बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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शास्त्रोक्त मार्ग से सरल भ्रमण हो सके अथवा अयस्कान्त से या शक्तिस्कन्ध से किये स्तम्भों को उनमें
एक एक स्थापित करे । ३ बालिश्त ऊंचाई १ बालिश्त मोटाई—॥ १५६-१६३ ॥
एकैकस्तम्भप्रमाणमिति शास्त्रविनिर्णयः ।
मथनोन्मथनयन्त्रपूर्वभागे यथाक्रमम् ॥ १६४ ॥
उत्क्षेपणपक्षेपणचक्रकीलान् पृथक् पृथक् ।
सन्धारयेत् ततो मध्यस्तम्भस्थानाद् यथाक्रमम् ॥ १६५॥
उत्क्षेपणापक्षेपणाकीलावधिसुशोधितम् ।
अष्टाङ्गुलायामनालमेकं सन्धारयेद् दृढम् ॥ १६६ ॥
पश्चात्पञ्चाङ्गुलायामचक्राणि सुदृढान्यपि ।
कृत्वा जलाहरणयन्त्रचक्रवन्मनोहरम् ॥ १६७ ॥
सन्धारयेद् यथाशास्त्र पञ्चसङ्ख्याक्रमेण तु ।
कीलकैस्सरलैस्सम्पङ्नालस्योभयपार्श्वयो ॥ १६८ ॥
ततश्शक्तिस्कन्धलोहाद्द्व्यङ्गुलद्वयमानत ।
पट्टिकान् कारयित्वाथ शोषयित्वा यथाविधि ॥ १६६ ॥
आवृत्तनालान्तर्गतचक्राण्यारभ्य शास्त्रत. ।
मथनोन्मथनयन्त्रवामदक्षिणपार्श्वयो ॥ १७० ॥
संस्थितोत्क्षेपणापक्षेपणचक्रान्तरावधि ।
मथनोन्मथनयन्त्रोभयपात्रस्यकेन्द्रयो ॥ १७१ ॥
एक एक स्तम्भ का प्रमाण है यह शास्त्र का निर्णय है, मथनोन्मथन यन्त्र के पूर्व भाग में
यथाक्रम उत्क्षेपण—ऊपर फेंकने अपक्षेपण नीचे फेंकने की चक्रकीलें पृथक् पृथक् लगावे, मध्यस्तम्भ स्थान
से यथाक्रम उत्क्षेपण अपक्षेपण की कील तक सुशोधित ८ अङ्गुल लम्बा एक नाल लगावे, पश्चात् ५
अङ्गुल लम्बे सुदृढ चक्र भी जलाहरण—चक्र—राहट की भांति मनोहर बनाकर शास्त्रानुसार सरल कीलों
नाल के दोनों पाखों में लगावे । फिर शक्तिस्कन्ध लोहे से २ अङ्गुल माप की पट्टिकाएं बना कर और
यथाविधि शोध कर घूमने वाले नाल के अन्तर्गत चक्रों को आरम्भ कर शास्त्र से मथन-उन्मथन यन्त्र
बाएं दाएं चक्रों की अवधि तक मथनोन्मथन यन्त्र के दोनों पात्रों के केन्द्र में—॥ १६४-१७१ ॥
(आगे देखो कापी संख्या १६)