बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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शुद्धवज्रमुखताम्रतन्त्रीद्वयं सुवर्चसम् ।
शक्तिपूरकपात्रेथ यथा संयोजितं भवेत् ॥ १६२ ॥
तथा सन्धारयेत्सम्यक् प्रतिनालेयथाविधि ।
शक्तिपूरकपात्रेऽथ रसं शतपले न्यसेत् ॥ १६३ ॥
पश्चादेकनवत्युत्तरत्रिशतात्मकं शिवम् ।
विद्युन्मुखमणिं पूर्वोक्ततन्त्रीपरिवेष्टितम् ॥ १६४ ॥
तस्मिन्निधाय विधिवत् पश्चात्सन्मणि तन्त्रिषु ।
पूर्वोक्त नालस्यतन्त्रीस्सम्यक् संयोजयेद् दृढम् ॥ १६५ ॥
चतुष्पात्रस्थितान् शुद्धखुरतैल प्रलेपितान् ।
सम्भ्रामयेद् वेगतो मथनोन्मथनकीलकान् ॥ १६६ ॥
उसके ऊपरि भाग को रेशमी वस्त्र या उसके धागों से लपेट दे फिर क्रम से नालों के अन्दर
शुद्ध वज्रमुख ताम्बे की सुन्दर दो तारों को शक्तिपूरकपात्र में युक्त कर दिया जावे ऐसे प्रत्येक नाल में
लगावे । शक्तिपूरकपात्र में १०० पल अर्थात् ४०० तोला पारा डालदे, फिर उन तारों से लपेटी हुई ३६१
सुन्दर विद्युन्मणि को उसमें रखकर पश्चात् मणितारों में पूर्वोक्त नालतारों को भली भांति लगावे, चारों
पात्रों में स्थित खुरतैल-तिलतैल या नखीगन्धद्रव्य के तैल से मथनोन्मथन कीलों को चिकनी करके वेग
से घुमावे-॥ १६१-१६६ ॥
कक्ष्यदिशतोष्णवेगाद् भवेत्कीलकभ्रमो यदि ।
चतुष्पात्रस्थमूलेषु* पाचतेष्वंशुभिः क्रमात् ॥ १६७ ॥
मथनोन्मथनचक्राणि च (?) यथाक्रमम् ।
यथा भवेद् द्विसहस्रकक्ष्योष्ण वेगतो भृशम् ॥ १६८ ॥
तन्मूलानि विशेषेण दधिवन्मन्थयन्ति हि ।
एतेन प्रतिपात्रे ऽष्टशतडिग्रीप्रमाणतः ॥ १६६ ॥
वेगादाविर्भवेद् विद्युच्छक्तिश्शुद्धातिवे गिनी ।
आचतुष्पात्रमूलाग्रादाविद्युत्पूरकान्तरे ॥ २०० ॥
सन्धारितकान्तलोहनालान्तर्गततन्त्रिभि ।
एतच्छक्तिं समाहृत्य शक्तिपूरकपात्रके ॥ २०१ ॥
सम्पूरयेत् सप्रमाण सावधानेन चेतसा ।
तच्छक्तिं तत्रत्यमरिण पात्रे सगृह्य पूर्णति ॥ २०२ ॥
यदि मथनोन्मथन कीलों का घूमना २०० दर्जे की उष्णता से हो तो किरणों से पके चारों
पात्रस्थ मूलों में मथनोन्मथ चक्र २००० दर्जे की उष्णता से वेग को लें वह मूल विशेषतः दही मथने की
भांति मथन करती हैं उससे प्रत्येक पात्र में ८०० डिग्री प्रमाण के वेग से अतिवेगिनी विद्यु त्शक्ति
प्रकट हो जाती है चारों पात्रों के मूलाग्र से विद्युत्पूरकपात्र के अन्दर तक चलतेहुए कान्त लोहनालान्तर्गत
- मूत्रेपु' हस्तलेखे ।