ।
वितस्तित्रयमायाम षड्वितस्त्युन्नत तथा ॥ १४६ ॥
नालद्वय प्रकर्तव्य द्रोणवत्सुदृढ यथा ।
स्थापयेत् तत्पात्रमध्ये दक्षिणोत्तरत क्रमात् ॥ १४७ ॥
५ बालिश्त लम्बा ८ बालिश्त ऊंचा अर्धचन्द्राकार वाला नीचे का भाग १ बालिश्त मोटा
चपलग्राहक लोहे का शक्तिपूरक पात्र यथाविधि करे, उसके बीच में पात्रमूल बड़े घड़े के आकारजैसा
गोल कलश की भांति मुखभाग बनाकर ऐसे आकार में कांच का कवच उसका बनावे, ३ बालिश्त लम्बा
६ बालिश्त उठा हुआ तथा दो नाल कलश की भांति दृढ करने चाहिएं, उन्हें पात्र के मध्य में दक्षिण
और उत्तर के क्रम से स्थापित करे ॥ १४३-१४७ ॥
चक्रद्वय चोभयनालमध्ये स्थापयेत् क्रमात् ।
तयोरावरणा कुर्यात् काचेनैवाथ पूर्ववत् ॥ १४८ ॥
चक्रयोरुभयोर्मध्ये नालयोर्वाह्यत क्रमात् ।
सन्धिकील कल्पयित्वा स्थापयेत् सरल यथा ॥ १४६ ॥
भ्रमणात् सन्धिकीलस्य नालयोरुभयोरपि ।
चक्राणि भ्रामयेद् वेगात् तेन शक्त्यूर्ध्वगा भवेत् ॥१५०॥
चतुर्दिक्षु स्थितविद्युत्पात्रमूलाद् यथाविधि ।
मध्यपात्रस्थनालद्वय मूलावधि क्रमात् ॥ १५१ ॥
नालद्वयमयस्कान्तलोहेन रचित तत ।
षडङ्गुलायामयुक्त सन्धान कारयेदथ ॥ १५२ ॥
दो नालों के मध्य में दो चक्र स्थापित करे उन चक्रों का कांच से आवरण पूर्व जैसा करे,
दोनों चक्रों के बीच में नालों की बाहिरी ओर क्रमश: सन्धि कील लगा कर सरल रखे, सन्धिकील के
भ्रमण से दोनों नालों के चक्र को वेग से घुमावे इससे चारों दिशाओं में स्थित विद्युत्पात्र मूल से मध्य-
पात्रस्थ दो नालों के मूल के अवधिक्रम से शक्ति ऊर्ध्वगामी हो जावेगी, दो नालें अयस्कान्त से रचे पुन
६ अङ्गुल लम्बा जोड लगावे ॥ १४८-१५२ ॥

२६८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
वेष्टयेद् रुरुमृगचर्म नालद्वयोपरि ।
तस्योपरि पुनः पट्टतन्तुर्वा पटमेव वा ॥ १५३ ॥
वेष्टयेत्सुदृढं सम्यक् पश्चात् तन्नालयो क्रमात् ।
कृत्वा वज्रमुखो ताम्रतन्त्रीन् द्रावकशोधितान् ॥ १५४ ॥
एकैकनालान्तराले द्वौ द्वौ तन्त्रीन् नियोजयेत् ।
तत्तन्त्रीन् शक्तिपूरकपात्रनालद्वयान्तरे ॥ १५५ ॥
संधारयेत्समाहृत्य काचकुप्पिकपूर्वकम् ।
शक्तिपूरकपात्रेथ पारमष्टपलं न्यसेत् ॥ १५६ ॥
एकनवत्युत्तरत्रिशतसंख्याकात्मकं तत ।
विद्युन्मुखमणिं ताम्रतन्त्रीभि परिवेष्टितम् ॥ १५७ ॥
सयोगकीलकयुतं तस्मिन् सन्धारयेत् क्रमात् ।
पश्चात् पूर्वोक्तनालस्यतन्त्रीनाहृत्य यत्नत ॥ १५८ ॥
उन दोनों नालों के ऊपर रुरुचर्म—काले हरिण के चर्म को लपेट दे फिर उसके भी ऊपर
पटतन्तु—सूत या पटवस्त्र ही उन नालों पर सुदृढ लपेट दे फिर द्रावक में शुद्ध की हुई वज्रमुखी ताम्र-
तन्त्रियों को अर्थात् वज्रमुखी ताम्बे की तारों को एक एक नाल के अन्दर दो दो करके तारों को नियुक्त
करे—फिट करे जो कि शक्तिपूरक पात्रस्थ दो नालें हैं उनके अन्दर कांच की कुप्पि—आवरण (बल्भ जैसे )
के साथ लगावे । शक्तिपूरक पात्र में पारा आठ पल—३२ तोला रख दे, तीन सौ इक्यानवे ३६१ संख्या
वाली विद्युन्मुखमणि को ताम्बे की तारों से लपेट संयोग कीलक युक्त उसमें लगा दे फिर पूर्वोक्त नालों
की तारों को लेकर यन्त्र से—॥ १५३-१५८ ॥
विद्युन्मुखमणेस्संयोजनकीलकतन्त्रिषु ।
सन्धारयेद् दृढं काचकं कुरन्ध्रमुखेन हि ॥ १५६ ॥
एव कृत्वा मध्यपात्र विहायाथ पुन क्रमात् ।
अवशिष्टेषु पात्रेषु पृथक् पृथग्यथाविधि ॥ १६० ॥
मन्थानवत् स्थितौ द्वौ द्वौ मथनोन्मथनाभिधौ ।
स्थापयेत्कीलकस्तम्भौ सरलभ्रमण यथा ॥ १६१ ॥
पात्राणा मध्यकेन्द्रेषु शास्त्रोक्तेनैव वर्त्मना ।
अयस्कान्तेन वा नोचेच्छुक्तिकस्कन्धेन वा कृतान् ॥ १६२ ॥
स्तम्भान् संस्थापयेत् तेषु एकैक च पृथक् पृथक् ।
वितस्तित्रयमोन्नत्य गात्रमेकवितस्तिकम् ॥ १६३ ॥
विद्युन्मुखमणि—डायनेमो ? की संयोजक कील वाली तारों में कांच को कुरन्ध्र मुख—नीचे
भूमि वाले छिद्रमुख से दृढ जोड दे या कांच के दो कोश वाले छिद्रमुख से ऊपर कहे तारों को जोड
दे । ऐसा करके मध्य पात्र को छोड कर अन्य अवशिष्ट पात्रों में यथाविधि पृथक् पृथक् मन्थनसाधन के
समान स्थित दो दो मथन उन्मथ नामक कील स्तम्भ लगावे जिससे मध्यकेन्द्रों में वर्तमान पात्रों का

सुन्दरविमान ] [ २६६
शास्त्रोक्त मार्ग से सरल भ्रमण हो सके अथवा अयस्कान्त से या शक्तिस्कन्ध से किये स्तम्भों को उनमें
एक एक स्थापित करे । ३ बालिश्त ऊंचाई १ बालिश्त मोटाई—॥ १५६-१६३ ॥
एकैकस्तम्भप्रमाणमिति शास्त्रविनिर्णयः ।
मथनोन्मथनयन्त्रपूर्वभागे यथाक्रमम् ॥ १६४ ॥
उत्क्षेपणपक्षेपणचक्रकीलान् पृथक् पृथक् ।
सन्धारयेत् ततो मध्यस्तम्भस्थानाद् यथाक्रमम् ॥ १६५॥
उत्क्षेपणापक्षेपणाकीलावधिसुशोधितम् ।
अष्टाङ्गुलायामनालमेकं सन्धारयेद् दृढम् ॥ १६६ ॥
पश्चात्पञ्चाङ्गुलायामचक्राणि सुदृढान्यपि ।
कृत्वा जलाहरणयन्त्रचक्रवन्मनोहरम् ॥ १६७ ॥
सन्धारयेद् यथाशास्त्र पञ्चसङ्ख्याक्रमेण तु ।
कीलकैस्सरलैस्सम्पङ्‌नालस्योभयपार्श्वयो ॥ १६८ ॥
ततश्शक्तिस्कन्धलोहाद्द्व्यङ्गुलद्वयमानत ।
पट्टिकान् कारयित्वाथ शोषयित्वा यथाविधि ॥ १६६ ॥
आवृत्तनालान्तर्गतचक्राण्यारभ्य शास्त्रत. ।
मथनोन्मथनयन्त्रवामदक्षिणपार्श्वयो ॥ १७० ॥
संस्थितोत्क्षेपणापक्षेपणचक्रान्तरावधि ।
मथनोन्मथनयन्त्रोभयपात्रस्यकेन्द्रयो ॥ १७१ ॥
एक एक स्तम्भ का प्रमाण है यह शास्त्र का निर्णय है, मथनोन्मथन यन्त्र के पूर्व भाग में
यथाक्रम उत्क्षेपण—ऊपर फेंकने अपक्षेपण नीचे फेंकने की चक्रकीलें पृथक् पृथक् लगावे, मध्यस्तम्भ स्थान
से यथाक्रम उत्क्षेपण अपक्षेपण की कील तक सुशोधित ८ अङ्गुल लम्बा एक नाल लगावे, पश्चात् ५
अङ्गुल लम्बे सुदृढ चक्र भी जलाहरण—चक्र—राहट की भांति मनोहर बनाकर शास्त्रानुसार सरल कीलों
नाल के दोनों पाखों में लगावे । फिर शक्तिस्कन्ध लोहे से २ अङ्गुल माप की पट्टिकाएं बना कर और
यथाविधि शोध कर घूमने वाले नाल के अन्तर्गत चक्रों को आरम्भ कर शास्त्र से मथन-उन्मथन यन्त्र
बाएं दाएं चक्रों की अवधि तक मथनोन्मथन यन्त्र के दोनों पात्रों के केन्द्र में—॥ १६४-१७१ ॥
(आगे देखो कापी संख्या १६)

हस्तलेख कापी संख्या १६—
संस्थितत्रिचक्रमुखस्तम्भकीलकयोः क्रमात् ।
संयोज्य विधिवत्पश्चात् स्तम्भस्थप्रतिनालयो ॥ १७३ ॥*
पार्श्वयोरुभयोर्मध्ये चानुलोमविलोमत ।
सन्धारयेद् भ्रामणकीलकान् सुदृढं यथा ॥ १७४ ॥
एतत्कीलकभ्रमणाद् दधिनिर्मन्थने यथा ।
मन्थानरज्जुग्रहहस्तौ वेगात् पुनः पुनः ॥ १७५ ॥
ऊर्ध्वाधोभागयोस्सम्यगनुलोमविलोमत ।
सम्भ्रामयेत् तथा नालोभयपार्श्वस्यपट्टिका (म् ?) ॥१७६॥
ऊर्ध्वाधोभागयोस्सम्यग्भ्रामयेद् वेगतः क्रमात् ।
पश्चाद् दर्पणशास्त्रोक्तघृण्याकर्षणदर्पणात् ॥ १७७ ॥
उलूखलोपरि न्यस्तवेणुपात्राकृतिर्यथा ।
कुर्याच्चत्वारि पात्राणि चतुष्पात्रोपरि क्रमात् ॥१७८॥
विधिवद् योजयेत् सम्यङ् मुखस्थाने पृथक् पृथक् ।
—स्थित तीन चक्रमुख वाली दो स्तम्भकीलों में क्रम से संयुक्त कर पश्चात् स्तम्भस्थ प्रतिनाल
के पार्श्वों में अनुलोम विलोम रीति से घूमनेवाली कीलों को दृढ लगावे इन कीलों के भ्रमण से दही
मथने में जैसे मन्थन डोरी पकड़े हुए हाथ वेग से वार वार ऊपर नीचे भागों में अनुलोम विलोम—सीधे
उलटे ढंग से घुमावे वैसे ही नालों के दोनों ओर वाली पट्टिका ऊपर नीचे भागों में सम्यक् वेग से घुमावे
पश्चात् दर्पणशास्त्र में कहे घृण्याकर्षणदर्पण—सूर्य या सूर्यकिरण को खींच लेने वाले दर्पण—सूर्यकान्त
से चार पात्र करे और चार पात्रों के ऊपर क्रम से विधिवत् सम्यक् मुखस्थान में युक्त करे ऊखल के ऊपर
रख बांस पात्राकृति के समान— ॥ १७३—१७८ ॥
पात्रलक्षणं लल्लोनोक्तम् —पात्रलक्षण लल्ल आचार्य ने कहा है—
आदावष्टाङ्गुलायामं वितस्त्यैकोन्नत तथा ॥ १७९ ॥
कृत्वा तन्मध्यदेशेथ शास्त्रोक्तेनैव वर्त्मना ।
वितस्तिद्वयमायामं षड्वितस्त्युन्नतं तथा ॥ १८० ॥
कल्पयित्वा तदन्ते षड्वितस्त्यायामविस्तृतम् ।
• संख्या कापी १८ से आगे के क्रम से है ।

...? No. Wait, let's look at the character: could it be अंशुषामणि? Yes, अंशुषामणिorअंशुषामणि. Let's look at अंशुषामणिvsअंशुपाणि: Wait, what if it's अंशुषामणि? Let's transcribe अंशुषामणिorअंशुपाणि? Wait, look at अंशुपाणि- in line 6 it'sअंशुपामणिम्(anshupa-manim). Soअंशुषामणिis clearly a typo forअंशुपाणि(Anshupa-mani), but in the print it looks likeअंशुषामणिorअंशुषामखि. Wait, look at खि: in मुखबिल(line 8), look atख: it has a round loop on the left, a bottom hook, and a right vertical line. Now look at the letter in line 10: it has a round loop on the left, a bottom hook, and a right vertical line! It IS ख! With an िmatra, it ISखि! Wait, why मखि? Could it be अंशुषामखि`?
Wait, let's re-read: could the Sanskrit in line

२७२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
शुद्धवज्रमुखताम्रतन्त्रीद्वयं सुवर्चसम् ।
शक्तिपूरकपात्रेथ यथा संयोजितं भवेत् ॥ १६२ ॥
तथा सन्धारयेत्सम्यक् प्रतिनालेयथाविधि ।
शक्तिपूरकपात्रेऽथ रसं शतपले न्यसेत् ॥ १६३ ॥
पश्चादेकनवत्युत्तरत्रिशतात्मकं शिवम् ।
विद्युन्मुखमणिं पूर्वोक्ततन्त्रीपरिवेष्टितम् ॥ १६४ ॥
तस्मिन्निधाय विधिवत् पश्चात्सन्मणि तन्त्रिषु ।
पूर्वोक्त नालस्यतन्त्रीस्सम्यक् संयोजयेद् दृढम् ॥ १६५ ॥
चतुष्पात्रस्थितान् शुद्धखुरतैल प्रलेपितान् ।
सम्भ्रामयेद् वेगतो मथनोन्मथनकीलकान् ॥ १६६ ॥
उसके ऊपरि भाग को रेशमी वस्त्र या उसके धागों से लपेट दे फिर क्रम से नालों के अन्दर
शुद्ध वज्रमुख ताम्बे की सुन्दर दो तारों को शक्तिपूरकपात्र में युक्त कर दिया जावे ऐसे प्रत्येक नाल में
लगावे । शक्तिपूरकपात्र में १०० पल अर्थात् ४०० तोला पारा डालदे, फिर उन तारों से लपेटी हुई ३६१
सुन्दर विद्युन्मणि को उसमें रखकर पश्चात् मणितारों में पूर्वोक्त नालतारों को भली भांति लगावे, चारों
पात्रों में स्थित खुरतैल-तिलतैल या नखीगन्धद्रव्य के तैल से मथनोन्मथन कीलों को चिकनी करके वेग
से घुमावे-॥ १६१-१६६ ॥
कक्ष्यदिशतोष्णवेगाद् भवेत्कीलकभ्रमो यदि ।
चतुष्पात्रस्थमूलेषु* पाचतेष्वंशुभिः क्रमात् ॥ १६७ ॥
मथनोन्मथनचक्राणि च (?) यथाक्रमम् ।
यथा भवेद् द्विसहस्रकक्ष्योष्ण वेगतो भृशम् ॥ १६८ ॥
तन्मूलानि विशेषेण दधिवन्मन्थयन्ति हि ।
एतेन प्रतिपात्रे ऽष्टशतडिग्रीप्रमाणतः ॥ १६६ ॥
वेगादाविर्भवेद् विद्युच्छक्तिश्शुद्धातिवे गिनी ।
आचतुष्पात्रमूलाग्रादाविद्युत्पूरकान्तरे ॥ २०० ॥
सन्धारितकान्तलोहनालान्तर्गततन्त्रिभि ।
एतच्छक्तिं समाहृत्य शक्तिपूरकपात्रके ॥ २०१ ॥
सम्पूरयेत् सप्रमाण सावधानेन चेतसा ।
तच्छक्तिं तत्रत्यमरिण पात्रे सगृह्य पूर्णति ॥ २०२ ॥
यदि मथनोन्मथन कीलों का घूमना २०० दर्जे की उष्णता से हो तो किरणों से पके चारों
पात्रस्थ मूलों में मथनोन्मथ चक्र २००० दर्जे की उष्णता से वेग को लें वह मूल विशेषतः दही मथने की
भांति मथन करती हैं उससे प्रत्येक पात्र में ८०० डिग्री प्रमाण के वेग से अतिवेगिनी विद्यु त्शक्ति
प्रकट हो जाती है चारों पात्रों के मूलाग्र से विद्युत्पूरकपात्र के अन्दर तक चलतेहुए कान्त लोहनालान्तर्गत

  • मूत्रेपु' हस्तलेखे ।

सुन्दरविमान ] [ २७३
तारोंद्वारा इस शक्ति को लेकर पूरकपात्र में सावधान चित्त से सप्रमाण भरदे, वहां की मणि
उस शक्ति को पात्र में संग्रह कर देती है ॥ १६७-२०२ ॥
शक्तिपूरकपात्रस्य पुरोभागे तत परम् ।
वितस्तिपञ्चकायामं वितस्तित्रयमुन्नतम् ॥२०३॥
कुम्भवद् वर्तुलाकार पात्रमेक न्यसेद् दृढम् ।
तत्पात्र वेष्टयेत्सम्यग् वारिवृक्षस्य चर्मणा ॥२०४॥
सार्वकालं यतो वारि तस्मिन् प्रवहति स्वयम् ।
ततो वारिप्रतिनिधि वारिचर्मनिरूपितम् ॥२०५॥
एतेन पात्रस्य जलावरण प्रभवेद् यथा ।
तथैव वारिवृक्षस्य चर्मणा भवति ध्रुवम् ॥२०६॥
सन्धार्य पश्चात् तत्पात्रे सप्रमाण यथाविधि ।
शिखावलीद्रावकस्य द्वादशांश तथैव हि ॥२०७॥
अष्टादशांशायस्कान्तद्रावक तदनन्तरम् ।
वज्रचुम्बकद्रावस्य द्वाविंशांश यथाक्रमम् ॥२०८॥
सम्पूर्य काचपात्रेषु स्थापयेत् सुदृढ यथा ।
शक्तिपूरक यन्त्र के सामनेवाले भाग में ५ बालिश्त लम्बा ३ बालिश्त ऊंचा घड़े के समान
गोल पात्र रखदे उस पात्र को भली प्रकार बारिवृक्ष—हीबेरवृक्ष की छाल से लपेट दे, जिससे कि
सर्वकाल उसमें स्वयं वारि—जल बहता है तब ही वारि—जल का प्रतिनिधि बारिचर्म कहा गया है ।
इससे पात्र का जलावरण होजावे वैसे वारिवृक्ष के चर्म से यह ध्रुव होजाता है फिर उस पात्र में यथा-
विधि सप्रमाण रखकर शिखावली द्रावक—(शिखी) चित्रकवृक्ष ? या अपामार्ग ? के द्रावक में या
(शिखिकण्ठ) नीलाथोथा के द्रावक का १२ अंश १८ अंश अयस्कान्तद्रावक पुन २२ अंश वज्रचुम्बक-
द्रावक काचपात्रों में सुदृढ भरकर रखदेना ॥२०३-२०८॥
पूर्वोक्तकाचावरणलोहनालस्य तन्त्रिभि ॥२०९॥
शक्तिपूरकपात्रादाहृत्य शक्तिं यथाविधि ।
पात्रस्थद्रवपात्रेषु सम्यक् पूरयितुं क्रमात् ॥२१०॥
एकै कनाले चत्वारि यन्त्रघस्रशोभितास्तत ।
काचचक्रमूलात्सम्यक् सन्धार्याथ यथाविधि ॥२११॥
पूर्वोक्तपात्रान्तरस्थकाचपात्रेषु द्रावके ।
सम्पूर्य पश्चात् तत्पात्रमूलात् तन्त्रीद्वय क्रमात् ॥२१२॥
शक्तिमार्किविषु बाह्ये कीलैस्संयोजयेद् दृढम् ।
पुनस्तत्कीलकाभ्या तत्तन्त्रीद्वयमृजुर्यथा ॥२१३॥

२७४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
समाहृत्यातिसरलात्काचकंकुरयोगतः ।
प्रादक्षण्ये क्रमाद् याने धूमोद्गमपुरो भुवि ॥२१४॥
स्थितभुज्युकलोहस्य नालान्तर्गततन्त्रिभिः ।
सन्धाय विधिवत् पश्चात् प्रतिधूमोद्गमान्तरे ॥२१५॥
पूर्वोक्त काचावरणनाली लोहनालके तारोंसे शक्तिपूरकपात्रसे शक्तिको यथाविधि लेकर पात्रस्थ द्रवपात्रों
में क्रम से भली भांति भरने को एक एक नाल में संशोधित चार तारें काचचक्रमूख से सम्यक् जोडकर
पूर्वोक्त पात्रों में अन्दर रखे कांचपात्रों में द्रावक में भरकर फिर उस पात्रमूल से दो तारे क्रम से शक्ति
को खीचने के लिये कीलों से बाहिर लगादे फिर उन दोनों कीलों से उन दोनों तारों को सरल लेकर
अतिसरल कांचकङ्कुरयोग से—कांच घुण्डीवाले योग से घूमाकर यान में धूम को निकालने वाले यन्त्र
के सामने भूमि में स्थित भुज्यु लोहे की नालों के अन्दरवाले तारों से विधिवत् जोडकर प्रत्येक धूम को
निकालने वाले यन्त्र के अन्दर—॥ २०६-२१५ ॥
स्थितविद्युद्घर्षकमणिकीलकेषु यथाक्रमम् ।
शक्तिं संयोजयेत् ताभ्यां सप्रमाणं यथोचितम् ॥२१६॥
एव धूमोद्गमनालस्तम्भस्थे च यथाविधि ।
उक्तविद्युद्घर्षकमणिकीलके स्तन्नियोजयेत् ॥२१७॥
एतेन सर्वत्र विद्युद्व्याप्तिस्स्याद् व्योमयानके ।
तस्माद् विद्युद्यन्त्रमेव कृत्वा शास्त्रानुसारतः ॥२१८॥
वामभागे विमानस्य स्थापयेत् सुदृढ यथा । इत्यादि
—स्थित हुए विद्युद्घर्षणमणि की कीलों में यथाक्रम शक्ति को उन दो तारों से यथोचित युक्त
करे, इस प्रकार धूमोद्गमनाल के स्तम्भ में भी यथाविधि उक्त विद्युद्घर्षकमणि की कीलों से संयुक्त करे
जोड दे । इससे व्योमयान में सर्वत्र विद्युत् की व्याप्ति होजावे, अतः शास्त्रानुसार ही विद्युद्यन्त्र करके
विमान के वामभाग में सुदृढ स्थापित करे ॥२१६-२१८॥
अथ वातप्रसारणयन्त्रनिर्णयः—अब वातप्रसारणयन्त्र का निर्णय है—
उक्तं हि क्रियासारे—कहा ही है क्रियासर ग्रन्थ या प्रकरण में—
विमानोत्क्षेपणार्याय खपथे शास्त्रत क्रमात् ।
वातप्रसारणं नाम यन्त्र शास्त्रेषु वर्णितम् ॥२१६॥
इत्युक्तत्वाद् यन्त्रमद्य सग्रहेण निरूप्यते ।
एतद्यन्त्र वातमित्रलोहादेव प्रकल्पयेत् ॥२२०॥
अन्यथा यदि कुर्वीत तत्क्षणात्नाशमेधते ॥२२१॥
आकाशमार्ग में विमान को ऊपर उठाने के लिये शास्त्रानुसार क्रम से वातप्रसारण नाम का
यन्त्र शास्त्रों में कहा है । ऐसा कहे जाने से अब यन्त्र संक्षेप में कहा जाता है, यह यन्त्र वातमित्र लोहे
से ही बनावे अन्यथा करेगा तो नाश को प्राप्त हो जावेगा ॥२१६—२२१॥

सुन्दरविमान ] [ २७५
वातमित्रलोहमुक्तं लोहतन्त्रे- वातमित्रलोह कहा है लोहतन्त्र में-
रसाञ्जनिकभागाशास्त्रयोदश तथैव हि ।
प्रभञ्जनस्य भोगास्तु सप्तविंशदितीरिता ॥२२२॥
पराङ्कुशस्य भागास्सप्तत्रिंशदिति कीर्तिताः ।
एतानि सर्पास्यमूषाया तत्तद्भागानुसारत ॥२२३॥
सम्पूर्य विधिवच्चक्रमूलकुण्डे यथाविधि ।
संस्थाप्य पश्चाद् वारणास्यभस्त्राद् वेगेन शास्त्रत ॥२२४॥
धमनेत् षोडशोत्तरद्विशतकक्ष्योष्णमानत ।
समीकरणयन्त्रेथ तद्रसं परिपूरयेत् ॥२२५॥
एव कृते वातमित्रलोह भवति नान्यथा ।
एतेनैव हि लोहेन कुर्याद् यन्त्राणि शास्त्रत ॥२२६॥
रसाञ्जनिक-रसोत १३ भाग तथा प्रभञ्जन ? के २७ भाग पराङ्कुश ? के ३७ भाग कहे ।
इनको सर्पास्यमूषा-कृत्रिमबोतल में उनके भागानुसार भरकर विधिवत् चक्रमूलकुण्ड में यथाविधि स्थापित
करके पश्चात् वारुणास्त्र हाथीमुख जैसी भस्त्रा-धौंकनी से २१६ दर्जे की उष्णता से धोंक समीकरण
यन्त्र में पिंघले द्रवको भरदे ऐसा करने पर वातमित्रलोह होजाता है अन्यथा नहीं यन्त्र ऐसे लोहे से
शास्त्रानुसार करे ॥२२२-२२६॥
आदौ पीठस्ततो नालस्तम्भयन्त्रस्तथैव च ।
वातपूरकचक्रकीलकानि तत परम् ॥२२७॥
वाताकर्षणभस्त्रिकामुखयन्त्रमतस्तथा ।
मुखसङ्कोचविकासनकीलकौ तदनन्तरम् ॥२२८॥
सकीलकयातायातनालश्चैव तथैव हि ।
यन्त्राणा कवच तद्वदातस्तम्भास्तथैव हि ॥२२६।
वातोद्गमाख्यनालश्च भस्त्रिकोन्मुखमेव च ।
तथैव वातपूरककीलकानि तत परम् ॥२३०॥
वातनिर्सनपङ्कूकीलकानीति द्वादश ।
एतानि यन्त्रस्याङ्गानीति यथाक्रमम् ॥२३१॥
प्रथम पीठ बनावे फिर नालस्तम्भयन्त्र उसके पश्चात् वातप्रपूरकचक्रकीलें पुन वाताकर्षण
भस्त्रिकामुखयन्त्र तथा उसके पीछे मुख के सङ्कोच विकास करने वाली दो कीलें फिर कीलोंसहित याता-
यात नाल, यन्त्रों का कवच, उसी प्रकार वातस्तम्भ भी, वातोद्गमाख्यनाल भस्त्रिकोन्मुख भी उसी प्रकार
वातपूरककीलें पुन' वातनिर्सनपङ्कू-अरापत्तचक्र की कीलें । ये यन्त्र के अङ्ग यथाक्रम वर्णित किए
हैं ॥ २२७-२३१ ॥
अथ पीठनिर्णयः-अब पीठ का निर्णय करते हैं-

२७६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
षड्वितस्त्यायामकं च गात्रमेकवितस्तिकम् ।
चतुरश्रं वर्तुलं वा पीठं कुर्याद् यथाविधि ॥ २३२ ॥
त्रिचक्रनालस्तम्भसंस्थापनार्थं यथाविधि ।
कुर्यात्केन्द्रद्वयं पीठे दक्षिणोत्तरयोः क्रमात् ॥ २३३ ॥
६ बालिश्त लम्बा १ बालिश्त मोटा चौकोर या गोल पीठ यथाविधि बनाना चाहिए त्रिचक्र-
नालस्तम्भ के संस्थापनार्थ दो केन्द्र पीठ में दक्षिण उत्तर में क्रम से करे ॥ २३२-२३३ ॥
त्रिचक्रनालस्तम्भयुक्तं यानबिन्दौ-त्रिचक्रनालस्तम्भ यानबिन्दु में कहा है-
वितस्तित्रयमायामो वितस्त्यष्टकमुन्नतौ ।
नालस्तम्भो कल्पयित्वा केन्द्रयोरुभयोः क्रमात् ॥ २३४ ॥
संस्थापयेत् ततो नालस्तम्भयो मूलत क्रमात् ।
कल्पयेदावृत्तकीलरन्ध्राणि त्रीण्यथाविधि ॥ २३५ ॥
तेषु सन्धारयेत् पश्चात् क्रमात् तत्कीलकान् दृढम् ।
३ बालिश्त लम्बे-चौड़े ८ बालिश्त ऊँचे दो नालस्तम्भ बनाकर (पीठ के) दोनों केन्द्रोंमें संस्थापित
करके लगादे फिर दोनों नालस्तम्भों के मूल से क्रमशः तीन घूमनेवाली या गोल कीलों के छिद्र उन छिद्रों
में उन कीलों को जोड दे (फिट् कर दे) ॥ २३४-२३५ ॥
तदुक्तं यानबिन्दौ-वह यह यानबिन्दु में कहा है-
वितस्त्यैकायामयुक्तं वितस्तिद्वयमुन्नतम् ॥ २३६ ॥
सीत्कारीनालवत्कृत्वा योजयेत् स्तम्भरन्ध्रके ।
चक्राणि कारयेत् त्रीणि वितस्त्यायामतस्ततः ॥२३७॥
दन्तैः क्रकचवत् सम्यग्युक्तानि सुदृढान्यथा ।
अनुलोमविलोमाभ्यामूर्ध्वाधोगमनं यथा ॥ २३८ ॥
तथा नालान्तरे सम्यग्योजयेत् कीलकैस्सह ।
वातपूरकनालं तु चक्रमध्ये निवेशयेत् ॥ २३६ ॥
कीलचङ्क्रमणाच्चक्रभ्रमणं भवति स्वतः ।
वातपूरकनालस्य तेन सञ्चालनं भवेत् ॥ २४० ॥
१ बालिश्त लम्बा चौड़ा २ बालिश्त उठा हुआ-ऊँचा सीत्कारीनाल-वायु को खींचती हुई सीत्
करनेवाली नाल जैसी बनाकर स्तम्भ के छिद्र में लगावे, तीन चक्र १ बालिश्त लम्बे सुदृढ बनावे दान्तों
से युक्त आरे की भांति, जिससे अनुलोम विलोम से ऊपर नीचे गमन हो। नालों के अन्दर भली प्रकार
कीलों से युक्त करदे और वातपूरक नाल को चक्रों के मध्य में लगादे कीलों के घूमने से चक्रों का घूमना
स्वतः होगा इससे वातपूरक नाल का चलना होगा ।
ऊर्ध्वाधोगमनान्नालो वेगाद् वायुं प्रकर्षति ।
स्तम्भद्वयस्य मूलाग्रात् पूर्वपश्चिमपार्श्वयोः ॥२४१॥

सुन्दरविमान ] [ २७७
वातपूरकचक्रकीलकान्येवं नियोजयेत् ।
वाताकर्षणभस्त्रिकामुख्ययन्त्रान्यत् परम् ॥२४२॥
वातपूरकचक्रकीलकेभ्यस्सन्धारयेत् क्रमात् ।
ऊपर नीचे नाल के चलने से नालवेग से वायु को खींचता है, दोनों स्तम्भों मूलाम से पूर्व
और पश्चिम में वातपूरक चक्र की कीलों को इस प्रकार करे, इससे आगे वाताकर्षण भस्त्रिकामुख्ययन्त्रों
को वातपूरक चक्र की कीलों से जोडदे ॥२४१-२४२॥
भस्त्रिकामुख्ययन्त्रमुक्तं बुडिलेन—भस्त्रिकामुख्ययन्त्र कहा है बुडिल आचार्य ने—
चक्रकण्ठमृगचर्म समाहृत्य यथाविधि ॥२४३॥
संशोध्य पुत्रजीविकातैलेनाथ यथाक्रमम् ।
पाचयेत् त्रिदिन पश्चात् क्षालयेच्छुद्धवारिणा ॥२४४॥
गजदन्तिकतैलेन लेपयित्वा मुहुर्मुहुः ।
आतपे स्थापयेत् पञ्चवासराणि तत परम् ॥२४५॥
षड्वितस्तिप्रमाणेण पश्चाद् यन्त्र प्रकल्पयेत् ।
यन्त्रमूलस्य विस्तारो वितस्तित्रयमुच्यते ॥२४६॥
तन्मध्यदेशविस्तारो वितस्तीना चतुर्भवेत् ।
तमन्त्ये देशविस्तारो वितस्त्यैकमितीरितम् ॥२४७॥
भस्त्रिकामुखदेशेथ सङ्कोचनविकासकम् ।
अनुलोमविलोमाभ्या स्थापयेत् कीलकद्वयम् ॥२४८॥
कीलकद्वयभ्रामण्याद् यातायात यथा भवेत् ।
संस्थापयेदेकदण्डमेतन्मध्ये तथा क्रमात् ॥२४६॥
वेगात्सञ्चालन तद्वत्स्तम्भन च तथैव हि ।
यथाभवेत् तथा कर्तुं स्थापयेत् कीलकद्वयम् ॥२५०॥
चक्रकण्ठमृग--चक्रदंष्ट्रमृग--वराह--सुवर ? का चर्म लेकर यथाविधि पुत्रजीवक-
जीयापोता के तैल से यथाक्रम तीन दिन तक पकावे फिर शुद्ध जल से प्रक्षालित कर-
गजदन्तिका ओषधि के तैल का पुन पुन लेप करके पांच दिन तक धूप में रखे फिर ६ बालिश्त यन्त्र
बनावे यन्त्र के मूल का विस्तार ३ बालिश्त उसके मध्यदेश का विस्तार ४ बालिश्त अन्तवाले देश का
विस्तार १ बालिश्त कहा है । भस्त्रिका के मुखदेश में सङ्कोच विकास के साधन दो कीलों अनुलोमविलोम
रीति से स्थापित करे, दोनों कीलों के घुमाने से जिस प्रकार यातायात हो सके इस प्रकार उनके मध्य
में एक दण्ड लगावे फिर वेग से चालन और स्तम्भन हो सके ऐसा करने को दो कीलें स्थापित करे ॥
२४३-२५०॥
कीलकभ्रमणाद् यातायातदण्डप्रचालनम् ।
भवेत्तद्वेगस्सम्यग्भस्त्रिकामुखचालनम् ॥२५१॥

२७८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
वाताकर्षणनालस्य यातायातमपि क्रमात् ।
भस्त्रिकामुखवाताकर्षणनालप्रकर्षणात् ॥२५२॥
प्रभवेद् वेगत्तो वाताकर्षणं तन्मुखान्तरात् ।
एव त्रिचक्रनालस्तम्भेषु वातापकर्षणम् ॥२५३॥
यथा भवेत् तथा सर्वकीलकानि यथाक्रमम् ।
सन्धारयेद् विशेषेण तत्तत्स्थानेषु शास्त्रतः ॥२५४॥
विंशत्कक्ष्योष्णवेगेन कीलकानां परिभ्रमः ।
त्रिचक्रनालस्तम्भेषु यथा भवति तत्क्षणात् ॥२५५॥
क्रमात् सञ्जायते वायुरन्तर्नालस्तस्वभावतः ।
शतप्रेङ्खणमानेन तथैव हि विशेषतः ॥२५६॥
भस्त्रिकामुखयन्त्रेभ्यश्चापि वायुस्स्वभावतः ।
जायते द्विसहस्रप्रेङ्खणमानेन निर्मलः ॥२५७॥
क्रमादेतद्वायुवेगादपि यानं प्रधावति ।
तस्मात् प्रकल्प्य विधिद्वद् यन्त्राणि द्वादश क्रमात् ॥२५८॥
कीलों के भ्रमण से यातायात दण्ड का प्रचालन हो जावे उसके वेग से भस्त्रिकामुख का
चालन हो जाता है वाताकर्षणनाल का भी यातायात क्रम से भस्त्रिकामुखवाताकर्षणनाल को खींचने से
वाताकर्षण उस नाल के मुख में से होने लगे, इस प्रकार तीन चक्रों के नालस्तम्भों में वात का खींचना
जैसे हो वैसे सारी कीलों को उन उन स्थानों में शास्त्र से, २० दर्जे की उष्णतावेग से कीलों का घूमना
तीन चक्रों के नालस्तम्भों में तत्क्षण क्रम से हो जाता है, वायु नाल के अन्दर से स्वभावत सौ प्रेङ्खण-
भूल-वेग-अश्ववेग-अश्वगति के मान से प्रकट हो जाता है, भस्त्रिकामुख यन्त्रों से भी स्वभावत वायु
दो सहस्र अश्वगति मान से निर्मल वायु चलता है । इस वायु-वेग से भी यान दौड़ता है अतः १२
यन्त्रों को विधिविधान् बनाकर- ॥२५१-२५८॥
विमानस्य चतुर्दिक्षु वातोद्गमपुरो भुवि ।
एकैकपार्श्वे यन्त्राणि त्रीणि नियोजयेत् ॥२५६॥
कुर्यादावरणं तेषां तत्तन्मानानुसारतः ।
वितस्तित्रयमायामं वितस्तिद्वादशोन्नतम् ॥२६०॥
यथाभवेत् तथानालस्तम्भान् द्वादश कल्पयेत् ।
पूर्वोक्तयन्त्रावरणोर्ध्वप्रदेशे पृथक् पृथक् ॥२६१॥
वेगाद् वातोत्क्षेपणात्थं स्तम्भान् संस्थापयेद् दृढम् ।
षट्शतोत्तरद्विसहस्रप्रेङ्खणप्रमाणतः ॥२६२॥
एकैकस्तम्भतो वायुरूध्वं गच्छति वेगतः ।
कालानुसारतो वायुर्यावदपेक्षितं भवेत् ॥२६३॥

सुन्दरविमान ] [ २७६
तावदेव गृहीत स्यात् प्रतियन्त्रमुखान्तरात् ।
तस्मात् पृथक् पृथग्यन्त्राणीति शास्त्रे वर्णितम् ॥२६४॥
विमानस्योर्ध्वगमनमेतेनापि भविष्यति ।
वायुत्पत्तिक्रम व्यष्ट्या मन्त्रै रेव निरूपितम् ॥२६५॥
विमान की चारों दिशाओं में वातोद्गमयन्त्र के सम्मुख भूमि की ओर एक एक पार्श्वभाग में
तीन यन्त्र लगावे, उनका आवरण भी उस उसके मान से करे । ३ बालिश्त लम्बा चौड़ा १२ बालिश्त
ऊंचे जैसे हो ऐसे १२ नाल स्तम्भों को बनावे पूर्वोक्त यन्त्रावरण के उपरि प्रदेश में पृथक् पृथक् ।
वेग से वात के ऊपर फेंकने के लिये स्तम्भों को दृढ संस्थापित करे २६०० अश्वगति के मान से । एक
एक स्तम्भ से वायु वेग से ऊपर जाता है कालानुसार जितना वायु अपेक्षित होना चाहिए उतना ही
प्रत्येक यन्त्रमुख में से लिया जावे । अतः पृथक् पृथक् यन्त्र है यह शास्त्र में वर्णित है । विमान की
ऊर्ध्वगमन—ऊपर जाना इससे भी हो जायगा, वायु की उत्पत्ति का क्रम व्यष्टिरूप से यन्त्रोंद्वारा ऐसे
निरूपित किया है ॥२६४—२६५॥
समष्ट्या वातमाहर्तुं बृहत्स्तम्भ प्रचक्षते ।
चतुर्बितस्त्यायाम त्रिंशद्वितस्त्युन्नत तथा ॥२६६॥
वातोद्गमनालस्तम्भ कृत्वा पश्चात् यथाविधि ।
यन्त्राणा मध्यकेन्द्रेऽथ स्थापयेत्सुदृढ यथा ॥२६७॥
भस्त्रिकोन्मुखयन्त्राणि स्तम्भमूले नियोजयेत् ।
यन्त्राणा वातमाकृष्य स्तम्भे पूरयितु क्रमात् ॥२६८॥
यन्त्रादिस्तम्भमूलान्तं तत्तद्रेखानुसारत ।
वाताकर्षणनालानि समाहृत्य यथाविधि ॥२६६॥
स्तम्भमूलान्तरे सम्यक् सन्धार्याथ यथाक्रमम् ।
वातपूरककीलानि तत्तन्नालमुखान्तरे ॥२७०॥
समष्टिरूप से वायु को आहरण करने के लिये बृहत्स्तम्भ चक्र कहते हैं वह ४० बालिश्त लम्बा
चौड़ा ३० बालिश्त ऊंचा वातोद्गमनालस्तम्भ करके—बनाकर पश्चात् यथाविधि यन्त्रों के मध्यकेन्द्र में
सुदृढ़ स्थापित करे । यन्त्रों के वायु को आकर्षित कर—खींचकर स्तम्भ में भरने को क्रम से भस्त्रिको-
न्मुखयन्त्रों को स्तम्भ के मूल में लगावे यन्त्रों से लेकर स्तम्भमूल तक उस उसकी रेखा के अनुसार
वाताकर्षणनालों को यथाविधि लेकर स्तम्भमूल के अन्दर सम्यक् यथाक्रम जोडकर वातपूरक कीलों को
उस उस नालमुख के अन्दर—
संयोज्य विधिवत् पश्चान्नालस्तम्भमुखान्तरे ।
अष्टाङ्गुलायाममुखविलं कृत्वा यथाविधि ॥२७१॥
तस्योपरि यथाशास्त्रं वितस्त्यैकोन्नत तथा ।
वितस्तित्रयमायाम मुख्ययन्त्र नियोजयेत् ॥२७२॥

२४० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
एतत्पात्राद् बहिर्याति वातस्तम्भान्तरे स्थित. ।
वायुवेगाद् विशेषेण तरङ्गाकारवत् स्वत ॥२७३॥
पश्चाद् धूमोद्गमयन्त्रस्थितधूमप्रसारणम् ।
वातप्रसारण यन्त्र स्तत्तदेव यथाविधि ॥२७४॥
तद्यन्त्रस्थितवातस्य क्रमाद् धूमोद्गमे यथा ।
भवेत् प्रवेशस्सरलात् तथा शास्त्रविधानत. ॥२७५॥
विधिवत् युक्त करके फिर नालस्तम्भमुख के अन्दर ८ अंगुल बडा मुख छिद्र उसके ऊपर
यथाशास्त्र १ बालिश्त ऊंचा ३ बालिश्त लम्बा चौड़ा मुखपात्र—ढक्कन लगावे बातस्तम्भ के अन्दर
स्थित वायु इस पात्र से वेग से तरङ्गाकार की भांति स्वत. बाहिर जाता है । पश्चात् धूमोद्गमयन्त्रस्थित
धूम का प्रसारण यन्त्रों से उसी भांति होता है, उस यन्त्र में स्थित वात का धूमोद्गम में जैसे
सरलता से प्रवेश हो उस प्रकार शास्त्रविधान से—
त्रिचक्रनालकोलांश्च सन्धार्याय यथाक्रमम् ।
तत्कीलकंर्यथाकाम धूम वा वायुमेव वा ॥२७६॥
समाकृष्याय विधिवत् तत्तत्कालानुसारत ।
उपयोक्तु भवेत् सम्यग्यथेष्ट सप्रमाणत. ॥२७७॥
एतद्यन्त्रस्य विधिवच्चतुर्दिक्षु यथाक्रमम् ।
वातनिरसनपङ्गुचक्राणि स्थापयेदथ ॥ २७८ ॥
एतच्चक्राणि वेगेन भ्रामयेद् यदि कीलकै. ।
वायु निराकृत्य पश्चाद् व्योमयान. प्रधावति ॥ २७६ ॥
तेन सर्वत्र वेगेन निरातङ्क यथा तथा ।
तीन चक्रों की नालकोलों को यथाक्रम लगाकर उन कीलों से यथेच्छ धूएं को या वायु को
खींचकर विधिवत् कालानुसार यथेष्ट मात्रा में भलीभांति उपभोग कर सके । इस यन्त्र की चारों दिशाओं
में यथाक्रम बातनिरसनपङ्गु—वायु निकलने के चपटे असंख्यक्त चक्रों या पेंचचक्रों को स्थापित करे,
इन चक्रों को यदि कीलों से वेग से घुमावे तो व्योमयान वायु को निकाल कर उस वेग से निरातङ्क
निर्भय सर्वत्र दौडता है ॥ १७६-१७६ ॥
अथ विमानावरणनिर्णयः—अब विमान के आवरण का निर्णय करते हैं—
आवृत्य धूमोद्गमयन्त्राणि कुड्यान्यथाविधि ॥ २८० ॥
विमानावरणं कर्तुं कुर्याच्छकुनवक्रमात् ।
सुन्दराख्यविमानस्यावरणं च यथाविधि ॥ २८१ ॥
राजलोहेनैव कुर्यादन्यथा निष्फलं भवेत् ।
पश्चादावरण यावद्गृहसंख्या विधीयते ॥ २८२ ॥
तावत्संख्यानुसारेण विभज्याथ यथाक्रमम् ।

सुन्दरविमान ] [ २८१
कुर्याद् गृहाणि विधिवत्पूर्वोक्तशकुने यथा ॥ २८३ ॥
द्वात्रिंशदङ्गयन्त्राणां स्थानानि च यथाक्रमम् ।
चातुर्मुखोष्ण्यकयन्त्रस्थापनार्थं यथाविधि ॥२८४॥
तद्गृहाणां मध्यदेशे चतुरश्राकृतिर्यथा ।
त्रिंशद्वितस्त्यायामप्राङ्ग (ङ्क ?) ण परिकल्पयेत् ॥ २८५ ॥
अत्रैव स्थापयेत्सम्यक् चातुर्मुखोष्ण्ययन्त्रकम् ।
धूमोद्गमयन्त्रों को ढक कर विमान का आवरण—आच्छादन करने को शकुनविमान की
भांति कुड्य—दीवारें बनावें सुन्दर विमान का आवरण भी यथाविधि राजलोह से ही करे अन्यथा
निष्फल हो जावे । फिर घरों–कमरों की जितनी संख्या कही हो उतनी संख्या में आवरण यथाक्रम
विभागशः करे उतनी संख्या में घर भी शकुनविमान की भांति ३२ अङ्गयन्त्रों के स्थान भी यथाक्रम करे,
चारमुखवाला यथाविधि औष्ण्य यन्त्र स्थापनार्थ उन घरों के मध्य देश में चोकोर ३० बालिश्त लम्बा
चौडा प्राङ्गण—आङ्गन स्थल–फर्श बनावे यहां ही चातुर्मुखोष्ण्ययन्त्र स्थापित करे ॥ २८०-२८५ ॥
एतदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—यह यन्त्रसर्वस्व में कहा है—
चातुर्मुखोष्ण्ययन्त्ररचना कुण्डोदरेण हि ॥ २८६ ॥
कर्तव्यमिति शास्त्रेषु प्रवदन्ति मनीषिणः ।
चातुर्मुखोष्ण्ययन्त्ररचना कुण्डोदर लोहे से करनी चाहिए ऐसा शास्त्रों में मनीषीजन
कहते हैं ॥२८६॥
कुण्डोदरलोहमुक्तं लोहसर्वस्वे—कुण्डोदर लोहा कहा है लोहसर्वस्व ग्रन्थ में—
सोमकञ्चुकशुण्डाललोहान्* शुद्धान् यथाविधि ॥ २८७ ॥
क्रमात्त्रिंशत्पञ्चचत्वारिंशद्विशांशतः क्रमात् ।
सम्पूर्य पदममूषाया कुण्डे छत्रमुखाभिधे ॥ २८८ ॥
संस्थाप्य वासुकी भस्त्रात्सम्यग्वेगाद् यथाविधि ।
षोडशोत्तरसप्तशतोष्णाकक्ष्यप्रमाणतः ॥ २८६ ॥
भ्रानेत्रान्तं गालयित्वा यन्त्रे सम्पूरयेच्छनं ।
एवकृते नीलवर्णं सुसूक्ष्मं भारवर्जितम् ॥ २९० ॥
द्विसहस्रकक्ष्योष्णवेगसहं सुरुचं दृढम् ।
सहस्रघिनशतघ्नीभिरुच्छेद्यं चातिशीतलम् ॥ २९१ ॥
भवेत् कुण्डोदर नामलोहं कृतवंगजम् ।
एतल्लोहेन विधिवत् कुर्यात् यन्त्रं मनोहरम् ॥ २९२ ॥
एतदौष्ण्ययन्त्राणां रचनादौ विनिश्चितम् ।

  • 'पूनाफोटो पाठ. परन्तु कुण्टार्कलोहश्च विशोधितम्' हस्तलेखपाठ ।

.
Let's see: रवप्रसारणकीलनाल (च?) तथैव हि ॥ २६६ ॥ or रवप्रसारणकीलनाल.(च?)तथैव हि ॥ २६६ ॥.
Wait, in L16, there is no space, it's कीलनाल.(च?)तथैव. A dot might just be a period or broken type. But कीलनाल.(च?)तथैव or कीलनाल (च?) तथैव? Putting (च?) is clear. Let's look at whether there's a space or dot:
रवप्रसारणकीलनाल.(च?)तथैव हि ॥ २६६ ॥

Let's check line breaks and markers:
२८२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
सोम, कञ्चुक, शुण्डाल लोहों को यथाविधि शुद्ध करके क्रम से ३०, ४५, २० अंशों में ले
पद्ममूषा यन्त्र में छत्रमुखनामककुण्ड में रखकर वासुकी-सर्परूप लम्बी भस्त्रिका से ७१६ दर्जे की
उष्णता से नेत्रपर्यन्त गलाकर धीरे से यन्त्र में भर दे ऐसा करने पर नीले रंग का भाररहित अति सूक्ष्म
दो सहस्र दर्जे की उष्णता वेग सहने तक सुन्दर चमक वाला शतघ्नि सहस्रघ्नी तोपों से अच्छेद्य
शीतल हो आ

-> wait,क्रमात् ।Let's re-read the first word of line 17:भ स्मे गा ल प ना र्थंWait, is itभस्मेगालपनार्थं? Let's check the letters: भ स्मे गा ल प ना र्थंWait, could it beभस्मेगालनार्थं? Look between लandना: Is there a प? Look at ल: लis composed of two loops and a downstroke. Then next to it is:प! Wait, is it प? Wait! Look at भस्मगालतार्थंorभस्मगालनार्थं? Wait! Look at the letter between गाandनार्थं: Is it ल+प? Wait, look at लinसमीकृत्य(line 8) -लinप्रकल्पयेत्(line 9). Inप्रकल्पयेत्, ल्पhasलconnected toप. Does line 17 have ल्प? भस्मेगाल्प...? No! Wait, look at: भ, स्मे, गा, ल`,