बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
पृष्ठ 293, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ेंहस्तलेख कापी संख्या १६—
संस्थितत्रिचक्रमुखस्तम्भकीलकयोः क्रमात् ।
संयोज्य विधिवत्पश्चात् स्तम्भस्थप्रतिनालयो ॥ १७३ ॥*
पार्श्वयोरुभयोर्मध्ये चानुलोमविलोमत ।
सन्धारयेद् भ्रामणकीलकान् सुदृढं यथा ॥ १७४ ॥
एतत्कीलकभ्रमणाद् दधिनिर्मन्थने यथा ।
मन्थानरज्जुग्रहहस्तौ वेगात् पुनः पुनः ॥ १७५ ॥
ऊर्ध्वाधोभागयोस्सम्यगनुलोमविलोमत ।
सम्भ्रामयेत् तथा नालोभयपार्श्वस्यपट्टिका (म् ?) ॥१७६॥
ऊर्ध्वाधोभागयोस्सम्यग्भ्रामयेद् वेगतः क्रमात् ।
पश्चाद् दर्पणशास्त्रोक्तघृण्याकर्षणदर्पणात् ॥ १७७ ॥
उलूखलोपरि न्यस्तवेणुपात्राकृतिर्यथा ।
कुर्याच्चत्वारि पात्राणि चतुष्पात्रोपरि क्रमात् ॥१७८॥
विधिवद् योजयेत् सम्यङ् मुखस्थाने पृथक् पृथक् ।
—स्थित तीन चक्रमुख वाली दो स्तम्भकीलों में क्रम से संयुक्त कर पश्चात् स्तम्भस्थ प्रतिनाल
के पार्श्वों में अनुलोम विलोम रीति से घूमनेवाली कीलों को दृढ लगावे इन कीलों के भ्रमण से दही
मथने में जैसे मन्थन डोरी पकड़े हुए हाथ वेग से वार वार ऊपर नीचे भागों में अनुलोम विलोम—सीधे
उलटे ढंग से घुमावे वैसे ही नालों के दोनों ओर वाली पट्टिका ऊपर नीचे भागों में सम्यक् वेग से घुमावे
पश्चात् दर्पणशास्त्र में कहे घृण्याकर्षणदर्पण—सूर्य या सूर्यकिरण को खींच लेने वाले दर्पण—सूर्यकान्त
से चार पात्र करे और चार पात्रों के ऊपर क्रम से विधिवत् सम्यक् मुखस्थान में युक्त करे ऊखल के ऊपर
रख बांस पात्राकृति के समान— ॥ १७३—१७८ ॥
पात्रलक्षणं लल्लोनोक्तम् —पात्रलक्षण लल्ल आचार्य ने कहा है—
आदावष्टाङ्गुलायामं वितस्त्यैकोन्नत तथा ॥ १७९ ॥
कृत्वा तन्मध्यदेशेथ शास्त्रोक्तेनैव वर्त्मना ।
वितस्तिद्वयमायामं षड्वितस्त्युन्नतं तथा ॥ १८० ॥
कल्पयित्वा तदन्ते षड्वितस्त्यायामविस्तृतम् ।
• संख्या कापी १८ से आगे के क्रम से है ।